सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1440, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1440

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ <span style="float:right;">६३५</span>

और दया रहती है। जो कोई उनके निकट आता है, वह भी शीतल हो जाता है, क्योंकि वे निरावरण स्थित हैं। जैसे चन्द्रमा के निकट जाने से शीतलता होती है, वैसे ही ज्ञानवान् के निकट आने से हृदय शीतल होता है, और कोई पुरुष उनसे उद्विग्न नहीं होता। जो कोई निकट आता है, उसको वे विश्राम के लिए स्थान देते हैं और उसकी कामना भी पूर्ण करते हैं। जैसे कमलों के निकट भौंरा जाता है तो वे उसको विश्राम का स्थान देते हैं और सुगन्ध से उसको सन्तुष्ट करते हैं, वैसे ही सन्तजन निहाल कर देते हैं। वे यथाशास्त्र चेष्टा करते हैं और हेयोपादेयकी विधि को भी जानते हैं। जो कुछ उन्हें स्वाभाविक प्राप्त हो, उसको वे शास्त्र की विधि सहित अङ्गीकार भी करते हैं और हृदय में गर्व की भावना से रहित हैं। उनमें दान-स्नान आदि शुभ क्रिया स्वाभाविक होती हैं। उदारता, वैराग्य, धैर्य, शम, दम आदि गुण भी स्वाभाविक होते हैं। वे इस लोक और परलोक में भी सुख देनेवाले हैं।

हे राम ! जिन पुरुषों में ऐसे गुण पाइये, वे ही सन्त हैं। जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार होते हैं, वैसे ही सन्तजन संसारसमुद्र से पार करनेवाले हैं। जिनको सन्तजनों का आश्रय हुआ है, वे ही तरे हैं। सन्तजन संसारसमुद्र के पार के पर्वत हैं। जैसे समुद्र में बहुत जल होता है, तो बड़े तरङ्ग उछलते हैं और उसमें बड़े मच्छ रहते हैं, पर जब उसका प्रवाह उछलता है, तब पर्वत उस प्रवाह को रोकता है और उछलने नहीं देता, वैसे ही चित्तरूपी समुद्र में इच्छारूपी तरङ्ग और राग-द्वेषरूपी मच्छ रहते हैं और जब इच्छारूपी तरङ्ग का प्रवाह उछलता है, तब सन्तरूपी पर्वत उसको रोकते हैं। सन्तजन अपने चित्त को भी रोकते हैं और जो उनके निकट कोई जाता है तो उसकी भी रक्षा करते हैं। यदि शरीर नष्ट होने लगे अथवा नगर नष्ट होने लगे या निकट अग्नि लगे तो भी ज्ञानवानों का हृदय स्वरूप से चलायमान नहीं होता। वे सदा अपने स्वरूप में स्थिर रहते हैं। जैसे भूकम्प में सुमेरु चलायमान नहीं होता, वैसे ही वे भी चलायमान नहीं होते। ये जो मैंने तुमसे शुभ गुण स्नान, दान आदि कहे हैं सो जीवों को सुख