योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1418, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६१३
स्पन्दन से सब रूप धारण किये हैं । हे राम ! जिसको यह निश्चय है, उसको दुःख कहाँ ? सुखदुःखरूप जो पदार्थ हैं, वे मैंने अपने में ऐसे देखे, जैसे आईने में प्रतिबिम्ब पड़ता है । जिसको यह दृष्टि हो, उसको दुःख कहाँ है ?
हे राम ! जिसको अन्तवाहक शक्ति प्राप्त होती है, वह पाताल और आकाश में जाने को समर्थ होता है और जहाँ प्रवेश किया चाहे वहाँ जा सकता है, क्योंकि सृष्टि संकल्पमात्र है । हे राम ! और कुछ सृष्टि नहीं बनी । आत्मा का किञ्चन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । हे राम ! यह सब सृष्टि ब्रह्मस्वरूप है । मुझको तो सदा ऐसी ही भासती है । जब तुम जागोगे, तब तुमको भी ऐसी ही भासित होगी । तुम भी अब जागे हो । उस प्रकार मैं अग्नि होकर स्थित हुआ कि जिसकी शिखा से कालख निकलती थी । प्रकाश में ही हुआ और अपने चित्तस्वरूप अनुभव में मुझको जगत् भासित हो रहा था, उसमें मैं स्थित हुआ । अन्धकार और उलूकादि भी मेरे प्रकाश में प्रकाश पाते हैं और भावरूप पदार्थ भी मैंने अपने में जाने क्योंकि भावरूप पदार्थ तब भासित होते हैं, जब उनका रूप होता है । सो रूपवान पदार्थ में ही था, इस कारण सब मुझ ही में सिद्ध होते थे । इस प्रकार मुझको यह भावना हुई ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणेऽन्तरुपाख्याने चिद्रूप-वर्णनन्नामद्विशताधिकद्वितीयसर्गः ॥ २०२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने पवन की धारणा का अभ्यास किया, तब पवनरूप होकर विचरने लगा और कमल के फूलों और वृक्षों को हिलाने लगा । तारों और नक्षत्रों का आधारभूत हुआ और वे मेरे आधार पर फिरने लगे । चन्द्रमा और सूर्य को चलानेवाला भी मैं ही हुआ । समुद्र और नदियों के प्रवाह भी मेरी ही शक्ति से चलते रहे । मन का बड़ा वेग भी मैं ही हुआ प्राणियों के शरीरों में मेरा निवास हुआ । मैं ही प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान पञ्चरूप होकर स्थित हुआ और सब नाड़ियों में मेरा निवास हुआ । सब नाड़ियों