योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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योगवाशिष्ठ
भासित होता है। हे राम ! हमको तो सदा चिदाकाश प्रतीति होता है—हम जागे हैं, इसमें द्वैत नहीं भासित होता। जैसे सूर्य को अन्धकार नहीं दिखता, वैसे ही हमको द्वैत नहीं दिखता। जो ज्ञानी है, उसको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं दिखता, उसे सर्वब्रह्म ही दिखता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थरूपवर्णनंनाम द्विशताधिकनवमसर्गः ॥ २०९ ॥
श्रीराम ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ तुमने कहा सो तो मैंने जाना परन्तु अब प्रश्न यह है कि नास्तिकवादी का कल्याण किस प्रकार होता है, क्योंकि वे कहते हैं कि जब तक जीव है, तब तक सुख भोगे, जब मर जायगा तब भस्मीभूत होगा। न कहीं आना है, न जाना है।
वशिष्ठ बोले, हे राम ! अखण्ड आत्मसत्ता आकाश की नाईं सर्वत्र व्याप्त है। जब तक उसका भान नहीं होता, तब तक मन का ताप नहीं नष्ट होता। जब आत्मसत्ता का भान होता है, तब शान्ति प्राप्त होती है और मनुष्य अपने को अमर जानता है। जिस पुरुष ने अखण्ड निश्चय अङ्गीकार किया है, उसको दुःख नहीं स्पर्श करता। वह ब्रह्मदर्शी होता है। और जिसको ब्रह्मसत्ता का निश्चय नहीं हुआ, उसको मन के ताप नहीं छोड़ते। वह स्वरूप के प्रमाद से अपने को मरता जानता है पर महाप्रलयरूप आत्मा में सब शब्दों का अभाव है। जैसे महाप्रलय में सब शब्दों का अभाव होता है, वैसे ही आत्मा में सब शब्दों का अभाव है। जिसको आत्मा में निश्चय हुआ है, उसको सब शब्दों का अभाव हो जाता है, वह महाज्ञानवान् है। उसको आत्मसत्ता ही दिखती है। जो वास्तव है, उसको हमारे उपदेश की आवश्यकता नहीं—वह ज्ञानी है। हे राम ! आत्मसत्ता में द्वैत जगत् कुछ नहीं बना परमार्थसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। उसमें जो सृष्टि भासती है, वह स्वप्न सदृश अकारण है, इसलिए ज्ञानवान् पुरुष सब शब्द-अर्थों को सत् नहीं जानता ! ऐसे पुरुष को हमारे उपदेश की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सब शास्त्रों का सिद्धान्त आत्मपद है, जो उसको जानता है, उसको फिर कुछ कर्तव्य नहीं रहता। जिसको ऐसी दशा नहीं हुई, वही उपदेश