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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1438, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1438

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६३३

ही सारभूत है; जब उसमें दृढ अभ्यास करोगे तब आत्मसत्ता ही दिखेगी और फिर उस निश्चय से चलायमान न होगे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! पाताल, भूतल और स्वर्ग में बुद्धिमान कौन हैं, जिनको पूर्वापर के विचार से परावर का साक्षात्कार हुआ है ? और वे आत्म-स्वरूप का निश्चय कैसे करते हैं ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब जगत् इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा से जलता है, इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट की प्राप्ति में शोक करता है। ऐसा कोई बिरला ही है, जो जगत् में सूर्य की नाईं प्रकाशता है, नहीं तो सब तृण की तरह भोगरूपी वायु में भटकते हैं। जो सबमें श्रेष्ठ कहाता है, वह भी विषयरूपी अग्नि में जलता है। जैसे कीड़े अशुभ स्थानों में रहते हैं और उनमें अपने को प्रसन्न मानते हैं, वैसे ही देवता भी सदा भोगरूपी अपवित्र स्थानों में अपने को प्रसन्न मानते हैं, सो वे मेरे मत में दुर्गन्ध के कृमि हैं। गन्धर्व तो मूढ़ हैं। उनको तो कुछ सुधि नहीं अर्थात् आत्मपद को गन्ध भी नहीं—वे तो मेरे मत में मृग हैं। जैसे मृग को राग में आनन्द होता है, वैसे ही गन्धर्व राग में उन्मत्त रहते हैं और आत्मपद से विमुख हैं। विद्याधर भी मूर्ख हैं, क्योंकि वे वेद के अर्थरूपी चतुराई को अग्नि में जलाते हैं और वेद के सारभूत अमृत को नहीं जानते, इसलिए आत्मपद से विमुख हैं। सिद्ध मेरे मत में पक्षी हैं। वे पक्षी की नाईं उड़ते फिरते हैं और अभिमानरूपी पवन के चलने से अनात्मरूपी गढ़े में आ पड़ते हैं। अपने वास्तवस्वरूप में स्थित नहीं होते। यक्ष धन के अभिमान से मूर्ख की नाईं प्रीति कर जलते हैं और आत्मपद में स्थित नहीं पाते। योगिनी भी मद में सदा उन्मत्त रहती हैं, इससे आत्मपद में स्थिति नहीं पातीं। दैत्यों को भी सदा देवताओं को मारने की इच्छा रहती है, इससे सदा शोक में रहते हैं और आत्मपद से विमुख हैं। तुम तो पहिले से ही जानते हो मनुष्य भी आत्मपद से गिरे हुए हैं; क्योंकि उनकी सदा यही इच्छा रहती है कि गृह बनाइये। वे खाने और धन इकट्ठा करने के निमित्त यत्न करते हैं और इन्द्रियों के विषयों में डूबे हुए हैं। पाताल में नाग रहते हैं,