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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1422, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1422

💥 निर्वाण प्रकरण 💥 ६१७

स्थित हूँ और सब कुछ कहूँगा। परन्तु जल्दी मत कर—मैं स्मरण करके कहता हूँ। हे राम! मुझसे इस प्रकार कहकर वह स्मरण करने लगा और फिर स्मरण करके बोला—हे वशिष्ठजी! मुझको क्षमा करो, क्योंकि सन्तों का स्वभाव शान्त होता है। मुझसे तुम्हारी बड़ी अवज्ञा हुई है, परन्तु तुम क्षमा करो—मेरा तुमको नमस्कार है।

हे राम! इस प्रकार नमस्कार करके उसने निर्मल आनन्द उपजाने-वाले ये वचन कहे—हे मुनीश्वर! संसार एक नदी है, जिसका बड़ा प्रवाह है और वह कभी नहीं सूखता। चित्तरूपी समुद्र से यह प्रवाह निकलता है। जन्म-मरण इसके दोनों किनारे हैं। रागद्वेष ही इसमें तरङ्ग हैं। भोग की तृष्णा इसमें आवर्त है—उसमें मैंने बड़ा दुःख पाया है। हे मुनीश्वर! अपने सुख के निमित्त देवों के स्थानों में भी मैं गया, दिव्यभोग भोगे और स्पर्श आदि जो भोग हैं, वे भी सब मैंने भोगे। परन्तु मुझको शान्ति नहीं प्राप्त हुई। जिस सुख को मैं चाहता था, वह न पाया। जैसे पपीहा मेघ की बूँद चाहता है और मरुस्थल की भूमि में उसको शान्ति नहीं मिलती, वैसे ही मुझको विषयों के सुख में शान्ति न हुई। हे मुनीश्वर! इस जगत् को असार जानकर मेरा चित्त विरक्त हुआ है कि इतने काल तक मैंने भोग भोगे, परन्तु मुझको शान्ति न हुई। इनको असत् जानकर मैं फिरा और विचार किया कि जो सार हो, उसे अपनाऊँ। तब मैंने जाना कि सार अपना अनुभवरूप ज्ञानसंवित् ही है—इससे मैं उसी में स्थित हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! जितने विषय हैं, वे विषरूप हैं। विष के पान से मृत्यु ही होती है। स्त्री, धन आदि सुख मोह और दुःख देनेवाले हैं। ऐसा कौन पुरुष है, जो इनमें पड़कर सावधान रहता है? ये तो स्वरूप को भुलानेवाले हैं। हे मुनी-श्वर! देहरूपी एक नदी है, जिसमें बुद्धिरूपी एक मछली रहती है। जब वह सिर बाहर निकालती है अर्थात् इच्छा करती है, तब भोगरूपी बगला इसको खा जाता है, अर्थात् आत्ममार्ग से भ्रष्ट करता है। ये जो भोगरूपी चोर हैं, इनका संग जब जीव करता है, तब वे इसको लूट लेते हैं, अर्थात् आत्मज्ञान से शून्य करते हैं। और जब यह आत्मज्ञान से