योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१६ ☸ योगवासिष्ठ ☸
मैंने विचार किया कि इसे यहीं बैठा रहने दूँ और मैं अपने स्थान सप्तर्षियों में जाऊँ। इस प्रकार कुटी के संकल्प को त्यागकर में उड़ा। उड़ते हुए मार्ग में मेरे मन में आया कि देखूँ अब उस सिद्ध की क्या दशा है। फिर उलटकर देखा तो कुटी सहित सिद्ध वहाँ नहीं था; क्योंकि कुटी उसकी आधारभूत थी, सो मेरे संकल्प में स्थित थी। जब मेरा संकल्प निर्वाण हो गया, तब वह कुटी गिर पड़ी। तब उसमें वह सिद्ध कैसे रहे? वह भी गिर पड़ा। हे राम! उसको गिरता देखकर में भी उसके पीछे हुआ कि उसका कौतुक देखूँ। निदान आगे वह और पीछे-पीछे में चला। परन्तु में स्वाधीन और वह पराधीन चला जाता था। जैसे मेघ से बूँद गिरती है तो नहीं ठहरती, वैसे ही वह चला और सप्तद्वीप के पार दशसहस्र योजन स्वर्ण की जो धरती है, उस पर आ पड़ा और उसी प्रकार पद्मासन बाँधे हुए शीश और ग्रीवा उसी प्रकार सम ठहरे रहे, क्योंकि उसके शीश और ग्रीवा ऊपर को थे।
हे राम! शरीर प्राण से हिलता चलता है। जब प्राण ठहर जाते हैं, तब शरीर नहीं हिलता चलता। इस कारण उसका शरीर सम ही रहा और जैसे कुटी में बैठा था, उसी प्रकार आसन से पृथ्वी पर आ पड़ा। तब मेरे मन में आया कि इसके साथ कुछ चर्चा भी करनी चाहिए। परन्तु यह तो समाधि में स्थित है, इसलिए प्रथम किसी प्रकार इसको जगाऊँ। हे राम! ऐसा विचार करके में मेघ होकर उसके शिर पर वर्षा करने लगा और बड़ा शब्द किया, जिससे पहाड़ फटने लगे। पर उस शब्द और वर्षा से भी वह न जागा। फिर जब मैं ओले हाँककर उसके ऊपर बरसने लगा—जैसे पत्थर की वर्षा होती है तब ऐसी वर्षा होने से वह नेत्र खोलकर देखने लगा—जैसे पर्वत पर मोर मेघ को देखने लगे। मैं उसके आगे आकर उपस्थित हुआ। तब उसने समाधि खोली और उसकी प्राण-इन्द्रियाँ अपने स्थान में आईं। हे राम! उसने जब मुझको अपने आगे देखा, तब में अद्वैतभाव को त्यागकर बोला, हे साधो! तू कौन है, कहाँ स्थित है, क्या करता था और किस निमित्त कुटी में स्थित था? सिद्ध बोले, हे मुनीश्वर! मैं अपने प्रकृतभाव में