योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1410, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ६०५ ===
नाना प्रकार होकर जगत् भासता है तो भी दूसरा कुछ नहीं हुआ । यह जगत् चैतन्य का विलास है और चित्त के फुरने में अनन्त सृष्टि भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि बड़े आरम्भ से भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ भी भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आरम्भ परिणाम से कुछ नहीं बना, आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अनन्तजगद्वर्णनं नाम शताधिकनवनवतितमसर्गः ॥ १६६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी और फिर दृश्य भ्रम को त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित हुआ । मैं अनन्त, नित्य, शुद्ध, बोध, चिदाकाश और सर्वदा अपने आपमें स्थित हूँ । हे राम ! चिन्मात्र आत्मा के किसी स्थान में संवेदन का आभास फुरा है—जैसे अनाज के कोठे से एक मुट्ठी भर अन्न निकालिये और खेत में डालिये तो उसी से अंकुर निकलते हैं, वैसे ही चैतन्य में संवेदन फुरा है और उस संवेदन से जगत् उपजा है । जैसे जल डालने से अंकुर निकल आता है, वैसे ही मुझमें सृष्टि का अनुभव होने लगा और मैंने जाना कि सृष्टि मुझसे उपजी है । राम बोले, हे भगवन् ! तुम जो आकाशरूप अपने आपमें स्थित थे, उसमें सृष्टि तुमको कैसे फुरी ? दृढ़बोध के निमित्त मुझसे कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में तो कुछ उपजा नहीं, परन्तु जैसे सृष्टि हुई है, सो सुनो । मुझे अनुभव आकाश और अनन्त के किसी स्थान में संवेदन चित्त 'अहं' फुरा, अर्थात् 'मैं हूँ' यह अनुभव हुआ । उस अहंभाव के होने से मैं अपने को सूक्ष्म तेज अणु सा जानने लगा, और उस अणु में अहंकार उपजा । जिसको तुम अहंकार कहते हो, उस अहंकार की दृढ़ता से निश्चयात्मक बुद्धि उपजी । उस बुद्धि से संकल्प-विकल्प रूप मन उपजा और उस मन ने प्रपञ्च रचा । उस मन में देखने का स्पन्दन फुरा, तब चक्षु इन्द्रिय हुई और जिसको वह देखने लगा वह रूप दृश्य हुआ । फिर सुनने की इच्छा फुरी, तब श्रवण इन्द्रिय हुई और वह शब्द ही सुनने