योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1419, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४ * योगवाशिष्ठ *
को अपना-अपना भाग रस में ही पहुँचाता रहा। हिलना, चलना, बोलना, लेना, देना, सब मुझ ही में सिद्ध होता था। निदान सब पदार्थों में स्पर्शशक्ति मैं ही हुआ और सब शब्द मुझ ही से सिद्ध होते थे। क्रियारूपी बूँद का मैं मेघ हुआ। आकाशरूपी गृह में मेरा निवास था और दशों दिशाएँ सब मुझ में ही फुरी थीं। देवताओं को गन्ध से मैं ही सुख देता था और दीपक को मैं ही प्रज्वलित करता था। पक्षियों में मेरा सदा निवास था। जैसे अग्नि में उष्णता रहती है, वैसे ही सब के सुखाने और हरियावल करनेवाला मैं ही हूँ। हे राम! इस प्रकार मैं पवन होकर स्थित हुआ, इसलिए रूप, अवलोक और मनस्कार सब पदार्थ में ही हुआ। चन्द्रमा, सूर्य, तारे, अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर और यम आदि का जगत होकर मैं ही स्थित हुआ। पञ्च-भूतों के भीतर और बाहर भी मैं था। प्राण-अपान के क्षोभ से दुःख होता है। मैं ही साकार-निराकाररूप हूँ। सब रक्त-पीत श्यामरङ्ग पदार्थ में ही हूँ। पञ्चभूत जो चितअणु में फुरे हैं, सो उर्मी का रूप है, जैसे स्वप्न की सृष्टि सब अपना ही रूप होती है, इतर कुछ नहीं होती। हाड़, मांस, पृथ्वी होकर भूतों में स्थित हुआ और वायुरूप प्राण, अग्निरूप समिधा और आकाशरूप अवकाश हुआ। इस प्रकार मैं सब में स्थित हुआ। मैं भी चैतन्य शरीर था और वे तत्त्व भी चैतन्य शरीर थे। जैसे स्वप्न में जगत आकाशरूप होता है, वैसे ही वे भी आकाशरूप हैं।
हे राम! सब कालों में सब प्रकार सब का सर्वात्मा स्थित है, दूसरा कुछ नहीं। आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, इससे भिन्न जानना भ्रान्तिमात्र है। यह दृष्टि ज्ञानवान् की है। पर जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होते हैं। इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण जगत अपने में ही देखा। हे राम! मैं ब्रह्मरूप था, इससे उसमें जगत उत्पन्न होते दिखे। जो मैं ब्रह्म से इतर होता तो एक तृण भी न उत्पन्न होता। मैं जो ब्रह्मरूप था, इससे सृष्टि उत्पन्न होती है। हे राम! जब मैंने बोध-दृष्टि से देखा तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखा और जब आन्तवाहक दृष्टि से देखा तब स्पन्दन के कारण अणु-अणु में सृष्टि भासित हुई। जैसे