योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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लगी। फिर रस लेने की इच्छा हुई, तब जिह्वा इन्द्रिय हुई और वह रस को ग्रहण करने लगी। जब सुगन्ध लेने की इच्छा की; तब नासिका इन्द्रिय हुई और सुगन्ध ग्रहण करने लगी। फिर स्पर्श करने की इच्छा में त्वचा इन्द्रिय प्रकट होकर स्पर्श ग्रहण करने लगी। इस प्रकार मुझको ज्ञानइन्द्रियाँ फुरीं और उनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषय उदय हुए। तब मैंने अपने साथ स्थूल देह देखा। जैसे कोई स्वप्न में अपना शरीर देखता है, वैसे ही मैंने देखा।
हे राम ! जिसको मैं देखने लगा, वह दृश्य हुआ और जिसमें मैं देखता था, वे इन्द्रियाँ हुईं। जब दृश्य फुरना हुआ; वह काल हुआ। जहाँ हुआ, वह देश हुआ, और जैसे हुआ, वह क्रिया हुई। इस प्रकार सब देश, काल, पदार्थ हुए हैं; सो मैंने तुमसे कहे। हे राम ! वास्तव में न कोई देह है, न इन्द्रियाँ हैं और न सृष्टि है, पर चित्तकला में हुए की नाई देख पड़ते हैं, जैसे स्वप्न की सृष्टि दिखती है। जब वह सृष्टि मुझको फुरी, तब पूर्वस्वरूप मुझे भूल गया। जैसे सुषुप्ति में अपना स्वरूप विस्मृत सा होता है, वैसे ही मुझको भूले की नाईं प्रतीत हुआ। तब जैसे स्वप्न में जाग्रतस्वरूप का और जाग्रत में स्वप्न के स्वरूप का विस्मरण होता है, वैसे ही पूर्व का स्वरूप मुझे भूल गया। जब शरीर और इन्द्रियाँ मुझको अपने साथ लगी जान पड़ीं तो उनमें मैंने अहंप्रत्यय करके ॐकार शब्द का उच्चारण किया। जैसे बालक माता के गर्भ से उत्पन्न होकर शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐशब्द का उच्चारण किया। जैसे कोई पुरुष स्वप्न में उड़ता और शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐकार का उच्चारण किया। ॐकार आदि, मध्य, अन्त से रहित परब्रह्म है और सर्वब्रह्माण्डरूपी तरङ्ग का आधार समुद्र है। हे राम ! जब मैं आधिभौतिक दृष्टि से देखूँ, तब मुझको शिला ही दिखे और जब आत वाहक दृष्टि से देखूँ, तब अनन्त ब्रह्माण्ड देख पड़ें और नाना प्रकार की क्रिया और मर्यादा सहित भासित हों, पर जब आत्मदृष्टि से देखूँ तब अद्वैत अपना रूप ही भासित हो। हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी भासती है, वैसे ही मुझको सृष्टि भासित होती थी।