योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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देनेवाले और दुःख को निवृत्त करनेवाले हैं । इनमें सुख की प्राप्ति हो है । और दुःख नष्ट हो जाता है । जब स्नान-दान की ओर मनु आता है, तब सन्तों की संगति में भी उसका चित्त लगता है । जब मन् की संगति में चित्त लगा, तब क्रम से परमपद की प्राप्ति होती है इसमें मनुष्य का यही कर्तव्य है कि शास्त्र के अनुसार शुभ चेष्टा : और सन्तों के निश्चय का अभ्यास करे ।
हे राम ! जिसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है, वह भी सन्त जाता है । सन्तों का संग वृथा नहीं जाता । जैसे अग्नि से मिला पद अग्निरूप हो जाता है, वैसे ही सन्तों के संग से असन्त भी सन्त जाता है और मूर्खों की संगति से साधु भी मूर्ख हो जाता है । जै उज्ज्वल वस्त्र मल के संग से मलिन गंदा हो जाता है, वैसे ही मूढ़ का संग करने से साधु भी मूढ़ हो जाता है, क्योंकि पाप के वश उपद्रव होते हैं, इसी से पाप के वश साधु को भी दुर्जनों की संगति से दुर्जनता घेर लेती है । इसमें हे राम ! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिये और सन्तों की संगति कर्तव्य है । जो परमहंस सन्त मिले और जो मा हो और जिसमें एक गुण भी शुभ हो, उसका भी अङ्गीकार कीजिये परन्तु साधु के दोष न विचारिये—उसके शुभगुण ही ग्रहण कीजिये— जैसे भौंरा केतकी के कणटकों की ओर नहीं देखता, उसकी सुगन्ध को ग्रहण करता है । इससे हे राम ! संसारमार्ग को त्यागकर सन्तों की संगति करो, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा ।
इति श्रीयो०नि० जीवन्मुक्तव्यवहारोनामद्विशताधिकअष्टमसर्गः ॥ २०८ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! हमारे दोष तो सतशास्त्र, सतसंग और उनकी युक्ति से और तीर्थ-स्नान, दान, जप और पूजा से निवृत्त होते हैं, पर और जीव जो कीट, पतङ्ग, पशु, पक्षी आदि हैं, उनके दुःख कैसे निवृत्त होंगे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो वास्तव सत्ता है, ऊर्मी का नाम ब्रह्म है । वह अखण्ड अद्वैत है । उसमें कुछ द्वैत का विभाग नहीं है । परन्तु उसमें जो चित्त किञ्चन आभास फुरा है, वह फुरना ही नानात्व हुए की तरह स्थित हुआ है, वास्तव में कुछ हुआ नहीं । जैसे