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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1424, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1424

⚙️ निर्वाण प्रकरण

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तपा हुआ सर्प के फन की छाया के नीचे बैठकर सुख की वाञ्छा करे तो सुख न पावेगा, पर जब आत्मज्ञानरूपी वृक्ष की छाया के नीचे बैठे, तब शान्त और सुखी होगा। जिन पुरुषों ने विषयों का सेवन किया है, वे परम दुःख पाते हैं और जिन्होंने आत्मपद का सेवन किया है, वे परमानन्द को प्राप्त होते हैं। जैसे नदी का प्रवाह नीचे जाता है, वैसे ही मूर्ख का मन विषयों की ओर दौड़ता है। यह संसार मायामात्र है और इसमें शान्ति कभी नहीं प्राप्त होती। जैसे मरुस्थल की नदी के जल से प्यास नहीं मिटती, वैसे ही विषयभोगों से शान्ति कभी नहीं होती। जो आत्मपद से विमुख हैं, वे विषयों की ओर दौड़ते हैं और जो आत्मपद में स्थित हैं, वे विषयों की ओर नहीं दौड़ते। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर नष्ट होते हैं और नदी का वेग समुद्र की ओर गमन करता है, पर पत्थर की शिला गमन नहीं करती, वैसे ही भोगरूपी समुद्र की ओर अज्ञानी दौड़ता है, ज्ञानी नहीं जाता। हे मुनीश्वर ! कमल में सुगन्ध तभी तक होती है, जब तक सर्प के मुख की वायु नहीं लगी। वैसे ही बुद्धि में विचार तभी तक है, जब तक चित्तरूपी सर्प को भोग और इच्छारूपी वायु नहीं लगी। जब यह लगती है, तब विचाररूपी सुगन्ध ले जाती है और विषरूपी तृष्णा को छोड़ जाती है। बाण निशाने की ओर तब दौड़ता है, जब धनुष और चिल्ले को त्यागता है और त्यागने पर फिर नहीं मिलता। वैसे ही आत्मारूपी चिल्ले से जब चित्तरूपी बाण छूटता है, तब भोगरूपी निशाने की ओर दौड़ता है और जब जाता है, तब फिर आना कठिन होता है—अर्थात् अन्तर्मुख होना कठिन होता है।

हे मुनीश्वर ! यह आश्चर्य है कि जो पदार्थ सुखदायक नहीं हैं, उनकी ओर चित्त बड़ा यत्न करता है, पर तो भी वे सिद्ध नहीं होते, पर वे अयत्नसिद्ध आत्मपद को त्याग देते हैं। जिनको यह जीव सुख जानता है, वे सब दुःख के स्थान हैं। जिस अपने होने को यह भला जानता है, वह अनर्थ का कारण है। जिस देह को जीव सुखरूप जानता है, वह सब रोगों का मूल है। जिसको यह भोग जानता है, वे इसको