योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६२ = ✻ योगवाशिष्ठ ✻
शून्य होता है, तब जन्मों का अन्त नहीं आता—अनेक शरीर पाता है। जैसे चाक पर चढ़ी हुई मृत्तिका अनेक बर्तनों के आकार धारण करती है, वैसे ही आत्मज्ञान से रहित जीव अनेक शरीर धारण करता है। पर अब मैं जागा हूँ। मुझको ये अब नहीं लूट सकते।
हे मुनीश्वर ! भोगरूपी बड़े नाग हैं। और जो नागों के डसने से शरीर मृतक होते हैं, पर विषयरूपी सर्प के फूत्कार से ही जीव मृतक होता है अर्थात् इच्छा करने से ही आत्मपद से शून्य हो जाता है। जब जीव का विषयों की इच्छा से सम्बन्ध होता है, तब क्षण-क्षण में उसका निरादर होता है—जैसे कदली वन से निकला और महावत के वश में आया हाथी निरादर पाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर के लिए जीव विषयों की इच्छा करता है, वह शरीर भी नाशवान् है। इसमें अहंप्रतीति करना परम आपदा का और अहंप्रतीति न करना परमसुख का कारण है। जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ मेढक मच्छर खाने की इच्छा करता है, वह महामूर्ख है। किसी क्षण काल इसको ग्रस लेगा। इसमें भोगों की इच्छा करना व्यर्थ है और दुःख का कारण है। हे मुनीश्वर ! जब बाल अवस्था व्यतीत होती है, तब युवा अवस्था आती है और युवा के उपरान्त जब वृद्धावस्था आती है, तब शरीर जर्जर हो जाता है। जैसे बसन्तऋतु की मञ्जरी जेठ-आषाढ़ में सूख जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जर होकर दुःख पाता है। बाल अवस्था में जीव क्रीड़ा में मग्न होता है। यौवन अवस्था में कामादिक का सेवन करता और वृद्ध होकर चिन्ता में मग्न रहता है। इस प्रकार जब ये तीनों अवस्था व्यतीत होती हैं, तब मर जाता है। जीवों की आयु इस प्रकार व्यतीत होती है और वे परमपद से वंचित रहते हैं। हे मुनीश्वर ! यह आयु बिजली की चमक की तरह है। इस क्षणभंगुर अवस्था में जो भोगों की वाञ्छा करते हैं, वे महादुःख को प्राप्त होते हैं। इनमें सुख देखकर जो कोई कहे कि मैं स्वस्थ रहूँगा तो कभी न होगा जैसे जल के तरङ्गों में बैठकर कोई पार हुआ चाहे तो नहीं हो सकता—अवश्य मरेगा—वैसे ही विषय-भोगों से शान्ति-सुख नहीं मिलता। जैसे कोई तेज धूप में
⚙️ निर्वाण प्रकरण
<div align="right">६१६</div>तपा हुआ सर्प के फन की छाया के नीचे बैठकर सुख की वाञ्छा करे तो सुख न पावेगा, पर जब आत्मज्ञानरूपी वृक्ष की छाया के नीचे बैठे, तब शान्त और सुखी होगा। जिन पुरुषों ने विषयों का सेवन किया है, वे परम दुःख पाते हैं और जिन्होंने आत्मपद का सेवन किया है, वे परमानन्द को प्राप्त होते हैं। जैसे नदी का प्रवाह नीचे जाता है, वैसे ही मूर्ख का मन विषयों की ओर दौड़ता है। यह संसार मायामात्र है और इसमें शान्ति कभी नहीं प्राप्त होती। जैसे मरुस्थल की नदी के जल से प्यास नहीं मिटती, वैसे ही विषयभोगों से शान्ति कभी नहीं होती। जो आत्मपद से विमुख हैं, वे विषयों की ओर दौड़ते हैं और जो आत्मपद में स्थित हैं, वे विषयों की ओर नहीं दौड़ते। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर नष्ट होते हैं और नदी का वेग समुद्र की ओर गमन करता है, पर पत्थर की शिला गमन नहीं करती, वैसे ही भोगरूपी समुद्र की ओर अज्ञानी दौड़ता है, ज्ञानी नहीं जाता। हे मुनीश्वर ! कमल में सुगन्ध तभी तक होती है, जब तक सर्प के मुख की वायु नहीं लगी। वैसे ही बुद्धि में विचार तभी तक है, जब तक चित्तरूपी सर्प को भोग और इच्छारूपी वायु नहीं लगी। जब यह लगती है, तब विचाररूपी सुगन्ध ले जाती है और विषरूपी तृष्णा को छोड़ जाती है। बाण निशाने की ओर तब दौड़ता है, जब धनुष और चिल्ले को त्यागता है और त्यागने पर फिर नहीं मिलता। वैसे ही आत्मारूपी चिल्ले से जब चित्तरूपी बाण छूटता है, तब भोगरूपी निशाने की ओर दौड़ता है और जब जाता है, तब फिर आना कठिन होता है—अर्थात् अन्तर्मुख होना कठिन होता है।
हे मुनीश्वर ! यह आश्चर्य है कि जो पदार्थ सुखदायक नहीं हैं, उनकी ओर चित्त बड़ा यत्न करता है, पर तो भी वे सिद्ध नहीं होते, पर वे अयत्नसिद्ध आत्मपद को त्याग देते हैं। जिनको यह जीव सुख जानता है, वे सब दुःख के स्थान हैं। जिस अपने होने को यह भला जानता है, वह अनर्थ का कारण है। जिस देह को जीव सुखरूप जानता है, वह सब रोगों का मूल है। जिसको यह भोग जानता है, वे इसको
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दुःख देनेवाले परमरोग हैं, और जिनको यह सत्य जानता है, वे सब मिथ्या हैं। जिनको यह स्थिर जानता है, वे स्थिर नहीं चलरूप हैं, जिनको यह सम जानता है, वे सब विषम हैं। जिनको बान्धव जानता है, वे सब अबान्धव और दृढ़ बन्धनरूप हैं। जिसको यह सुख देनेवाली स्त्री जानता है, वह सर्पिणी परम विष उगलनेवाली है। उसका काटा मर जाता है, फिर नहीं जीता, अर्थात् आत्मपद में स्थित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं देह को परम आपदा का कारण जानता हूँ। इससे निवृत्त होने पर जीव परमपद को प्राप्त होता है। जिन पुत्र, धन आदि को यह जीव संपदा जानता है, वे परम दुःखरूप आपदा है; इनमें सुख कदापि नहीं। यह बात मैं सुनकर नहीं कहता; मैंने देखकर विचार किया है; विचार करके अनुभव किया है और अनुभव करके कहा है कि यह संसार मायामात्र है। बड़े-बड़े स्थानों में भी मैं गया हूँ, परन्तु सार पदार्थ मुझको कोई नहीं देख पड़ा। स्वर्ग में नन्दनवन आदि काष्ठरूप ही दीखे। मृत्युलोक में आकर देखा तो पञ्चभूत ही देखे; शरीर में रक्त, मांस, हाड़, मूत्र आदि देखे। ऐसे शरीर में जो अहंप्रत्यय करते हैं, उनको मैं धिक्कार देता हूँ। शरीर की आयुष्य ऐसी है, जैसे दोनों हाथों में जल लीजिए तो बह जाता है अथवा जैसे जल में तरङ्ग बुलबुले उपजकर नष्ट होते हैं या बिजली की चमक होकर नष्ट हो जाती है। जो ऐसे शरीर को पाकर सुख की तृष्णा करते हैं वे महामूर्ख हैं। बाल अवस्था तरङ्ग की नाईं नष्ट हो जाती है। यौवन अवस्था बिजली की चमक सी छिप जाती है। वृद्ध अवस्था में केश श्वेत हो जाते हैं और दाँत घिसकर गिर पड़ते हैं। जैसे नीचे स्थान में जल स्थिर हो जाता है, वैसे ही सब रोग वृद्धावस्था में घेर लेते हैं और तृष्णा दिन-दिन बढ़ती जाती है।
हे मुनीश्वर ! उस समय सब पदार्थ जर्जर हो जाते हैं और तृष्णा जवान होती है—जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी बढ़ती जाती है—और जो सुखभोग प्राप्त होकर बिछुड़ जाते हैं, उनका दुःख होता है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार इनको असत्य जानकर मैं स्वरूप में स्थित हुआ हूँ।
✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ६२१
यदि पाँचों इन्द्रियों के इष्ट विषय बड़ी उत्तम मूर्ति रखकर उपस्थित हों तो भी मुझको आकृष्ट नहीं कर सकते । जैसे मूर्ति की लिखी कमलिनी भौंरे को नहीं खींच सकती, वैसे ही मुझ सरीखों को विषय नहीं चलायमान कर सकते । हे मुनीश्वर ! तुम्हारा शरीर मैंने अवज्ञा करके डाल दिया है—विचार से नहीं फेंका । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक जो त्रिकालज्ञ हैं, वे भी इस चर्मदृष्टि से नहीं देख सकते; जब विचार से देखते हैं तभी जानते हैं । इस कारण विचार बिना मैंने तुम्हारा शरीर फेंक दिया था । अब तुम क्षमा करो । योगेश्वर विचार से ही भूत, भविष्यत् और वर्तमान को जानता है । इन नेत्रों से तो वही जाना जाता है कि जो अग्रभाग में होता है, विशेष नहीं जाना जाता, इस कारण मुझसे तुम्हारा शरीर गिरा है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीसिद्धिसमाधियोगवर्णनन्नाम द्विशताधिकचतुर्थसर्गः ॥२०४॥
वशिष्ठजी बोले, हे साधु ! मैंने भी तुझे विचार बिना गिराया है कि विचार बिना मैं उठ गया था । यह कुटी मेरे अन्तवाहक संकल्प में थी सो मैं अपने स्थान को चला, इस कारण यह कुटी गिर पड़ी और तुम भी गिर पड़े । जो बीत गई सो भली हुई, उसकी क्या चिन्ता कीजिए ? ज्ञानवान् बीती की चिन्ता नहीं करते । जो होनी थी, सो भली हुई । हे साधु ! अब जहाँ तुम्हें जाना है, वहाँ जाओ और हम भी जाते हैं । हे राम ! इस प्रकार चर्चा करके हम दोनों आकाशमार्ग को उड़े—जैसे पक्षी उड़ते हैं—और परस्पर नमस्कार करके अलग हो गये । वह अपने स्थान को गया और अपने स्थान को चलकर बहुतेरे स्थान देखता गया, परन्तु मुझको कोई न जानता था । हे राम ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त जो मैंने तुमसे कहा है, उसे तुम विचारो । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो सिद्ध के साथ समागम किया था तो आकाशमार्ग में कैसे शरीर से किया ? आपका पाञ्चभौतिक शरीर तो पृथ्वी पर पड़ा था और पृथ्वी में अणुरूप हो गया था, फिर आप किस शरीर से विचरे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अन्तवाहक शरीर से मैं विचरता फिरा था और
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उर्मी में सिद्धों, देवताओं, इन्द्र, वरुण और कुबेर के स्थानों में फिरा हूँ। परन्तु मुझे कोई न देखता था, मैं सबको देखता था। संकल्परचित पुरुष से मेरा व्यवहार हुआ था और किससे कहूँ ?
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! अन्तवाहक शरीर तो इन्द्रियों का विषय नहीं है, फिर सिद्ध से आपने चर्चा कैसे की और उसने आपको कैसे देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जो तुम कहते हो सो सुनो। सिद्ध को मैं इसलिए देख पड़ा कि मेरा संकल्प सत्य था। मुझे यह स्फुरणा हुआ कि सिद्ध मुझको देखे और मुझसे चर्चा करे इससे उसने मुझको देखा और उसका संकल्प भी मुझमें आया तब जाना। जो दोनों सिद्ध हों और उनका संकल्प भिन्न-भिन्न हो तो एक दूसरे के संकल्प को नहीं जानते, परन्तु किसी का विशेष संकल्प हो तो वह दूसरे के संकल्प को जानता है। इससे यद्यपि उसका संकल्प मेरे देखने को न था, पर मेरा दृढ़ संकल्प था, इससे मैं उसके संकल्प को खींचकर अपना ओर ले आया। जो बली होता है, उसी की जय होती है— इससे उसने मुझको देखा। हे राम ! जो अन्तवाहक में स्थित होता है, उसको तीनों कालों का ज्ञान होता है, परन्तु व्यवहार में लगे तो उसे भूल जाता है, और जो वर्तमान पदार्थ होता है, उर्मी का ज्ञान होता है। इसी कारण उसने मेरा शरीर डाल दिया था; क्योंकि वह समाधि के व्यवहार में लगा था, और मेरे संकल्प से वह कुटी भी तब गिरी थी, जब मैं अपने स्थान के व्यवहार को ऐसा चिन्तन करके चला था। जो मैं चिन्तन में न होता, अन्तवाहक शरीर में होता और उस कुटी का भविष्यत् विचार उस संकल्प को रहने देता तो वह सिद्ध न गिरता। पर मैं तो और ही व्यवहार में लगा था, इससे अन्तवाहक शरीर भूल गया, जिससे वह कुटी गिर पड़ी और सिद्ध भी गिर पड़ा।
हे राम ! इस प्रकार सिद्ध गिरा। उसमें चर्चा हुई, तब मैं वहाँ से चला और अन्तवाहक शरीर में आकाशमार्ग में फिरने लगा। सिद्धों के समूह और देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर, ऋषि, मुनि, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम आदि सबके स्थान देखे; परन्तु मुझको किसी ने न
⚙️ निर्वाण प्रकरण ६२३
देखा। मैं बड़े-बड़े शब्द करता कि किसी प्रकार कोई शब्द सुने और मुझको देखे, परन्तु मेरा शब्द कोई न सुनता और न कोई मुझको देख पाता। जैसे स्वप्न में कोई शब्द करे तो उसका शब्द कोई जाग्रत मनुष्य नहीं सुनता, और जैसे न संकल्पवाला दूसरे के सृष्टिव्यवहार का शब्द नहीं जानता, वैसे ही मुझको कोई न जानता था। हे राम! इस प्रकार में प्रथम आकाश में पिशाच की नाईं विचरा। फिर दैत्यों के स्थानों में विचरा। मैं सबको देखता था, पर मुझको कोई न देख पाता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! पिशाच का शरीर, जाति और क्रिया कैसी होती है? उनके रहने का स्थान कौन है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पिशाच की कथा से कुछ प्रयोजन न था, तथापि तुमने प्रसंगवश पूछा है, इसमें मैं कहता हूँ। पिशाच का आकार नहीं होता। वे जो जो रूप रखते हैं, सो सुनो। कई तो आकाश की नाईं शून्य होते हैं और परछाहीं की नाईं डराते हैं। कई शूकर और कई काकरूप रखकर स्थित होते हैं। ऐसे रूप रख वे विचरते हैं और सबको देखते और जानते हैं, पर उनको कोई नहीं जानता। शीत-उष्ण से भी वे दुःख पाते हैं और इच्छा, द्वेष, लोभ, मान, मोह, क्रोध आदि विकार उनमें भी रहते हैं। शीतल जल और अच्छे भोजन की भी वे इच्छा करते हैं और नगरों, वृक्षों और दुर्गन्धपूर्ण स्थानों में भी रहते हैं। कहीं सियार होकर दिखाई देते हैं, और कहीं श्वान होकर दिखते हैं। मन में भी प्रवेश करते हैं और मन्त्र, पाठ, दान आदि से जो वश होते हैं, वह भी अपनी अपनी वासना के अनुसार होते हैं। इनमें भी उत्तम, मध्यम और नीच होते हैं। जो उत्तम हैं वे देवताओं के स्थानों में, मध्यम मनुष्यों के स्थानों में और नीच नरकों में रहते हैं। इनकी उत्पत्ति अचैत्य चिन्मात्र से, जो दृश्य से रहित शुद्ध चैतन्य है, हुई है।
हे राम! सबका अपना रूप वही चैतन्यसत्ता कल्पवृक्ष की नाईं है। उसमें जैसी-जैसी वासना होती है, वैसा ही वैसा पदार्थ होकर भासित होता है। हे राम न कहीं पिशाच है और न जगत्! ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। शुद्ध आत्मत्वमात्र में किञ्चन 'अहं'
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होकर फुरा है। उसी को जीव कहते हैं। उस अहं की दृढ़ता में मन फुरा है। वह मन ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है। उस ब्रह्मा ने मनोराज्य में आगे जगत् उत्पन्न किया है और ब्रह्मा ही जगतरूप होकर स्थित हुआ है। वह ब्रह्मा ब्रह्म में स्थित है। हे राम! ब्रह्मा का शरीर अन्त-वाहक और केवल आकाशरूप है और उसके दृढ़ संकल्प में आधिभौतिक जगत् दृढ़ हुआ है—उसी मन से और मन हुआ है। हे राम! जैसे ब्रह्मा का शरीर अन्तवाहक है, वैसे ही सबका शरीर अन्तवाहक है। परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होता है और सब मनरूप है परन्तु दीर्घकाल का स्वप्न है। वह जाग्रत होकर स्थित हुआ है, इससे दृढ़ भासित होता है। जिनको शरीर में अहंकार है, उनको जगत् आधिभौतिक भासित होता है, और जो प्रबोधरूप हैं, उनको सब जगत् संकल्परूप है—वास्तव में कुछ उपजा नहीं। न तुम हो, न मैं हूँ, न ब्रह्मा है और न जगत् है—सभी ब्रह्मारूप हैं। जैसे आकाश और शून्यता में, अग्नि और उष्णता में, वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं है, ब्रह्मा और जगत् दोनों अज हैं। न ब्रह्मा ही उपजा है और न जगत् ही उपजा है—दोनों ब्रह्मारूप हैं। जो ब्रह्म से भिन्न दिखता है, वह भ्रान्तिमात्र है।
हे राम! पञ्चभूत और छठवाँ मन इनका नाम जगत् है। जबतक ये सत् उमग दिखते हैं, तबतक भ्रान्ति है और जब इनमें रहित केवल चैतन्य भासित हो, तब उसी का नाम परमपद है। हे राम! जब आत्म-पद में जागोगे, तब पञ्चभूत भी आत्मा से भिन्न न दिखेंगे। सबका अधिष्ठान चैतन्यसत्ता है। जबतक आत्मा का प्रमाद है, तबतक संसार-भ्रम न मिटेगा। सब जगत् निराकार संकल्पमात्र है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आकाश में स्थूलभूत दिखते हैं। ज्ञानकाल और अज्ञानकाल में जगत् उपजा नहीं, परन्तु अज्ञानी को दृढ़ भासित होता है। जैसे मनोराज्य में किसी ने नगर रचा हो तो वह उसी के हृदय में है और कहीं नहीं दिखता, वैसे ही जबतक जीव अज्ञाननिद्रा में सोया है, तब तक जगत् भासित होता है, पर जब जागेगा, तब आकाशरूप
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६२५
देखेगा। हे राम! अपना संकल्प अपने को नहीं बाँधता। जबतक स्वरूप का प्रमाद नहीं होता, तब तक ब्रह्मा का संकल्प ब्रह्मा को नहीं बन्धन करता। स्वरूप भी अहंप्रत्यय से तो संकल्परूप है। दूसरी कुछ वस्तु सत्य नहीं-आत्मा ही है। वास्तव में न जगत् का आदि है, न मध्य है और न अन्त है। न जगत् का होना है और न अनहोना है-आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! जब सर्वात्मा ही है, तब राग-द्वेष किसका हो? सब अपना रूप ही है। अपना रूप जो आत्मतत्त्व है उसका किञ्चन संवेदन फुरने से जगतरूप होकर स्थित हुआ है। जैसे किसी पुरुष ने मनोराज्य में एक स्थान रचा और उसमें भावना हुई तो वह आधिभौतिक भासित होने लग जाता है, वैसे ही यह जगत् भी ब्रह्मा का संकल्प है। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, रुद्र, वरुण और कुबेर आदि सब संकल्परूप हैं, पर संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! आत्मारूपी एक तालाब है, जिसमें चैतन्यरूपी जल है, फुरन-रूपी कीचड़ है। उसमें चौदह प्रकार के भूतजातरूप मेढक रहते हैं। वे सब संकल्पमात्र हैं।
हे राम! आकाश में एक आकाशक्षेत्र है, जिसमें शिला उत्पन्न होती हैं। स्वर्गलोक और देवता बड़ी शिला हैं। एक उनमें उज्ज्वल शिला है, वह ज्ञानवान् है। मध्यम शिला मनुष्य है। नीच शिला तिर्यक् आदि योनि हैं। सो भी निर्बीज अर्थात कारण से रहित हैं। अद्वैत आत्मा सदा अपने आपमें स्थित है-कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु भ्रान्ति से भिन्न-भिन्न भासता है। जैसे फेन बुलबुले और तरङ्ग सब जलरूप हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मरूप है। जैसे स्वप्न और संकल्प की सृष्टि कारण बिना होती है, वैसे ही यह जगत् कारण बिना संकल्प से उत्पन्न हुआ है। जैसे ब्रह्मादिक हुए हैं, वैसे ही पिशाच भी प्रकट हुए हैं। हे राम! जैसा किञ्चन आत्मा में होता है, वैसा ही होकर दिखता है। वास्तव में पृथ्वी आदि तत्त्व कहीं नहीं हैं। न कहीं ब्रह्मा उपजा है, न कोई जगत् उपजा है, सब भ्रममात्र हैं। जितने शरीर दिखते हैं, वे सब निर्वपु हैं; चेतनता में फुरे हैं सब जीवों का आदि
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अन्तर्वाहक शरीर है । जैसे ब्रह्मा का अन्तर्वाहक शरीर था, वैसे ही सब जीवों का अन्तर्वाहक शरीर होता है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधि-भौतिक भासित होता है ।
सब जीवों का अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है । उसी के अनु-सार सब की अपनी-अपनी सृष्टि होती है । जो तुम कहो कि भिन्न-भिन्न हैं, तो जीव इकट्ठे क्यों दिखते हैं ? चाहिए तो यह कि अपनी-अपनी सृष्टि में हों ? तो इसका उत्तर यह है कि जैसे एक नगरस्वामी और नगर में जाय और एक नगरस्वामी और में आवे और दोनों जाकर इकट्ठे बैठें, वैसे ही सब जीव इकट्ठे दिखते हैं, पर उनके इकट्ठे होने पर भी इसकी सृष्टि को वह नहीं देखता और उसकी सृष्टि को यह नहीं देखता, जैसे स्वप्न में जो भिन्न-भिन्न भूतजात होते हैं, वे अनुभव में इकट्ठे दिखते हैं और एक अनुभव में भिन्न-भिन्न होते हैं, एक दूसरे की सृष्टि को नहीं जानते । जीव को अन्तर्वाहक भूल गया है, इससे आधिभौतिक दृढ़ हो रहा है । जैसा अनुभव में अभ्यास होता है, वैसा ही दिखता है । जहाँ पिशाच होता है, वहाँ अन्धकार भी होता है । जो मध्याह्न का सूर्य उदय हो और पिशाच आगे आवे तो अन्ध-कार हो जाता है, ऐसा तमरूप वह होता है । जैसे उलूकादिक को प्रकाश में अन्धकार होता है, वैसे ही अनेक सूर्यों का प्रकाश हो तो भी पिशाच को अन्धकार ही रहता है । हे राम ! जैसा उनमें निश्चय होता है, वैसा ही भान होता है, क्योंकि उनका ओज तमरूप है । जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही भासता है । मुझको तो सदा आत्मा का निश्चय है, इससे मुझे सदा आत्मतत्त्व का भान होता है । जैसे पिशाच पाञ्चभौतिक शरीर से रहित चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं पाञ्चभौतिक शरीर से रहित आकाश में चेष्टा करता रहा हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे उत्तरार्धे उपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ २०५ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ, इसलिए पाञ्चभौतिक शरीर से रहित अन्तर्वाहक शरीर से विचरण करता रहा परन्तु मुझको
* निर्वाण प्रकरण * ६२७
कोई न देखता था । चन्द्रमा, सूर्य, सहस्र नेत्रवाले इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, ऋषीश्वर, मुनीश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी इस चर्मदृष्टि से मुझे न देख सके और मैं सबको देखता फिरता था । इन्द्र के निकट जाकर मैंने उसके अङ्ग हिलाये, परन्तु उसने मुझको न जाना । जैसे संकल्प का नर किर्मी को हिलाये और वह न देखे और आधिभौतिक शरीर न हिले, वैसे ही उनके शरीर मेरे हिलाने से नहीं हिले । इससे मैं अति मोह को प्राप्त हुआ कि इतने काल तक मैं रहा और मुझको कोई देख नहीं सकता । तब मैंने यह इच्छा की कि मुझको सब देखें । मैं तो सत्य-संकल्प था, इससे सब मुझे देखने लगे । जैसे कोई इन्द्रजाल को देखे; वैसे ही वे मुझको देखने लगे । जिसने पृथ्वी पर देखा उसने पृथ्वी से उपजा वशिष्ठ जाना । मनुष्यलोक में कई ने जल से उपजा जाना कि वारिज वशिष्ठ है । कई ने वायु से उपजा जाना और कई ने जाना कि सप्तऋषियों के बीच जो तेजोमय वशिष्ठ है, वही यह है । इस प्रकार जगत् में मुझको सब देखने लगे, और मैं सबके साथ व्यवहार करने लगा । इसी प्रकार जब बहुत काल व्यतीत हुआ, तब सबने भावना की दृढ़ता से पाञ्चभौतिक शरीर में मुझको देखा । सबको प्रथम वृत्तान्त भूल गया, आधिभौतिकता दृढ़ हो गई, जैसे अज्ञान से जीव स्वप्न के नर को आधिभौतिक देखता है, वैसे ही मेरे साथ उन्होंने आकार देखा, पर मुझको सदा अपने स्वरूप में अहंप्रत्यय से भिन्न कुछ द्वैत न भासित होता था, क्योंकि मैं ब्रह्मरूप था । मेरा वशिष्ठ नाम ऐसा है, जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम होता है । मैं तो चिदाकाशरूप हूँ, पर औरों को वशिष्ठ की प्रतीति उपजी है ।
हे राम ! तुम सरीखों को मेरा आकार दिखता है, पर मुझको आधिभौतिक और अन्तर्वाहक, दोनों शरीर चिदाकाश का किञ्चन भासते हैं । मैं सदा अद्वैतरूप निराकार हूँ । तुम्हारी और मेरी चेष्टा समान है, परन्तु मुझको सदा आत्मपद का निश्चय है, इस कारण मैं जीवन्मुक्त होकर विचरता हूँ । अज्ञानी को क्रिया में द्वैत भासता है और मुझको अक्रिया में भी अद्वैत भासता है । ब्रह्मा भी ब्रह्मरूप जान
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पड़ता है और उसका संकल्प जो जगत् है, वह भी ब्रह्मरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग जलरूप है—भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है—भिन्न कुछ नहीं। इसमें मैं चिदाकाशरूप हूँ—द्वैत कुछ नहीं फुरता। जब अहं जगता है, तब जगत् द्वैतरूप होकर भासता है। जैसे अहं के फुरने में स्वप्न की सृष्टि होती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी होती है। सो संकल्पमात्र है। ब्रह्मा और ब्रह्मा का जगत् संकल्प की दृढ़ता में आधि-भौतिक की नाईं प्रतीत होता है, पर वास्तव में न ब्रह्मा उपजा है और न जगत् उपजा है। चिदानन्द ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। वह सदा एकरस है। हे राम! सृष्टि के आदि में प्रलयपर्यन्त जो कुछ क्षोभ है, उसमें आत्मा सदा एकरस है। उनमें कभी क्षोभ नहीं, क्योंकि वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जो कुछ भासता है, वह अज्ञान से सिद्ध है। ज्ञान से जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे स्वप्नसृष्टि में किसी को कहीं निधि दिखे तो वह उसकी प्राप्ति के लिए यत्न करता है, पर जब जागता है तो उसको स्वप्न जानकर फिर उसे पाने का यत्न नहीं करता, वैसे ही जब आत्मबोध होता है, तब फिर इस जगत् में जगत्-बुद्धि नहीं रहती।
अज्ञान ही जगद्भ्रम का कारण है। उस अज्ञान की निवृत्ति का उपाय यही है कि इस महारामायण का विचार करे—इसी से संसार-भ्रम निवृत्त होगा। यह संसार अविद्या से वासनामात्र है। जो इसको सत्य जानकर इसकी ओर दौड़ते हैं, वे परमार्थ से शून्य, मूढ़, कीट और वानर की नाईं चञ्चल हैं। जिनके भोगों की सदा इच्छा रहती है, वे नीच पशु हैं, उनका संसार से उबरना कठिन है, क्योंकि उनके हृदय में सदा तृष्णा रहती है। वे वैराग्य को नहीं प्राप्त होते। हे राम! भोग तो ज्ञानवान् भी भोगते हैं, परन्तु वे भोगबुद्धि से नहीं भोगते, किन्तु प्रवाहपतित जो कुछ प्रारब्धवेग से प्राप्त होता है, उसको भोगते हैं; वे जानते हैं कि गुणों में गुण बरतते हैं। वे इन्द्रियों सहित भोग को भ्रान्तिमात्र जानते हैं। जो अज्ञानी हैं, वे आसक्त होकर भोगते और तृष्णा करते हैं और भोग की तृष्णा से उनका हृदय जलता है—इसी
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६२६
का नाम बन्धन है। भोग दुःखरूप हैं। जो इनको सेवते हैं वे हृदय में सदा तृष्णा से जलते हैं। उनका द्वैतरूप जगतभ्रम कभी नहीं मिटता। पर ज्ञानवान् सदा आत्मा में तृप्त रहते हैं, इससे शान्तरूप हैं। जैसे हिमालय पर्वत में सब पदार्थ शीतल हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से हृदय शीतल हो जाता है, आत्मानन्द की प्राप्ति होती है और कोई दुःख नहीं रहता। जिनका चित्त सदा स्त्री, पुत्र और धन में आसक्त है और इनकी जो इच्छा करते हैं, वे महामूर्ख और नीच हैं। उनको धिक्कार है। जिसको आत्मपद की इच्छा हो, उसको सदा सन्तों का संग करना चाहिए और शास्त्रों को श्रवण कर उन पर विचार करना चाहिये। इस अभ्यास से आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे रामचन्द्र! इस शास्त्र का विचार परमपद को प्राप्त करानेवाला है। जो पुरुष इस शास्त्र को त्यागकर और की ओर लगते हैं, वे मूर्ख हैं। वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब सायंकाल का समय हुआ और सब श्रोता परस्पर नमस्कार करके गये और सूर्य की किरणों के उदय होने पर फिर आकर स्थित हुए।
इति श्रीयो० अन्तरोपा० वर्णनसमाप्तिर्नामद्विशताधिकषष्ठस्सर्गः ॥२०६॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमको यह अन्तरोपाख्यान सुनाया है, इसके विचार से जगतभ्रम नष्ट हो जावेगा। ऐसे जब तुम विचार कर देखोगे, तब आत्मा में अनन्त ब्रह्माण्ड समाते देख पड़ेंगे। हे राम! आत्मा में जगत् कुछ वास्तव में नहीं हुआ, इससे मिटता भी नहीं। चित्त के फुरने से भासता है। जब चित्त का फुरना अधिष्ठान में लीन हो जावेगा, तब अद्वैततत्त्व आत्मा ही भासित होगा। हे राम! अद्वैततत्त्व में जगत् भ्रम से दिखता है। ज्ञानवान् की दृष्टि में सदा अद्वैत ही आता है। जगत्, मैं और तुम, सब चिदाकाश है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं—आत्मसत्ता ही जगत् होकर दिखती है। जैसे अपना अनुभव स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि होकर दिखता है, सो अनुभवरूप ही है, वैसे ही यह जगत् भी चिदाकाशरूप है। यदि नाना प्रकार के विकार भी दिखते हैं, तो भी आत्मसत्ता उनमें अनुस्यूत और अखण्डरूप है—आत्मसत्ता और जगत्
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में भेद कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण और भूषणों में भेद नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। ब्रह्म ही चेतनता से जगतरूप होकर दिखता है। जैसे स्वप्न में अपने ही अनुभव से बहुत विस्तृत होकर जगत् भासित होता है, सो अनुभव से इतर कुछ नहीं हुआ, और जैसे समुद्र और तरङ्गों में कुछ भेद नहीं; वैसे ही ब्रह्म, जगत् और अनुभव तीनों में कुछ भेद नहीं—असम्यक्दृष्टि से भेद भासता है, सम्यक्दृष्टि से कोई भेद नहीं। हे राम ! आत्मसत्ता में प्रथम जो आभास फुरा है वह ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है। वह चिदाकाशरूप ब्रह्मा है और वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उसी ब्रह्मसत्ता ने अपने भाव को नहीं त्यागा और ब्रह्मारूप होकर स्थित हुई है। फिर उसने जगत् रचा। इसलिए वह जगत् भी आकाशरूप है। पर वास्तव में न जगत् उपजा है, न ब्रह्मा उपजा है और न स्वप्न हुआ है। परमार्थसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अनन्त, अविनाशी, अचेत चिन्मात्र है। जगत् भी वही स्वरूप है।
हे राम ! मैं चिदाकाशरूप हूँ। न मेरे साथ कोई आकार है, न मैं कभी उपजता हूँ और न मैं कभी मृतक होता हूँ। मैं नित्य, शुद्ध, अजर, अमर सदा अपने स्वभाव में स्थित हूँ। मैं अनेक विकारों में भी एकरस हूँ। जैसे स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं, तो भी जाग्रत् शरीर को स्पर्श नहीं करते, क्योंकि उनमें कुछ हुआ नहीं, आभासमात्र हैं, वैसे ही जगत् की उत्पत्ति-प्रलयादिक क्षोभ में आत्मसत्ता को स्पर्श नहीं होता, अर्थात् वह क्षोभ से रहित सदा अनुभवरूप है। जिस पुरुष ने ऐसे अनुभव को नहीं पहिचाना, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है, और उसे छिपाया है, वह महामूर्ख और आत्महंता है—वह महाआपदा के समुद्र में डूबेगा। जिसको अपने स्वरूप में अहं-प्रत्यय हुआ है, उसको मानसी दुःख कभी नहीं स्पर्श करता। जैसे पर्वत को चूहा नहीं चूर्ण कर सकता, वैसे ही इसको दुःख नहीं स्पर्श करता। जिसको आत्मा में अहं-प्रत्यय नहीं, उसको शान्ति नहीं प्राप्त होती। जैसे बवंडर में उड़ा हुआ तृण स्थिर नहीं होता, वैसे ही देह-अभिमानी को कभी शान्ति नहीं प्राप्त
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१
होती। जो अपने शुद्ध स्वरूप को त्यागकर अपने को देह में मिला हुआ जानता है, वह क्या करता है? चिन्तामणि को त्यागकर काँच को अङ्गीकार करना और शुद्ध चिन्मात्र अपने स्वरूप को त्यागकर देह में आत्म-अभिमान करना समान है।
हे राम! जब जीव अनात्म में आत्मअभिमान करता है, तब अपने को विकारवान् और जन्मता-मरता मानता है। और जब देह अभिमान को त्यागकर आत्मा को आत्मा मानता है, तब न जन्मता है, न मरता है, न शस्त्र से कटता है, न अग्नि से जलता है, न जल में डूबता है और न पवन से सूखता है—क्योंकि वह निराकार, अविनाशी और चिदाकाशरूप है। हे राम! यदि चेतन की मृत्यु होती हो तो पिता के मरने से पुत्र भी मर जाता और एक के मरने से सभी मर जाते, क्योंकि आत्मसत्ता चेतन एक और सबमें अनुस्यूत है। पर एक के मरने से सब नहीं मरते, इससे चैतन्य आत्मा की मृत्यु कभी नहीं होती। शरीर को काटने से आत्मा नहीं कटता, शरीर के जलने पर आत्मा नहीं जलता। सम्पूर्ण विश्व भस्म हो जाय तो भी आत्मा भस्म नहीं होता। आत्मा नित्य, शुद्ध, अनन्त, अच्युतरूप है—कभी स्वरूप से अन्यथा भाव को नहीं प्राप्त हुआ। हे राम! मैं ब्रह्मरूप हूँ, अर्थात् सबमें अहँरूप निराकार अखण्ड मैं हूँ। न मुझको जन्म है और न मृत्यु है। सुख की इच्छा नहीं। न कुछ हर्ष है, न शोक है। न जीने की इच्छा है न मरने की। जैसे रम्मी में सर्प और सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं, वैसे ही आत्मा में वशिष्ठ नाम-रूप है। मैं देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध और बोधरूप हूँ। सबका स्वरूप आत्मतत्त्व है। परन्तु वास्तवस्वरूप के प्रमाद से अवस्तु को प्राप्त हुए की नाईं भासित होता है। जो पुरुष स्वरूप में स्थित नहीं हुए, वे संसार-मार्ग की ओर दृढ़ हुए हैं। उनका जीना वृथा है। वे कहने भर को चैतन्य हैं। अमल में पाषाण की शिला-सदृश हैं। जैसे लुहार की धौंकनी से पवन निकलता है, वैसे ही उनका माँस लेना वृथा है। वे घड़ीयन्त्र की नाईं वासना में भटकते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते
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और सदा तपते रहते हैं । जिनकी आत्मपद में स्थिति हुई है, उनको दुःख कभी स्पर्श नहीं करता । यदि प्रलयकाल का पवन चले और पुष्करमेघ की वर्षा हो, वड़वाग्नि लगे और द्वादश सूर्य तपें, तो भी वे ऐसे क्षोभों में भी चलायमान नहीं होते, क्योंकि वे सब ब्रह्मस्वरूप जानते हैं । जैसे तृण से पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही वे बड़े दुःखों में भी चलायमान नहीं होते । दुःख तब होता है जब आत्मा से भिन्न कुछ भासता है । पर उनको तो आत्मा से भिन्न कुछ भासता ही नहीं ।
हे राम ! यह जब सब जगत् आत्मानुभवरूप है, क्योंकि यह आत्मरूप है । जैसे स्वप्न में अनुभव से भिन्न कुछ वस्तु नहीं होती, वैसे ही सब जगत् अनुभवरूप है । जो भिन्न भासता है, वह भ्रान्तिमात्र है । यह जगत् जो नाना प्रकार का दिखता है, सो आत्मा में अव्यक्तरूप है और भ्रम से प्रकट दिखता है । जैसे आकाश में नीलापन भ्रम से सिद्ध है, वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से सिद्ध है । वास्तव में ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं; आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है और उसमें जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसा ही वैसा अधिष्ठानरूप होकर भासित होता है । जिनको कारण में सृष्टि का होना दृढ़ हो रहा है, उनको वैसा ही भासता है । जिनको परमाणुओं से सृष्टि उत्पन्न होने का निश्चय है, उनको वैसे ही सृष्टि सत्य भासित होती है और माध्यमिक, सत्-असत् के मध्य वस्तु को मानते हैं एक चार्वाक म्लेंच्छ हैं, जो चारों तत्त्वों से सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं बौद्ध कहते हैं कि जो कुछ वस्तु है, वह बोध है । उसका अभाव होने में सब शून्य है । ब्राह्मण, हाथी, गो, श्वान, घोड़ा, सूर्यादिक में भिन्न-भिन्न प्रतीत हो रही है, पर जो ज्ञानवान् ब्राह्मण हैं, वे सबमें एक ब्रह्मसत्ता अनुस्यूत देखते हैं । हे राम ! वस्तु तो एक है पर उसमें जिसको जैसा निश्चय हुआ है, उसे वैसा ही भासता है । जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु में जैसा भावना करते हैं, वैसी ही सिद्धि होती है, वैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना करते हैं, वैसा ही रूप भासता है । हे राम ! बुद्धिमानों ने निर्णय किया है कि आत्मसत्ता
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ही सारभूत है; जब उसमें दृढ अभ्यास करोगे तब आत्मसत्ता ही दिखेगी और फिर उस निश्चय से चलायमान न होगे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! पाताल, भूतल और स्वर्ग में बुद्धिमान कौन हैं, जिनको पूर्वापर के विचार से परावर का साक्षात्कार हुआ है ? और वे आत्म-स्वरूप का निश्चय कैसे करते हैं ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब जगत् इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा से जलता है, इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट की प्राप्ति में शोक करता है। ऐसा कोई बिरला ही है, जो जगत् में सूर्य की नाईं प्रकाशता है, नहीं तो सब तृण की तरह भोगरूपी वायु में भटकते हैं। जो सबमें श्रेष्ठ कहाता है, वह भी विषयरूपी अग्नि में जलता है। जैसे कीड़े अशुभ स्थानों में रहते हैं और उनमें अपने को प्रसन्न मानते हैं, वैसे ही देवता भी सदा भोगरूपी अपवित्र स्थानों में अपने को प्रसन्न मानते हैं, सो वे मेरे मत में दुर्गन्ध के कृमि हैं। गन्धर्व तो मूढ़ हैं। उनको तो कुछ सुधि नहीं अर्थात् आत्मपद को गन्ध भी नहीं—वे तो मेरे मत में मृग हैं। जैसे मृग को राग में आनन्द होता है, वैसे ही गन्धर्व राग में उन्मत्त रहते हैं और आत्मपद से विमुख हैं। विद्याधर भी मूर्ख हैं, क्योंकि वे वेद के अर्थरूपी चतुराई को अग्नि में जलाते हैं और वेद के सारभूत अमृत को नहीं जानते, इसलिए आत्मपद से विमुख हैं। सिद्ध मेरे मत में पक्षी हैं। वे पक्षी की नाईं उड़ते फिरते हैं और अभिमानरूपी पवन के चलने से अनात्मरूपी गढ़े में आ पड़ते हैं। अपने वास्तवस्वरूप में स्थित नहीं होते। यक्ष धन के अभिमान से मूर्ख की नाईं प्रीति कर जलते हैं और आत्मपद में स्थित नहीं पाते। योगिनी भी मद में सदा उन्मत्त रहती हैं, इससे आत्मपद में स्थिति नहीं पातीं। दैत्यों को भी सदा देवताओं को मारने की इच्छा रहती है, इससे सदा शोक में रहते हैं और आत्मपद से विमुख हैं। तुम तो पहिले से ही जानते हो मनुष्य भी आत्मपद से गिरे हुए हैं; क्योंकि उनकी सदा यही इच्छा रहती है कि गृह बनाइये। वे खाने और धन इकट्ठा करने के निमित्त यत्न करते हैं और इन्द्रियों के विषयों में डूबे हुए हैं। पाताल में नाग रहते हैं,
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जिनका जल में भी निवास है। ये सुन्दर नागिनियों में आसक्त हैं, इसलिए वे भी आत्मानन्द में गिरे हुए हैं। निदान जितने प्राणी हैं, वे सब विषयों के सुख में लगे हुए हैं और आत्मपद से विमुख हैं। सब जातियों में विरले जीवन्मुक्त और ज्ञानवान् भी हैं—उन्हें सुनो।
देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सदा आत्मानन्द में मग्न रहते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, इन्द्र, धर्मराज, वरुण, कुबेर, ब्रहस्पति, शुक्र, नारद, कच आदि जीवन्मुक्त पुरुष हैं। सप्तऋषि, दक्षप्रजापति, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन जीवन्मुक्त हैं। और भी बहुत मुक्त हैं। सिद्धों में कपिलमुनि; यक्षों में विद्याधर और योगी और दैत्यों में हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद, बलि, विभीषण, इन्द्रजित, मारिच, चित्रासुर और नमुचि आदि जीवन्मुक्त हैं। मनुष्यों में राजर्षि और ब्रह्मर्षि, नागों में शेषनाग, वासुकि नाग आदि जीवन्मुक्त हैं। ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और शिवलोक में कोई कोई विरले जीवन्मुक्त हैं। हे राम! जाति जाति में जो जीवन्मुक्त हुए हैं, वे तुमसे संक्षेप में कहे हैं। जहाँ जहाँ देखता हूँ, वहाँ-वहाँ अज्ञानी ही बहुत हैं, ज्ञानवान् कोई विरला ही दिखता है। जैसे सब जगह वृक्ष बहुत हैं, परन्तु कल्पवृक्ष विरला होता है; वैसे ही संसार में अज्ञानी बहुत हैं, ज्ञानी कोई विरला है। हे राम! सूरमा और कोई नहीं, जिसकी आत्मपद में स्थिति हुई है वही सूरमा है और संसार समुद्र तरना उर्मी के लिए सुगम है।
इति श्रीयो० निर्वाण० मुक्तसंज्ञावर्णनं नाम द्विशताधिकसप्तसप्ततितमः सर्गः॥२०७॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो विवेकी विरक्तचित्त पुरुष हैं, जिनके स्वरूप में स्थित हुई है, उनके राग, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, अभिमान, दम्भ आदि विकार स्वाभाविक नष्ट हो जाते हैं। जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार स्वाभाविक निवृत्त हो जाता है और जैसे बाण को देखकर कौआ भाग जाता है, वैसे ही विवेकरूपी बाण को देखकर विकाररूपी कौए भाग जाते हैं। विवेकी पुरुषों के हृदय में इतने गुण स्वाभाविक स्थित होते हैं कि वे किसी पर क्रोध नहीं करते, और जो करते भी दिखते हैं, सो किसी निमित्तमात्र जानना। उनके हृदय में सदा शान्ति
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और दया रहती है। जो कोई उनके निकट आता है, वह भी शीतल हो जाता है, क्योंकि वे निरावरण स्थित हैं। जैसे चन्द्रमा के निकट जाने से शीतलता होती है, वैसे ही ज्ञानवान् के निकट आने से हृदय शीतल होता है, और कोई पुरुष उनसे उद्विग्न नहीं होता। जो कोई निकट आता है, उसको वे विश्राम के लिए स्थान देते हैं और उसकी कामना भी पूर्ण करते हैं। जैसे कमलों के निकट भौंरा जाता है तो वे उसको विश्राम का स्थान देते हैं और सुगन्ध से उसको सन्तुष्ट करते हैं, वैसे ही सन्तजन निहाल कर देते हैं। वे यथाशास्त्र चेष्टा करते हैं और हेयोपादेयकी विधि को भी जानते हैं। जो कुछ उन्हें स्वाभाविक प्राप्त हो, उसको वे शास्त्र की विधि सहित अङ्गीकार भी करते हैं और हृदय में गर्व की भावना से रहित हैं। उनमें दान-स्नान आदि शुभ क्रिया स्वाभाविक होती हैं। उदारता, वैराग्य, धैर्य, शम, दम आदि गुण भी स्वाभाविक होते हैं। वे इस लोक और परलोक में भी सुख देनेवाले हैं।
हे राम ! जिन पुरुषों में ऐसे गुण पाइये, वे ही सन्त हैं। जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार होते हैं, वैसे ही सन्तजन संसारसमुद्र से पार करनेवाले हैं। जिनको सन्तजनों का आश्रय हुआ है, वे ही तरे हैं। सन्तजन संसारसमुद्र के पार के पर्वत हैं। जैसे समुद्र में बहुत जल होता है, तो बड़े तरङ्ग उछलते हैं और उसमें बड़े मच्छ रहते हैं, पर जब उसका प्रवाह उछलता है, तब पर्वत उस प्रवाह को रोकता है और उछलने नहीं देता, वैसे ही चित्तरूपी समुद्र में इच्छारूपी तरङ्ग और राग-द्वेषरूपी मच्छ रहते हैं और जब इच्छारूपी तरङ्ग का प्रवाह उछलता है, तब सन्तरूपी पर्वत उसको रोकते हैं। सन्तजन अपने चित्त को भी रोकते हैं और जो उनके निकट कोई जाता है तो उसकी भी रक्षा करते हैं। यदि शरीर नष्ट होने लगे अथवा नगर नष्ट होने लगे या निकट अग्नि लगे तो भी ज्ञानवानों का हृदय स्वरूप से चलायमान नहीं होता। वे सदा अपने स्वरूप में स्थिर रहते हैं। जैसे भूकम्प में सुमेरु चलायमान नहीं होता, वैसे ही वे भी चलायमान नहीं होते। ये जो मैंने तुमसे शुभ गुण स्नान, दान आदि कहे हैं सो जीवों को सुख
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देनेवाले और दुःख को निवृत्त करनेवाले हैं । इनमें सुख की प्राप्ति हो है । और दुःख नष्ट हो जाता है । जब स्नान-दान की ओर मनु आता है, तब सन्तों की संगति में भी उसका चित्त लगता है । जब मन् की संगति में चित्त लगा, तब क्रम से परमपद की प्राप्ति होती है इसमें मनुष्य का यही कर्तव्य है कि शास्त्र के अनुसार शुभ चेष्टा : और सन्तों के निश्चय का अभ्यास करे ।
हे राम ! जिसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है, वह भी सन्त जाता है । सन्तों का संग वृथा नहीं जाता । जैसे अग्नि से मिला पद अग्निरूप हो जाता है, वैसे ही सन्तों के संग से असन्त भी सन्त जाता है और मूर्खों की संगति से साधु भी मूर्ख हो जाता है । जै उज्ज्वल वस्त्र मल के संग से मलिन गंदा हो जाता है, वैसे ही मूढ़ का संग करने से साधु भी मूढ़ हो जाता है, क्योंकि पाप के वश उपद्रव होते हैं, इसी से पाप के वश साधु को भी दुर्जनों की संगति से दुर्जनता घेर लेती है । इसमें हे राम ! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिये और सन्तों की संगति कर्तव्य है । जो परमहंस सन्त मिले और जो मा हो और जिसमें एक गुण भी शुभ हो, उसका भी अङ्गीकार कीजिये परन्तु साधु के दोष न विचारिये—उसके शुभगुण ही ग्रहण कीजिये— जैसे भौंरा केतकी के कणटकों की ओर नहीं देखता, उसकी सुगन्ध को ग्रहण करता है । इससे हे राम ! संसारमार्ग को त्यागकर सन्तों की संगति करो, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा ।
इति श्रीयो०नि० जीवन्मुक्तव्यवहारोनामद्विशताधिकअष्टमसर्गः ॥ २०८ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! हमारे दोष तो सतशास्त्र, सतसंग और उनकी युक्ति से और तीर्थ-स्नान, दान, जप और पूजा से निवृत्त होते हैं, पर और जीव जो कीट, पतङ्ग, पशु, पक्षी आदि हैं, उनके दुःख कैसे निवृत्त होंगे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो वास्तव सत्ता है, ऊर्मी का नाम ब्रह्म है । वह अखण्ड अद्वैत है । उसमें कुछ द्वैत का विभाग नहीं है । परन्तु उसमें जो चित्त किञ्चन आभास फुरा है, वह फुरना ही नानात्व हुए की तरह स्थित हुआ है, वास्तव में कुछ हुआ नहीं । जैसे
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स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि दिखती है, परन्तु वास्तव में हुई नहीं, निद्रादोष से दिखती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी वास्तव में नहीं हुई, अज्ञान से जीवों को भासित होती है। वास्तव में सब जीव ब्रह्मरूप हैं, पर अपने स्वरूप के प्रमाद से जीवत्वभाव को अङ्गीकार किया है। उस अङ्गीकार और अनात्म देहादिक में आत्मअभिमान से जीव जैसा निश्चय करता है, वैसी ही गति पाता है। देश, काल, क्रिया और द्रव्य का जैसा संकल्प अनुभवसत्ता में दृढ़ होता है, वैसा ही भासता है। उसमें चार अवस्था कल्पित होती हैं और जैसी-जैसी भावना होती है, उसके अनुसार अवस्था का अनुभव होता है। वे चार अवस्था ये हैं—एक घनसुषुप्ति; दूसरी क्षीणसुषुप्ति, तीसरी स्वप्न अवस्था और चौथी जाग्रत। पर्वत और पाषाण घनसुषुप्ति में हैं। जैसे सुषुप्ति अवस्था में कुछ नहीं फुरता, जड़ीभूत हो जाता है, वैसे ही इनको कुछ नहीं फुरता—घन सुषुप्ति में स्थित हैं। वृक्ष क्षीणसुषुप्ति में स्थित हैं। जैसे क्षीणसुषुप्ति में कुछ फुरना फुरता है, वैसे ही वृक्षों में भी फुरना होता है, इससे वे क्षीणसुषुप्ति में हैं। पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि तिर्यक् जीव स्वप्न अवस्था में स्थित हैं। जैसे स्वप्न में पदार्थ दिखता है, परन्तु स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही इनको थोड़ा सूक्ष्म ज्ञान है, इससे ये स्वप्न अवस्था में स्थित हैं। मनुष्य और देवता जाग्रतरूप जगत् का अनुभव करते हैं।
हे राम ! ये चारों अवस्था आत्मा में स्थित हैं। छोटे बड़े सबका अहंप्रत्ययरूप आत्मा है। उसमें जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही वह दिखता है। हे राम ! हमको एक दिन व्यतीत होता है और चींटी को उसी में युग का अनुभव होता है। हमको जो सूक्ष्म अणु होता है, उनको वही पर्वत के समान लगता है। हे राम ! स्वरूप सबका एक आत्मसत्ता ही है, परन्तु भावना में भिन्न-भिन्न भासित होता है। एक कीट है, जो बहुत सूक्ष्म है। जब वह चलता है, तब जानता है कि मेरा गरुड़ का सा वेग है और उसको वही सत् हो रहा है। बाल-खिल्यों का अंगुष्ठप्रमाण शरीर है। उनको वही बड़ा दिखता है और विराट् को वही अपना बड़ा शरीर लगता है। निदान जैसी जिसकी