योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1409, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६०५ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
था । कहीं रावण का राम ने मर्दन किया था; कहीं राम का रावण ने मर्दन किया था । कहीं सुमेरु पर्वत तले है और पृथ्वी ऊपर है । कहीं शेषनाग पर पृथ्वी है और भूचाल से घूमती है । कहीं प्रलयकाल का जल चढ़ा है और एक बालक वट के वृक्ष पर बैठा अपने अंगुष्ठ को चूमता है । वह विष्णु भगवान है । कहीं ब्रह्मा के कल्प की रात्रि है और महाशून्य अन्धकार है । कहीं कौरव-पाण्डवों की सहायता कृष्ण करते हैं । कहीं महाभारत का युद्ध होता है, दोनों ओर से कई अक्षौहिणी सेना निकली है और श्रीकृष्णजी पाण्डवों की सहायता करते हैं । कहीं एक सृष्टि का नाश होता है और दूसरी उर्मी में वैसी ही और उत्पन्न होती है और वैसे कर्म, वैसा ही कुल, जाति और गोत्र होते हैं । कहीं उसमें अर्धभाग मिलता है । कहीं चतुर्थ भाग उर्मी का सा मिलता है । कहीं-कहीं उससे विलक्षण है ।
हे राम ! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टि देखीं, जो आत्मआदर्श में प्रतिबिम्बित थीं । जब मैं आत्मदृष्टि से देखता, तब सब चिदाकाश ही दिखता और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब जगत् भासित होता । कहीं ऐसी सृष्टि देखीं, जहाँ दशरथ के पुत्र राम हैं और रावण के मारने को समर्थ हुए हैं । कहीं तुम्हारे रूप के बड़े तपस्वी रहते हैं, जिनके मन सदा प्रसन्न हैं । ऐसी अनन्त सृष्टि देखीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं आगे भी ऐसा ही हुआ हूँ, अथवा किसी और प्रकार का हुआ हूँ, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कई वैसे ही, कई अर्धलक्षण के और कई चौथाई लक्षणवाले होते हैं । जैसे अन्न का बीज वैसा ही होता है, और कोई उसमें विशेष भी होता है, वैसे ही ये सब पदार्थ होते हैं । हे राम ! तुम भी आगे होगे और मैं भी आगे हूँगा, परन्तु आत्मा का विवर्त है । जैसे समुद्र में एक से तरङ्ग भी होते हैं और विलक्षण भी देख पड़ते हैं परन्तु वही जलरूप हैं वैसे ही हमारे सदृश भी फिर होंगे परन्तु आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं—संकल्प से भिन्न की नाईं विलक्षणरूप भासित होते हैं । जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा संकल्प से जगतरूप होकर भासित होता है । यद्यपि