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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1420, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1420

* निर्वाण प्रकरण * ६१५

जहाँ चन्दन का अणु होता है, वहाँ सुगन्ध भी होती है; वैसे ही जहाँ-जहाँ तत्त्व के अणु हैं, वहाँ-वहाँ सृष्टि भी है। हे राम! एक अणु में अनन्त सृष्टि मुझको भासित हुई। जैसे एक पुरुष शयन करता है और उसको स्वप्न में सृष्टि दिखती है और फिर स्वप्न से स्वप्नान्तर की सृष्टि देखता है, तो एक ही जीव में बहुत भासते हैं; वैसे ही एक अणु में अनेक सृष्टि होती हैं। हे राम! जो सृष्टि है, वह आभासरूप है और आभास अधिष्ठान के आश्रित होता है। सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है, जो देश और काल के परिच्छेद से रहित अखण्ड अद्वैतसत्ता है। इसी से कहा है कि अणु-अणु में सृष्टि है; क्योंकि कोई अणु भिन्न नहीं, ब्रह्मसत्ता ही है। जो सब ब्रह्म है तो सृष्टि भी ब्रह्मरूप है, इससे सब ब्रह्म ही जानो। ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। जैसे वायु और स्पन्दन में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकतृतीयसर्गः ॥ २०३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार जब मुझमें सृष्टि फुरी, तब मैं उनके भ्रम को त्याग और संकल्प को खींचकर अन्तर्मुख हुआ और अपनी जो कुटी थी, उसकी ओर आया। जब मैंने कुटी देखी तो उसमें एक पुरुष बैठा मुझको देख पड़ा। तब मैंने विचार किया कि यह कौन है, मेरा शरीर कहाँ है? मैंने विचार करके देखा कि यह कोई महासिद्ध है। मेरा शरीर इसने मृतक जानकर गिरा दिया है और आप पद्मासन बाँधकर, दोनों टखने पुट्ठों के ऊपर किये और शिर और ग्रीवा सीधी किये बैठा है। दोनों हाथ कंधों पर ऊपर किये है, मानों कमल फूल है या मानों अन्तर का प्रकाश बाहर उदय हुआ है और नेत्र मूँदे है, मानों सब वृत्ति खींच ली है। हे राम! इस प्रकार समाधि लगाकर पद्मासन बाँधे वह आत्मपद में स्थिर बैठा था। उसका मुख सूर्य की भाँति प्रकाशता था। जैसे धुएँ से रहित अग्नि प्रकाशित होता है, वैसे ही वह सिद्ध प्रकाशमान था। इस प्रकार मैंने उसको आत्मपद में स्थित देखा। जैसे दीपक निर्वाण में स्थिर होता है, वैसे ही उसे स्थिर देखकर