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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

५८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

कहीं न दिखता---एक आकाश ही दिखता जैसा उज्ज्वल मोती होता है वैसा ही उज्ज्वल आकाश दिखता था, और चारों तत्त्व न दिखता था। एक तो अधोभाग दिखता; दूसरे मध्य भाग आकाश, सो रुद्र ही दिखता; तीसरे ऊर्ध्वभाग देख पड़ता और चौथे चिदाकाश देख पड़ता जो सर्वात्मा है। और कुछ न देख पड़ता। हे राम! वह रुद्र भी आकाश-रूप था और उसका कोई आकार न था। केवल भ्रान्ति से आकार भासित होता था। जैसे भ्रम से आकाश में नीलापन और तरुवर और स्वप्न में भ्रम से आकार भासते हैं, वैसे ही रुद्र का आकार देख पड़ा; पर आत्मा आकाश से भिन्न न था। जैसे भ्रम से चिदाकाश में शूनाकाश भासता है, वैसे ही रुद्र का शरीर भासित हुआ। वह रुद्र सर्वात्मा था और आकाश होकर जो भासित हुआ, वह किञ्चन था। हे राम! आकाश में रुद्र निराधार दिखता था। जैसे मेघ निराधार होते हैं, वैसे ही वह निराधार दिखता था। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! इस ब्रह्माण्ड के ऊपर और उसके ऊपर क्या है, सो कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो ब्रह्माण्ड का आकाश है, उस पर दस गुना जल है। जल के ऊपर दस गुना अग्नि है। उसके ऊपर दसगुना वायु है। उसके ऊपर दसगुना आकाश है।

राम ने पूछा, हे भगवन्! ये तत्त्व जो तुमने वर्णन किये, सो किसके ऊपर हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये तत्त्व पृथ्वी के ऊपर स्थित हैं। जैसे माता की गोद में बालक आ बैठता है, वैसे ही ये तत्त्व पृथ्वी पर हैं और पृथ्वी भागों के आश्रय में है। राम ने पूछा, हे भगवन्! पृथ्वी आदि तत्त्वों सहित निराधार ब्रह्माण्ड किसके आश्रय से स्थित हुआ है। उनका चलना और ठहरना कैसे होता है और वे नष्ट कैसे होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम्हीं कहो कि आकाश में मेघ किसके आश्रय होते हैं? सूर्य और चन्द्रमा किसके आश्रय होते हैं? जैसे ये संकल्प के आश्रित हैं, वैसे ही ब्रह्माण्ड भी संकल्प के आश्रित है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प ही के आश्रित है और संकल्प आत्मा के आश्रित है, वैसे ही यह जगत् और तत्त्व भी आत्मसत्ता के

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

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आश्रित स्थित है। इनका ठहरना और गिरना भी आत्मा के आश्रित है। जैसे आदि चित्त का स्पन्दन होकर नीति हुई है, वैसे ही है। इस प्रकार इसका गिरना है, इस प्रकार ठहरना है, इस प्रकार इसका नाश होना और इस प्रकार रहना है। वास्तव में परम स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं—केवल भ्रममात्र है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है और चित्संवित् ही जगत् के आकार से भासित होता है। जैसे आकाश में नीलिमा प्रतीत होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् की प्रतीत है और जैसे तलवार में श्यामता झलकती है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में मोती दिखते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है और मिथ्या जगतों की संख्या कीजिये तो नहीं गिने जा सकते। जैसे सूर्य की किरणों का आभास और रेत के कणों की संख्या नहीं होती, वैसे ही जगतों की संख्या नहीं होती। पर वास्तव में कुछ बना नहीं—सब अजातजात है। जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भासता है, इससे दृश्य को मिथ्या जानकर जगत् की वासना त्यागो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनं नाम शताधिकपञ्चनवत्तितमस्सर्गः ॥ १६५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! उस रुद्र का तो मैंने बड़ा भयानक रूप देखा था। उसके नेत्र बड़े तेज से पूर्ण थे—चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि ये तीनों उसके नेत्र थे और वह महाभयानक था—मानों प्रलय के समुद्र साक्षात् स्थित हैं। रुग्डों की माला उसके कण्ठ में थी और उसकी परछाहीं बड़ी और श्याम पड़ती थी। उसको देखकर मैं आश्चर्यचकित हुआ कि यहाँ सूर्य और अग्नि भी नहीं और किसी का प्रकाश भी नहीं है, तब यह परछाहीं किस प्रकार है और क्या है? ऐसे में देखता ही था कि वह परछाहीं नृत्य करने लगी। उससे एक स्त्री निकली, जिसका शरीर दुर्बल आकार बड़ा ऊँचा और वर्ण कृष्ण था—मानों साक्षात् अँधेरी रात्रि है। उसके तीन नेत्र, बड़ी भुजा ऊँची ग्रीवा

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थी—मानो प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धारण कर स्थित हुए हैं। उसके गले में रुद्राक्ष और मुण्डों की माला पड़ी हुई थी। वह विकराल स्वभाव की नारी हाथों में त्रिशूल, खड्ग, बाण, ध्वजा, ऊखल मूसल आदिक आयुध लिये थी। ऐसा भयानक आकार देखकर मैंने विचार किया कि यह काली भवानी है। उसको मैंने नमस्कार किया। जैसे अग्नि के जले हुए पर्वत के शिखर श्याम होते हैं, वैसे ही वह श्यामवर्ण थी। उसके मस्तक में तीसरा नेत्र बड़वाग्नि की नाईं तेज से युक्त निकला था। कभी उसकी दो भुजा दिखतीं, कभी सहस्रभुजा दिखतीं, कभी अनन्त भुजा हो जातीं, कभी एक ही भुजा दीखती और कभी कोई भुजा न देख पड़ती। कभी सिर पैर कोई न रहता, केवल एक बुत सी लगती और नृत्य करती थी।

ज्यों-ज्यों वह नृत्य करती, त्यों-त्यों उसका शरीर स्थूल देख पड़ता, मानों आकाश को भी ढक लिया है, और दसों दिशाओं ने आकाश को पूर्ण किये हैं। नख-शिख की सीमा कुछ न दिखती, ऐसा आकार बढ़ाया। जब वह भुजा को हिलाती, तब मानों आकाश को मापती थी। पाताल तक उसके चरण, आकाश पर्यन्त सीस, पृथ्वी उसका उदर, सुमेरु आदि पर्वत नाभिस्थान और दशों दिशा भुजा थीं, मानों प्रलय काल की मूर्ति रचकर स्थित हुई है। बड़े पर्वत की कन्दरा सदृश उसकी नासिका थी। लोकालोक पर्वत हाड़ थे और कण्ठ में नदियों की माला थी, जो हिलती थी। वरुण, कुबेर आदि देवताओं के सिर की माला उसके कण्ठ में थी। पवन नासिका के मार्ग से निकलता था, जिससे सुमेरु आदि पर्वत तृणों की नाईं उड़े जाते थे। ब्रह्माण्ड की माला उसके गले में थी। हाथों में ब्रह्माण्डरूपी भूषण थे और कटि में ब्रह्माण्ड के घुँघरू और करधनी थी। जब वह नृत्य करती, तब सब ब्रह्माण्ड नृत्य करने लगता था। जैसे पवन से पत्ते नाचते हैं, वैसे ही सुमेरु आदि नृत्य करते थे। उसके एक-एक रोम में ब्रह्माण्ड थे। जैसे तारागण वायु के अधीन हैं। उसके कानों में धर्म-अधर्मरूपी मुद्राएँ थीं। बड़े-बड़े कान और बड़ा मुख था, मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भक्षण कर लेगी।

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५८६

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष स्तन थे। उन स्तनों में चारों वेदों और शास्त्रों के अर्थरूपी दूध निकलता था। निदान जगत् की सब मर्यादा मुझको उसमें दिखाई दी। उसके नृत्य करने से ब्रह्माण्ड और अस्ताचल आदि पर्वत तृणों की नाईं नृत्य करते थे और सब कुछ उलटपुलट होता दिखता था। उसके शरीर में नीचे आकाश ऊपर पृथ्वी थी। तारामण्डल सिद्ध, देवता, विद्याधर, गंधर्व, किन्नर, दैत्य, स्थावर, जङ्गम सब उस शरीर में दृष्टिगोचर होता था-मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का आदर्श हो। भुजाओं के उछलने से चन्द्रमा की नाईं नखों का प्रकाश होता था। मन्दराचल, उदयाचल पर्वत कानों के भूषण से और हिमालय पर्वत बरफ के कण के समान दिखता था।

हे राम! इस प्रकार उस देवी के शरीर में मुझको अनन्त सृष्टि दीखी। कहीं इकट्ठी और कहीं भिन्न-भिन्न, कहीं एक ही सी चेष्टा करे और कहीं भिन्न-भिन्न चेष्टा करे। मानों ब्रह्माण्डरूपी रत्नों का डब्बा है। हे राम! जब मैं संकल्प-सहित देखता, तब मुझको सृष्टि दृष्टिगत होती और जब आत्मा की ओर देखता, तब केवल आत्मरूप ही दिखता और कुछ न दिखता। संकल्पदृष्टि से सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता देख पड़ता, पर ऐसी सामर्थ्य किसी की न दिखती कि नृत्य न करे। जगत् की उत्पत्ति, स्थित और प्रलय सब उसी में दिखते और सम्पूर्ण क्रिया उसी से होती दिखतीं। उसी में सिद्ध, देवता, गन्धर्व, अप्सरा विमान पर आरूढ़ फिरते और नक्षत्रों के चक्र फिरते-मानों ब्रह्माण्ड फिर उदय हुए हैं। जब मैं फिर आत्मदृष्टि से देखता, तब ब्रह्मस्वरूप भासता और संकल्पदृष्टि से जगत् भासित होता। वह चित्तकला, जो संकल्परूप है उसमें सभी दिखते। हे राम! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब उसी में दृष्टिगत होते थे। जैसे मच्छर वायु से उड़ते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टि उसके शरीर में उड़ती दृष्टिगत होती। इससे मुझे महान् आश्चर्य हुआ। वह भैरव था और यह भैरवी उसकी शक्ति थी। दोनों मुझको विशालकाय देख पड़े। यह नित्य शक्ति सर्वात्मा थी और परमात्मा की क्रियाशक्ति सब विश्व को अपने

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आपमें जानती थी। जैसे समुद्र सब तरङ्गों को अपने में अपना रूप जानता है, वैसे ही सब ब्रह्माण्ड को वह अपने में अपना रूप जानती थी। वह तो सदाशिव से भी बड़े अहंकार को धारण किये थी, मानों सब ब्रह्माण्ड की माला कण्ठ में डाले है और यमादिक सब उसकी मर्यादा हैं।

हे राम! इस प्रकार मैंने रुद्र और काली भवानी को देखा। रुद्र के शिर पर जो जटा थी, वे मोर की पंख की नाईं थीं। काली को मैंने देखा कि नाना प्रकार के मृग उसके साथ हैं और वह डम-डम शब्द करती है। यह शब्द भी वह करती थी—"दिग्वंटिग्वं तुदिग्वं पंचमना वह संमंभप्रलये मियतयत्रिषंत्रो त्रीलं त्रीपलपलुमं पनुपं सुमंप मषमश्रिणु ही गुंहींगुंहीं उगुभियगुं दलुमददारो मीदातंदर्ता।" हे राम! इस प्रकार के शब्द करती हुई वह श्मशानों में नृत्य करती थी। हे राम! ऐसी देवी तुम्हारी सहायक हो, जो सर्वशक्ति परमात्मा है और सब ब्रह्माण्ड उसके आश्रय है। क्षण में वह अंगुष्ठप्रमाण हो जाती थी और क्षण में बड़े दीर्घ आकार धारण करती थी। सब जगत् में जो क्रिया होती है, वे उसके आश्रय से होती हैं। कहीं उत्पत्ति होती है, कहीं युद्ध होते हैं। ऐसी नाना प्रकार की क्रिया उस देवी के आश्रय से होती हैं। जैसे आइने में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही उस देवी में क्रिया होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे देवीरुद्रोपाख्यानवर्णनन्नाम शताधिकपण्णवतिमस्सर्गः ॥ १६६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो तुमने रुद्र और कालिका का वर्णन किया, सो वे कौन थे? महाप्रलय में तो कुछ नहीं रहता। उनके शरीर में तुमने सृष्टि कैसे देखी और महाप्रलय होकर उनके शरीर में सृष्टि ने कैसे प्रवेश किया? उस काली के हाथ में शस्त्र क्या थे? कहाँ से आई थी और कहाँ गई? उसका आकार क्या था? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई रुद्र है, न काली है, न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई नपुंसक है, न पुरुष। मिलकर कुछ नहीं हुआ है। न ब्रह्माण्ड है और न पिण्ड है केवल चिदाकाश है और संकल्प से उपजे सब

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

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आकार भासित होते हैं। जैसे स्वप्न में आकार भासित होते हैं वैसे ही वे आकार भी भासित होते हैं। वास्तव में केवल चिदाकाश ज्यों का त्यों है। हे राम! आत्मपद अनन्त, चैतन्य, सत्य, प्रकाशरूप, अविनाशी और अपने आपमें स्थित है। रुद्रदेव का आकार जो दिखा था, सो वह चैतन्य आत्मा-ही ऐसे होकर भासित हुआ था-कोई और आकार न था। जैसे सुवर्ण ही भूषण होकर दिखता है, वैसे ही परमदेव चिदाकाश ऐसे होकर भासित हुआ था, क्योंकि वह चैतन्यस्वरूप है। जैसे मधुरता पौंड़े का स्वरूप है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। हे राम! चैतन्यसत्ता अपने स्वरूप को नहीं त्यागती, आकार होकर भासित होती है और सदा अपने आपमें स्थित है। जैसे पौंड़े के रस में मधुरता न हो तो उसको कोई रख नहीं सकता, वैसे ही आत्मसत्ता में चेतनता न हो तो उसे चैतन्य कोई न कहे। जो आत्मा चेतनता को त्यागे तो परिणामी हो और चैतन्य न कहावे; परन्तु वह तो सदा आप अपने स्वभाव में स्थित है और किसी और अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ। इसी से कहा कि जो कुछ भासित होता है, वह आत्मा का किञ्चन है।

हे राम! जैसे पौंड़े के रस में मधुरता होती है, वैसे ही आत्मा में चेतनता है। चैतन्यमात्र में चेतनता लक्षण चेतनतारूप रहता है, इससे यह जगत् भावरूप है जो शुद्धचिन्मात्र में चित्त का उत्थान न होता तो जगद्भाव न लखाता। आत्मसत्ता दोनों अवस्थाओं में सदा ज्यों की त्यों है-जैसे वायु जब स्पन्दित होता है, तब उसका स्पर्शरूप लक्षण प्रतीत होता और जब निस्पन्द होता है, तब उसमें कोई शब्द नहीं प्रवेश कर सकता, पर वायु दोनों अवस्थाओं में तुल्य है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य में किसी शब्द का प्रवेश नहीं; पर चेतननाभाव में है और आत्मसत्ता सदा एकरस है-इसमें वास्तव में यह जगत् ही नहीं है। हे राम! आदि, मध्य, अन्त, जगत्, आकाश, कल्प, महाकल्प, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, जन्म, मरण, सत्, असत्, प्रकाश, अन्धकार, पण्डित, मूर्ख, ज्ञानी, अज्ञानी, नामरूप, कर्मरूप, अवलोक, मनस्कार,

५६२ | योगवाशिष्ठ

विद्या, अविद्या, दुःख, सुख, बन्धन, मोक्ष, जड़, चेतन, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आना, जाना, जगत्, अजगत्, कुछ नहीं हे बढ़ना, घटना, में, तुम, भेद, शास्त्र, पुराण, मन्त्र, आकार, उकार, मकार, जय, नाम आदिक स्थावर-जङ्गम सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग, बुलबुले और आवर्त्त सब जलरूप हैं, वैसे ही सब ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्म से भिन्न जगत् कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में जो पर्वत दिखते हैं, वे अनुभव से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मसत्ता जगत् रूप होकर भासित होती है।

हे राम! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश आदि जितने शब्द हैं, वे सब ब्रह्मसत्ता ही से होकर स्थित हुए हैं, परन्तु सत्ता अपने आपमें ज्यों की त्यों है, कभी परिणाम को नहीं प्राप्त हुई और वही सत्ता सब की आत्मा है। जैसे समुद्र अपने तरङ्गभाव को त्यागे तो अपने सौम्यभाव में स्थित होता है; वैसे ही ब्रह्मसत्ता स्फुरने को त्यागे तो अपने स्वभाव में स्थित हो, जो अनामय है अर्थात् दुःखों से रहित, परमशान्तिरूप, अनन्त और निर्विकार है। जब इस प्रकार बोध हो, तब जीव उस ब्रह्मसत्ता को प्राप्त हो। बोध, अबोध, विधि, निषेध भी वही है। जैसे जल और समुद्र की संज्ञा कही है और तरङ्ग शब्द कहने में विलक्षण भासित होता है, पर जब जल तरङ्ग-बुद्धि को त्यागे, तब केवल समुद्र-रूप है, वैसे ही यह जीव जब अपने जीवत्वभाव को त्यागे, तब आत्म-रूपी समुद्र को प्राप्त हो, अर्थात् जब दृश्य का सम्बन्ध त्याग करे, तब आत्मा हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अन्तर्गोपाख्यानवर्णनं नाम शताधिकसप्तनवतितमस्सर्गः ॥ १६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमसे मैंने जो चिदाकाश कहा है, वह परमचिदाकाश है और सदा अपने आपमें स्थित है। हे राम! शुद्ध चिदाकाश जो मैंने तुमसे कहा है, वही यह रुद्ररूप है और वही नृत्य

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

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करता था। वहाँ आकार कोई न था, केवल चिद्घनसत्ता थी और वही ऐसे होकर किञ्चन होती थी। हे राम! जब मैं आत्मदृष्टि से देखता था, तब मुझको चिदाकाशरूप ही भासित होता था। हे राम! जो मेरे जैसा हो, वही वैसा रूप देख सकता है और नहीं देख सकता। हे राम! जिसका नाम कृतान्त है वही रुद्र और वही भैरव है। वही कृतान्त की मूर्ति नृत्य करके अन्तर्धान हो गई। वास्तव में वह रूप मायामात्र था। यह चैतन्यसत्ता के आश्रय नाचते थे। हे राम! जैसे सोने में भूषण हैं, परन्तु वे सोने के बिना नहीं होते, वैसे ही चेतनता किञ्चन से जगत् भासित होता है और फिर वही प्रमाद से आधिभौतिक हो जाता है। वास्तव में शुद्ध चिदाकाशरूप ही है और चेतनता से वही जगत्रूप दिखता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! प्रथम तो आपने कहा कि अद्वैत आत्मतत्त्व में यह जगत् प्रमाद से कल्पित है और जो है तो कल्प के अन्त में नाश हो जाता है, केवल अद्वैतसत्ता रहती है, अब फिर आप-ही कहते हो कि चैत्यता से जगत्रूप भासता है। अद्वैत में चैत्यता कैसे हुई और कौन चेतनेवाला हुआ ? प्रलय के अनन्तर काली क्यों-कर भासित हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई चैत्य है और न कोई चेतता है केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, जो चैतन्यघन परम निर्मल और शान्तरूप है। उसी को शिवतत्त्व भी कहते हैं। वही शिवतत्त्व रुद्र आकार को धारण किये देख पड़ा था, दूसरा कुछ नहीं—केवल परम चिदाकाश है। वही चिदाकाश आकार रखकर भासित होता है। पर वास्तव में कोई आकार नहीं हुआ। न भैरव है, न भैरवी है, न काली है, न यह जगत् है। सब मायामात्र है।

जैसे स्वप्न में आत्मसत्ता चैत्यता के कारण जगत्रूप दिखती है, पर स्वरूप से न कुछ चैत्यता है और न जगत् है, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है, वैसे ही उस जगत् को भी जानो। कुछ और नहीं हुआ, अद्वैतसत्ता ही है। इससे चैत्य और चेतनेवाला सब भ्रम से भासते हैं; आत्मा में ये नहीं उपजे, केवल स्वच्छ चिदाकाश है। मुझ-को तो सदा वही भासता है, पर अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत्

५६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

भासता है। आत्मा सदा एक है किञ्चन से उसमें आकार दिखते हैं। भैरव और काली सब निराकार हैं। भ्रान्ति में आकार प्रतीत होते हैं। जैसे मनोराज्य में युद्ध भासते हैं और जैसे कथा में अर्थ भासते हैं, वे असत् ही संकल्प-विज्ञान से हैं; वैसे ही चिदात्मा में यह जगत् भासित होता है। जैसे आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही ये आकार दिखते हैं। हे राम! ये जो जगत्, प्रलय और महाप्रलय आदि शब्द हैं, उनका नाश करने के लिए मैं तुमको कहता हूँ। आत्मा एक अद्वैत चैतन्य है, उस चैतनता का अभाव कभी नहीं होता। वह अपने आपमें स्थित है और किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणें किञ्चनरूप होती हैं और उनमें जल भासता है, वैसे ही चित्त का किञ्चन जगत् भासता है। वही महाप्रलय में रुद्र और भैरवी होकर भासता है। वास्तव में न कुछ रुद्र है और न काली है, सब आत्मा ही है।

हे राम! जो कुछ कहना-सुनना होता है सो वाच्य तथा वाचक से होता है, आत्मा में कहना और सुनना कुछ नहीं। वही चिदाकाश रुद्र संकल्प में नृत्य करता था। जैसे सुवर्ण भूषण होकर भासित होता है, वैसे ही चिदाकाश संकल्प में आकार होकर भासित होता है, दृश्य कुछ नहीं बना। मैं, तुम और जगत्, चेत्य और अचेत्य सब वही रूप है; उसमें कोई शब्द नहीं फुरा। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के शब्द भासित होते हैं सो कुछ वास्तव नहीं—पत्थर की नाईं मौन हैं—वैसे ही जाग्रत् जगत् में भी जितना शब्द होता है सो सब स्वप्न है; कुछ हुआ नहीं। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आप भाव में स्थित है, जहाँ न एक है, न द्वैत है, न सत्य है, न असत्य है, न चित्त है, न चेत है, न मौन है, न अमौन है और न कोई चेतनेवाला है। चेत के अभावसा केवल अचेत चिन्मात्र आत्मसत्ता निर्विकल्परूप स्थित है। हे राम! सबसे बड़ा शास्त्र का सिद्धान्त यही है; इस दृष्टि से तुम मौन में स्थित हो। हे राम! सब सिद्धान्तों की समता है निर्विकल्प होना। जैसे पत्थर की शिला मौन होती है, वैसे ही चेत्य से रहित रहकर ही

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५

जो कुछ प्रत्यक्ष आचार प्राप्त हो, उसमें वृत्त होना और सदा आत्म-निश्चय रखना, इसी का नाम परम मौन है। सब क्रिया होती रहें, पर अपने से कुछ न देखना—जैसे नट स्वाँग भरता है और उसके अनुसार विचरता है, परन्तु निश्चय उसका आदि शरीर में ही होता है, उससे वह चलायमान नहीं होता, वैसे ही जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो, उसको यथाशास्त्र करे, परन्तु अपने निर्गुण निष्क्रियस्वरूप में चलायमान न हो, उसी अद्वैत स्वरूप में स्थित रहे।

राम ने पूछा, हे भगवन्! वह रुद्र क्या था और वह काली शक्ति क्या थी? उनके अङ्गों का बढ़ना-घटना और नृत्य करना क्या था और वस्त्र क्या थे, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिवतत्त्व ही आकार होकर भासता है और कोई आकार नहीं। वह चिन्मात्र, अमल विद्या और अविद्या के कार्य से रहित, शान्त और अवाच्यपद है। यह संज्ञा भी संकल्प में तुमसे कही है, आत्मवेत्ता आत्मपद को अवाच्यपद कहते हैं, तथापि मैं कुछ कहता हूँ। हे राम केवल आत्मतत्त्वमात्र जो चिदाकाश है, वही शिव भैरव है। उसी के चमत्कार का नाम चित्तशक्ति है। उसी का नाम काली है। उस काली, आत्मा और शिवरूप में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन और स्पन्दन में और अग्नि तथा उष्णता में कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही चित्तकला और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन निष्पन्द होता है, तब उसका लक्षण नहीं होता, अवाचकरूप होता है, और जब स्पन्दन होता है, तब उसका लक्षण भी होता है और उसमें शब्द प्रयोग होता है वैसे ही चित्तशक्ति में उसका लक्षण होता है। उसके अनेक नाम हैं। उसी का नाम स्पन्दन और इच्छा है। उसी को चैत्योन्मुखत्व से वासना कहते हैं। उसी के स्वाद की इच्छा से जब चित्तसंवित् में वासना फुरती है, तब उसका नाम वासना करने वाला वासक कहलाता है—फिर आगे दृश्य होता है। जब त्रिपुटी हुई अर्थात् वासना, वासक और वास्य हुए, तब वासक को जीव कहते हैं—जो जीवत्व भाव लेकर स्थित होता है। तब इसको यह भावना होती है कि मैं जीव हूँ और मेरा नाश कभी

५६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न हो, इस इच्छा में जीव कहाता है। चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन में होती है। पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है।

जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं। परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—इसी मे प्रकृतिरूप है। वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है। महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं। कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन। इनके सप्तदश कार्य हैं। षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं। सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है। न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है। इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है। जब यह निस्पन्द होती है तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है। वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं। प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे वडवाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है। वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं। वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है। वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है। वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है। वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है, वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है। वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है। वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है। वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है। वह शिवा अर्थात्

५६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे राम! स्पन्दन शक्ति का जबतक शिव में व्यतिरेक है, तब तक वह जगत को रचती है---जहाँ वह है वहाँ जगत है---जगत से विलग नहीं रहती। जैसे जहाँ सूर्य की किरणें हैं, वहाँ जलाभास होता है---किरण बिना जलाभास नहीं रहता, वैसे ही स्पन्दनशक्ति जगत के बिना नहीं रहती। जैसे आकाश के अङ्ग आकाश हैं, वैसे ही इसके अङ्ग जगत हैं और जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप हैं, वैसे ही जगत इसका रूप है। यह शक्ति चिदाकाश है उसमें व्यतिरिक्त नहीं। जब यह फुरती है, तब जगदाकार मानती है और जब शिव की ओर आती है, तब शिवरूप हो जाता है, ओर जगत का भाव नहीं रहता। इससे हे राम! तुम्हारी चित्तशक्ति जब तुम्हारी ओर आवै तब जगतभ्रम मिटै। इस चित्त शक्ति ने ही जगतभ्रम रचा है। शिव शान्तरूप है और अजर, अमर, अचेत, चिन्मात्र है। उसमें कुछ क्षोभ नहीं---आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने काली के अङ्गों की जो सृष्टि देखी थी, वह आत्मा में सत् है अथवा असत्, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह काली देवी आत्मा की क्रियाशक्ति अर्थात स्फुरणशक्ति है, इसमें आत्मा में सत्य है और वास्तव में आत्मा में कुछ नहीं, मिथ्या है। जैसे तुम मनोराज्य में अपने से दूसरा चिन्तन करो तो वह कुछ वस्तु नहीं पर, उस काल में सत् भासता है, वैसे ही जितनी सृष्टियाँ हैं, वे आत्मा में सत्य नहीं, परन्तु चित्तशक्ति से बसती दिखती हैं जैसे जितने कुछ विधि-निषेध पदार्थ और आकाश, पर्वत, समुद्र, वन, जगत, तीर्थ, कर्म, बन्ध, मोक्ष, गुरु, शास्त्र, युद्ध शास्त्र आदि भासते हैं, वे सब चिदाकाश ब्रह्मरूप हैं और वास्तव में इनका होना ब्रह्म से भिन्न नहीं। सब प्रकार और सर्वदा आत्मा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अद्वैत, निराकार, निर्विकार और ज्यों का त्यों है। उसमें जगत कोई नहीं उपजा।

सब जगत आत्मा में क्रियाशक्ति ने रचा है, सो वह माया काल में सत्य है, वास्तव में कुछ नहीं। जैसे सोनेवाले को स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसके शरीर को कोई हिलावे तो वह नहीं जागता, पर जो

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६६

कुछ सृष्टि होती तो हिलाने से उसका कोई स्थान गिर पड़ता—इसी से जाना जाता है कि किसी का नाश नहीं होता—वास्तव कुछ नहीं है। हे राम! वह सृष्टि, जो प्रत्यक्ष अंगीकार होती है, उसके चित्तस्पन्दन में स्थित है, परन्तु जबतक निद्रा है, तभी तक वह सृष्टि है; जब निद्रा निवृत होती है तब स्वप्नसृष्टि भी नहीं दिखती। वैसे ही यह सृष्टि भी वास्तव में कुछ नहीं है, अज्ञान ने चित्तशक्ति में भासती है। हे राम! सब पदार्थ चित्त के फुरने में भासते हैं जिसका संकल्प शुद्ध होता है, उसके मनोराज्य की सृष्टि यदि देशकाल में प्रत्यक्ष होती है तो संकल्प-रूप होती है, क्योंकि कुछ बना नहीं। जब संकल्प फुरता है, तब संकल्प के अनुसार सृष्टि भासती है; इससे संकल्परूप ही हुई। और जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब इसका अर्थ हृदय में अनुभव होता है। जैसे परलोक अदृष्ट है, पर जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब उसका राग-द्वेष भी हृदय में फुरता है, क्योंकि संकल्प में उसका भाव है। वैसे ही जबतक चित्त में स्पन्दन फुरता है, तब तक जगत् है, और जब चित्त निस्पन्दन होता है, तब जगत् की सत्यता नहीं भासती।

हे राम! यह सब जगत् क्रियाशक्ति ने आत्मा में रचा है। जबतक यह क्रियाशक्ति काली शिव से व्यतिरिक्त होती है, तबतक नाना प्रकार के जगत् रचती है और क्षोभ को प्राप्त होती है। और जब शिव की ओर आती है तब शान्तरूप हो जाती है। तब फिर उसकी प्रकृति संज्ञा नहीं रहती—वह अद्वैततत्त्व में अद्वैतरूप ही हो जाती है। जैसे जबतक पवन चलता है, तबतक शीत, उष्ण, सुगन्ध, दुर्गन्ध, बड़ी और छोटी संज्ञा होती है, और जब ठहरता है, तब यह नहीं कहा जाना कि ऐसा है अथवा वैसा है। वैसे ही जबतक चित्तशक्ति स्पन्दनरूप होती है, तब तक जगत् रचती है और प्रकृति कारण रूप कहाती है। उसमें दो प्रकार के शब्द होते हैं—विद्या और अविद्या! हे राम! जो कुछ कहना होता है वह स्पन्दनरूप जो चित्र लिखा है, उसमें है। वह जब शिव-तत्त्व के अन्तर्गत होती है, तब अद्वैतरूप हो जाती है—वहाँ किसी शब्द की गति नहीं।

६०० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे राम ! शिव क्या है और शक्ति क्या है, यह भी सुनो । ये सब जीव शिवरूप हैं और इनके चित्त का फुरना काली है । जबतक इच्छा में चित्तशक्ति बाहर फुरती है, तबतक भ्रम का अन्त नहीं होता और नाना प्रकार के विकारों का अनुभव होता है, कभी शान्ति नहीं होती । और जब चित्तशक्ति उलटकर अधिष्ठान को देखता है, तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है और परम शान्ति प्राप्त होती है । हे राम ! आत्मा और चित्तसंविद् में कुछ भेद नहीं । जैसे वायु के स्पन्दन और निष्पन्द में कुछ भेद नहीं होता, परन्तु जब स्पन्दन होता है, तब जाना जाता है और निष्पन्द नहीं जाना जाता, वैसे ही चित्तसंविद् जब फुरता है, तब जाना जाता है, और नहीं फुरता तब नहीं जाना जाता, और जानना और न जानना दोनों नहीं रहते हैं । हे राम ! जबतक इच्छा-शक्ति शिव की ओर नहीं देखती, तब तक नाना प्रकार के नृत्य करती है अर्थात् जगत् को रचती है, और जब शिव की ओर देखती है, तब नृत्य बन्द हो जाता है । और सब अङ्ग सूक्ष्म हो जाते हैं । हे राम ! इस काली का आकार अपरिमित था, पर शिव की ओर देखने से सूक्ष्म हो गया । पहले पर्वत-समान था; फिर निकट आई तब ग्राम के समान हुआ; फिर वृक्ष के समान हुआ । जब और निकट आई, तब सूक्ष्म आकार हो गया और शिव के साथ मिली तब शिवरूप हो गई । शिव के सम्मिश्रण में इसका जो विलास है, वह शून्य हो जाता है और परमशान्त शिवपद की प्राप्ति होती है ।

श्रीराम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यह जो परमेश्वरी कालीशक्ति है, वह उसका मिलकर शान्त कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देवी परमात्मा की इच्छाशक्ति है । इसका नाम जगन्माता है । जब तक यह शिवतत्त्व से अलग रहती है, तब तक जगत् को रचती है और जब अपने अधिष्ठान की ओर आती है, जो नित्यतृप्त, अनामय, निर्विकार, द्वैतभाव से रहित है, तब परमशान्ति को प्राप्त होती है, तब इसकी प्रकृतिसंज्ञा जाती रहती है । जैसे नदी जबतक समुद्र को नहीं प्राप्त हुई, तबतक दौड़ती और शब्द करती है, पर जब समुद्र को मिली, तब

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०१

शब्द करना और दौड़ना नष्ट हो जाता है और नदीसंज्ञा भी नहीं रहती—समुद्र को मिलकर परमगम्भीर समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही जबतक चित्तशक्ति शिव से अलग होती है, तबतक जगत्भ्रम को रचती है और जब शिवतत्त्व को मिलती है, तब शिवरूप हो जाती है और द्वैतभ्रम मिट जाता है। हे राम! जब यह चित्तशक्ति शिवपद में लीन हो जाती है, तब प्रथम जो देह और इन्द्रियों से तद्रूप हुई थी, इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में अपने को सुखी-दुःखी मानती थी और राग-द्वेष से जलती थी, वह भाव जाता रहता है, और नित्यतृप्त अनामय पद के मिलने से सुख-दुःख से रहित हो जाती है, क्योंकि अनात्मदेह इन्द्रियों की तद्रूपता का अभाव हो जाता है और आत्मतत्त्व के साथ यह तद्रूप हो जाती है। जैसे पत्थर की शिला में मिलकर खड्ग की धार तीक्ष्ण होती है, वैसे ही चित्तसंवित् जब आत्मपद में मिलती है, तब एक अद्वैतरूप हो जाती है। तब आत्मपद का स्पर्श करने से अनात्म-भाव का त्याग करती है।

जैसे ताँबा पारस के स्पर्श से सुवर्ण हो जाता है और फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही यह वृत्ति अनात्मभाव को नहीं प्राप्त होती। चित्तकला तबतक विषय की ओर दौड़ती है, जबतक अपने वास्तव स्वरूप को नहीं प्राप्त हुई। जब अपने वास्तवस्वरूप को प्राप्त होती है, तब विषय की ओर नहीं दौड़ती है। जैसे जिस पुरुष को अमृत प्राप्त होता है और उसके स्वाद का अनुभव होता है, वह नीम खाने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मानन्द प्राप्त हुआ है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। हे राम! यह संसारभ्रम चित्तसंवित् में दृढ़ सत्य होकर स्थित है और संसार के सुख का त्याग नहीं कर सकता। पर जब आत्मसुख प्राप्त होगा, तब उस तुच्छ सुख को त्याग देगा। जैसे किसी पुरुष को जबतक पारस नहीं मिलता, तबतक वह और धन को त्याग नहीं सकता, पर जब पारस प्राप्त हो जाता है, तब तुच्छ धन का त्याग करता है और फिर धन के लिए कोई यत्न नहीं करता, वैसे ही जब जीव को आत्मानन्द प्राप्तहोता है, तब वह विषय के सुख का त्याग करता

६०२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ

हे, उसे पाने का यत्न नहीं करता। हे राम! भौंरा तबतक और स्थानों में घूमता है, जबतक कमल की पंक्ति पर नहीं पहुँचता, पर जब उस पंक्ति पर पहुँच जाता है, तब और स्थान को त्याग देता है, वैसे ही चित्तशक्ति जब आत्मपद में लीन होती है, तब किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करती, निर्विकल्पपद को प्राप्त होती है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुरुषप्रकृतिविचारो नाम शताधिकाष्टनवतितमसर्गः॥ १९८॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब पूर्व का प्रसङ्ग फिर सुनो। जब काली नृत्य करके निर्वाण हो गई, तब शिव अकेला रह गया। वहाँ मुझे देख पड़ता था और दो खण्ड आकाश के देख पड़े—एक अधोभाग और दूसरा ऊर्ध्वभाग। और कुछ न देख पड़ता था। तब रुद्र ने नेत्रों को फैलाकर दोनों खण्ड देख—जैसे सूर्य जगत् को देखता है—और प्राण को भी खींचा। तब ऊर्ध्व और अधः दोनों खण्ड इकट्ठे हो गये और ब्रह्माण्ड को अन्तर्मुख कर लिया—एक शिव ही रह गया और कुछ न दिखता था। हे राम! जब एक क्षण व्यतीत हुआ, तब रुद्र बड़े आकार को धारण कर ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गया और एक वृक्ष के समान हो गया। फिर अङ्गुष्ठमात्र शरीर रखकर एक क्षण में सूक्ष्म अणु सा हो गया। फिर रेत के कण से भी सूक्ष्म हो गया। फिर नेत्रों से अदृश्य हो गया। तब दिव्यदृष्टि से मैं देखता रहा। फिर वह भी लुप्त हो गया, केवल चिदाकाश ही शेष रहा और दूसरी वस्तु कुछ न दिखी। जैसे वर्षाकाल के मेघ शरत्काल में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वह रुद्र भी लुप्त हो गया। हे राम! उस काल में मुझको तीनों इकट्ठे दिखे—एक देवी ब्रह्मा की शक्ति; दूसरी कालीशक्ति और तीसरी शिला। तब मैंने विचार किया कि यह स्वप्न गन्धर्व नगर सा आश्चर्य था, और कुछ नहीं। तब मैंने क्या देखा कि स्वर्ण की शिला ही पड़ी है। यह सृष्टि शिलाकोष में स्थित थी। तब मैंने विचार किया कि यह सृष्टि शिलाकोष में है तो और सृष्टि भी होगी, क्योंकि सब वस्तु सब प्रकार और सब स्थान पूर्ण है। इसलिए मैं उसमें भी सृष्टि देखने लगा और नाना प्रकार की

* निर्वाण प्रकरण * ६०३

सृष्टि देखीं। जब मैं बोधदृष्टि से देखता, तब सब ब्रह्म ही दिखता। संकल्पदृष्टि से आत्मरूपी आदर्श में अनन्तसृष्टि देख पड़ती और चर्मदृष्टि से शिला ही दीखती। इस प्रकार मैं शिलाकोष में चला तो वहाँ मुझे घास, तृण, पत्थर, फल और फूलों की अनन्त सृष्टि दृष्टिगत होती और निसंकल्प आत्मदृष्टि से देखता तो अद्वैत आत्मा ही दीखता।

हे राम! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टि देखीं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि ब्रह्मा उपजे हैं और रचना रचने को समर्थ हुए हैं। कहीं ब्रह्मा ने चन्द्रमा सूर्य उपजाये हैं, और मर्यादा स्थापित की है। कहीं सम्पूर्ण पृथ्वी आदि तत्त्व उपजाये हैं। पर उसमें प्राण नहीं पड़े। कहीं समुद्र नहीं उपजे। कहीं आचार सहित सृष्टि दिखी। कहीं चन्द्रमा-सूर्य नहीं उपजे और कहीं उपजे थे। कहीं चन्द्रमा शिव से नहीं निकले। कहीं क्षीरसमुद्र मथा नहीं गया और अमृत नहीं निकला और लक्ष्मी, हाथी, घोड़ा, धन्वन्तरि वैद्य भी नहीं निकले। कहीं विष और अमृत नहीं निकला। कहीं देवता मरते हैं। कहीं क्षीरसमुद्र मथा गया है और उससे अमृत निकला है। कहीं प्रकाश नहीं होता; कहीं सदा प्रकाश ही रहता है। कहीं पृथ्वी पर पर्वतों के सिवा कुछ नहीं देख पड़ता। कहीं इन्द्र के वज्र से पर्वतों के पंख कटे थे और कहीं वे पर्वत उड़ते थे। कहीं प्राणियों को जरा-मृत्यु का भय नहीं होता, कल्पपर्यन्त ज्यों के त्यौं रहते हैं। कहीं प्रलय होता है। कहीं मेघ गर्जते हैं। कहीं सम्पूर्ण जल ही जल भरा है। कहीं आकाश ही है और प्राणी कोई नहीं दिखता। कहीं देवताओं के युद्ध होते थे; कहीं देवताओं को दैत्य जीतते थे; कहीं दैत्यों को देवता जीतते थे। कहीं देवता और दैत्यों में परस्पर प्रतीति थी। कहीं बलि और इन्द्र, रुद्र और वृत्तासुर का युद्ध होता था। कहीं मधुकैटभ दैत्य ब्रह्मा की कन्या से उत्पन्न होते थे। कहीं देखा सदा प्रसन्नता ही रहती है और लोग तीनों कालों की बातें जानते हैं। कहीं सदा शोकाकुल ही रहते हैं। कहीं सतयुग का समय है और दान, पुण्य, तप होते हैं। कहीं कलियुग का समय है और प्राणी पाप में लिप्त हैं। कहीं अर्द्धयुग बीता था। कहीं राम और रावण का युद्ध होता

६०५ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

था । कहीं रावण का राम ने मर्दन किया था; कहीं राम का रावण ने मर्दन किया था । कहीं सुमेरु पर्वत तले है और पृथ्वी ऊपर है । कहीं शेषनाग पर पृथ्वी है और भूचाल से घूमती है । कहीं प्रलयकाल का जल चढ़ा है और एक बालक वट के वृक्ष पर बैठा अपने अंगुष्ठ को चूमता है । वह विष्णु भगवान है । कहीं ब्रह्मा के कल्प की रात्रि है और महाशून्य अन्धकार है । कहीं कौरव-पाण्डवों की सहायता कृष्ण करते हैं । कहीं महाभारत का युद्ध होता है, दोनों ओर से कई अक्षौहिणी सेना निकली है और श्रीकृष्णजी पाण्डवों की सहायता करते हैं । कहीं एक सृष्टि का नाश होता है और दूसरी उर्मी में वैसी ही और उत्पन्न होती है और वैसे कर्म, वैसा ही कुल, जाति और गोत्र होते हैं । कहीं उसमें अर्धभाग मिलता है । कहीं चतुर्थ भाग उर्मी का सा मिलता है । कहीं-कहीं उससे विलक्षण है ।

हे राम ! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टि देखीं, जो आत्मआदर्श में प्रतिबिम्बित थीं । जब मैं आत्मदृष्टि से देखता, तब सब चिदाकाश ही दिखता और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब जगत् भासित होता । कहीं ऐसी सृष्टि देखीं, जहाँ दशरथ के पुत्र राम हैं और रावण के मारने को समर्थ हुए हैं । कहीं तुम्हारे रूप के बड़े तपस्वी रहते हैं, जिनके मन सदा प्रसन्न हैं । ऐसी अनन्त सृष्टि देखीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं आगे भी ऐसा ही हुआ हूँ, अथवा किसी और प्रकार का हुआ हूँ, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कई वैसे ही, कई अर्धलक्षण के और कई चौथाई लक्षणवाले होते हैं । जैसे अन्न का बीज वैसा ही होता है, और कोई उसमें विशेष भी होता है, वैसे ही ये सब पदार्थ होते हैं । हे राम ! तुम भी आगे होगे और मैं भी आगे हूँगा, परन्तु आत्मा का विवर्त है । जैसे समुद्र में एक से तरङ्ग भी होते हैं और विलक्षण भी देख पड़ते हैं परन्तु वही जलरूप हैं वैसे ही हमारे सदृश भी फिर होंगे परन्तु आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं—संकल्प से भिन्न की नाईं विलक्षणरूप भासित होते हैं । जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा संकल्प से जगतरूप होकर भासित होता है । यद्यपि

  • निर्वाण प्रकरण * ६०५ ===

नाना प्रकार होकर जगत् भासता है तो भी दूसरा कुछ नहीं हुआ । यह जगत् चैतन्य का विलास है और चित्त के फुरने में अनन्त सृष्टि भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि बड़े आरम्भ से भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ भी भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आरम्भ परिणाम से कुछ नहीं बना, आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अनन्तजगद्वर्णनं नाम शताधिकनवनवतितमसर्गः ॥ १६६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी और फिर दृश्य भ्रम को त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित हुआ । मैं अनन्त, नित्य, शुद्ध, बोध, चिदाकाश और सर्वदा अपने आपमें स्थित हूँ । हे राम ! चिन्मात्र आत्मा के किसी स्थान में संवेदन का आभास फुरा है—जैसे अनाज के कोठे से एक मुट्ठी भर अन्न निकालिये और खेत में डालिये तो उसी से अंकुर निकलते हैं, वैसे ही चैतन्य में संवेदन फुरा है और उस संवेदन से जगत् उपजा है । जैसे जल डालने से अंकुर निकल आता है, वैसे ही मुझमें सृष्टि का अनुभव होने लगा और मैंने जाना कि सृष्टि मुझसे उपजी है । राम बोले, हे भगवन् ! तुम जो आकाशरूप अपने आपमें स्थित थे, उसमें सृष्टि तुमको कैसे फुरी ? दृढ़बोध के निमित्त मुझसे कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में तो कुछ उपजा नहीं, परन्तु जैसे सृष्टि हुई है, सो सुनो । मुझे अनुभव आकाश और अनन्त के किसी स्थान में संवेदन चित्त 'अहं' फुरा, अर्थात् 'मैं हूँ' यह अनुभव हुआ । उस अहंभाव के होने से मैं अपने को सूक्ष्म तेज अणु सा जानने लगा, और उस अणु में अहंकार उपजा । जिसको तुम अहंकार कहते हो, उस अहंकार की दृढ़ता से निश्चयात्मक बुद्धि उपजी । उस बुद्धि से संकल्प-विकल्प रूप मन उपजा और उस मन ने प्रपञ्च रचा । उस मन में देखने का स्पन्दन फुरा, तब चक्षु इन्द्रिय हुई और जिसको वह देखने लगा वह रूप दृश्य हुआ । फिर सुनने की इच्छा फुरी, तब श्रवण इन्द्रिय हुई और वह शब्द ही सुनने

६०६ योगवाशिष्ट

लगी। फिर रस लेने की इच्छा हुई, तब जिह्वा इन्द्रिय हुई और वह रस को ग्रहण करने लगी। जब सुगन्ध लेने की इच्छा की; तब नासिका इन्द्रिय हुई और सुगन्ध ग्रहण करने लगी। फिर स्पर्श करने की इच्छा में त्वचा इन्द्रिय प्रकट होकर स्पर्श ग्रहण करने लगी। इस प्रकार मुझको ज्ञानइन्द्रियाँ फुरीं और उनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषय उदय हुए। तब मैंने अपने साथ स्थूल देह देखा। जैसे कोई स्वप्न में अपना शरीर देखता है, वैसे ही मैंने देखा।

हे राम ! जिसको मैं देखने लगा, वह दृश्य हुआ और जिसमें मैं देखता था, वे इन्द्रियाँ हुईं। जब दृश्य फुरना हुआ; वह काल हुआ। जहाँ हुआ, वह देश हुआ, और जैसे हुआ, वह क्रिया हुई। इस प्रकार सब देश, काल, पदार्थ हुए हैं; सो मैंने तुमसे कहे। हे राम ! वास्तव में न कोई देह है, न इन्द्रियाँ हैं और न सृष्टि है, पर चित्तकला में हुए की नाई देख पड़ते हैं, जैसे स्वप्न की सृष्टि दिखती है। जब वह सृष्टि मुझको फुरी, तब पूर्वस्वरूप मुझे भूल गया। जैसे सुषुप्ति में अपना स्वरूप विस्मृत सा होता है, वैसे ही मुझको भूले की नाईं प्रतीत हुआ। तब जैसे स्वप्न में जाग्रतस्वरूप का और जाग्रत में स्वप्न के स्वरूप का विस्मरण होता है, वैसे ही पूर्व का स्वरूप मुझे भूल गया। जब शरीर और इन्द्रियाँ मुझको अपने साथ लगी जान पड़ीं तो उनमें मैंने अहंप्रत्यय करके ॐकार शब्द का उच्चारण किया। जैसे बालक माता के गर्भ से उत्पन्न होकर शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐशब्द का उच्चारण किया। जैसे कोई पुरुष स्वप्न में उड़ता और शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐकार का उच्चारण किया। ॐकार आदि, मध्य, अन्त से रहित परब्रह्म है और सर्वब्रह्माण्डरूपी तरङ्ग का आधार समुद्र है। हे राम ! जब मैं आधिभौतिक दृष्टि से देखूँ, तब मुझको शिला ही दिखे और जब आत वाहक दृष्टि से देखूँ, तब अनन्त ब्रह्माण्ड देख पड़ें और नाना प्रकार की क्रिया और मर्यादा सहित भासित हों, पर जब आत्मदृष्टि से देखूँ तब अद्वैत अपना रूप ही भासित हो। हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी भासती है, वैसे ही मुझको सृष्टि भासित होती थी।