योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1446, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६४१
का अधिकारी है। यह जगत् आत्मा का किञ्चन है, अज्ञानी को सत्य जान पड़ता है और ज्ञानी के निश्चय में कुछ नहीं है। जैसे किसी ने संकल्प से एक वृक्ष रचा हो तो उसके पत्ते, टास, फूल, फल उसको दिखते हैं, पर और के मन में शून्य होते हैं, वैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जगत् होता है, पर ज्ञानी के निश्चय में विलास और आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।
हे राम ! आत्मसत्ता सर्वत्र और सर्वव्यापी है। उसमें जैसा निश्चय फुरना होता है वैसा ही अहंप्रत्यय भावना की दृढ़ता से भासित होता है। जिस पदार्थ का निरन्तर दृढ़ अभ्यास होता है, वह अभ्यास, शरीर-त्याग करने पर भी, धारणारूप हो जाता है। पर आत्मसत्ता ज्ञानमात्र है और केवल अद्वैतसंविद् सबका अपना रूप है। जिसको स्वरूप का ज्ञान होता है, वह शास्त्रों के दण्ड से रहित होता है। वेद और शास्त्र जिसको भला, बुरा, सच या झूठ वर्णन करते हैं, उसमें जिस पुरुष को निश्चय होता है, उसको वे वासना के अनुसार फल देते हैं। और जिसके निश्चय में आत्मा से भिन्न सब शब्दों का अभाव होता है, उसको आत्म अनात्म विभाग की कल्पना भी नहीं रहती, चाहे देह रहे अथवा न रहे। हे राम ! जिसकी संविद् जगत् के शब्द-अर्थ में बँधी हुई है, उसको पदार्थों में राग-द्वेष उपजता है। जैसे सुपुप्ति में भी आत्मसत्ता है, पर अभाव की तरह स्थित है, वैसे ही नास्तिकवादी भी अपने जड़स्वरूप को देखते हैं, क्योंकि उनको जड़शून्यता का ही अभ्यास है और उसी में उनकी संविद् दृश्य सुख से बँधी हुई है, इससे उनका जगद्भ्रम नहीं मिटता। उस मलिन वासना से उन्हें संविद् मिली है, इससे उनको जड़ पत्थररूप प्राप्त होते हैं। उस जड़ता को भोगकर वे वासना के अनुसार फिर दुःख भोगेंगे। उस भावना से जगत् नहीं भासता, पर वे कुछ काल पीछे चैतन्य होकर फिर उन्हीं कर्मों को भोगते हैं। जैसे सूर्य के आगे बादल आवे और फिर हट जाय, वैसे ही उनके लिए जगत् होता है। स्फुरणरूपी जो जीव है, उसमें जैसा निश्चय होता है, वैसा ही भासित होता है।