योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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शून्य होता है, तब जन्मों का अन्त नहीं आता—अनेक शरीर पाता है। जैसे चाक पर चढ़ी हुई मृत्तिका अनेक बर्तनों के आकार धारण करती है, वैसे ही आत्मज्ञान से रहित जीव अनेक शरीर धारण करता है। पर अब मैं जागा हूँ। मुझको ये अब नहीं लूट सकते।
हे मुनीश्वर ! भोगरूपी बड़े नाग हैं। और जो नागों के डसने से शरीर मृतक होते हैं, पर विषयरूपी सर्प के फूत्कार से ही जीव मृतक होता है अर्थात् इच्छा करने से ही आत्मपद से शून्य हो जाता है। जब जीव का विषयों की इच्छा से सम्बन्ध होता है, तब क्षण-क्षण में उसका निरादर होता है—जैसे कदली वन से निकला और महावत के वश में आया हाथी निरादर पाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर के लिए जीव विषयों की इच्छा करता है, वह शरीर भी नाशवान् है। इसमें अहंप्रतीति करना परम आपदा का और अहंप्रतीति न करना परमसुख का कारण है। जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ मेढक मच्छर खाने की इच्छा करता है, वह महामूर्ख है। किसी क्षण काल इसको ग्रस लेगा। इसमें भोगों की इच्छा करना व्यर्थ है और दुःख का कारण है। हे मुनीश्वर ! जब बाल अवस्था व्यतीत होती है, तब युवा अवस्था आती है और युवा के उपरान्त जब वृद्धावस्था आती है, तब शरीर जर्जर हो जाता है। जैसे बसन्तऋतु की मञ्जरी जेठ-आषाढ़ में सूख जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जर होकर दुःख पाता है। बाल अवस्था में जीव क्रीड़ा में मग्न होता है। यौवन अवस्था में कामादिक का सेवन करता और वृद्ध होकर चिन्ता में मग्न रहता है। इस प्रकार जब ये तीनों अवस्था व्यतीत होती हैं, तब मर जाता है। जीवों की आयु इस प्रकार व्यतीत होती है और वे परमपद से वंचित रहते हैं। हे मुनीश्वर ! यह आयु बिजली की चमक की तरह है। इस क्षणभंगुर अवस्था में जो भोगों की वाञ्छा करते हैं, वे महादुःख को प्राप्त होते हैं। इनमें सुख देखकर जो कोई कहे कि मैं स्वस्थ रहूँगा तो कभी न होगा जैसे जल के तरङ्गों में बैठकर कोई पार हुआ चाहे तो नहीं हो सकता—अवश्य मरेगा—वैसे ही विषय-भोगों से शान्ति-सुख नहीं मिलता। जैसे कोई तेज धूप में