योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1444, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६३६
है । हे राम ! राजसी वासना से जीव मनुष्य होते हैं । सात्त्विकी वासना से देवता होते हैं । पर जब मनुष्य शरीर रखकर निर्वासनिक होते हैं, तब मुक्ति पाते हैं । जब ज्ञान उत्पन्न होता है, तब जीवों के दुःख नष्ट हो जाते हैं । दुःख के नाश का और कोई उपाय नहीं है । ये जगत् के दुःख तब तक जान पड़ते हैं, जब तक आत्मज्ञान नहीं उपजा । जब आत्मज्ञान उपजता है, तब सब जगद्भ्रम मिट जाता है । मुझसे पूछो तो वास्तव में न कोई देवता है, न मनुष्य है, न पशु है, न पक्षी है, न पाषाण है, न वृक्ष है और न कीट है सब चिदाकाशरूप हैं, दूसरा कुछ नहीं बना, भ्रान्ति से नानास्वरूप भासित होते हैं । सर्वदाकाल सब प्रकार आत्मसत्ता अपने ही में स्थित है ।
हे राम ! न कुछ जगत् का होना है, न अनहोना है; न आत्मता शब्द है, न परमात्मता शब्द है, न मौन है, न अमौन है; न शून्य है, न अशून्य है; केवल अचेत चिन्मात्र अपने आपमें स्थित है । उसमें जन्म और जन्मान्तर भ्रम से भासित होते हैं । जैसे स्वप्न से स्वप्नान्तर भ्रम से भासित होता है । और जैसे स्वप्न में एक अपना रूप होता है निद्रादोष से द्वैत भासित होता है, वैसे ही अब भी आत्मा अद्वैत है; पर अविचार से नानात्व प्रतीत होता है । दुःख भी अज्ञान से होता है, विचार करने से दुःख कुछ नहीं । जो मृतक होकर उत्पन्न होता है, तो शान्ति हुई, दुःख कुछ नहीं, और जो मृतक होकर शान्त हो जाता है, उपजता नहीं, तो भी दुःख कोई नहीं, मुक्त हुआ । जो मरता नहीं तो भी ज्यों का त्यों हुआ, दुःख कोई नहीं हुआ । और जो सब चिदाकाश है तो भी दुःख की बात नहीं । हे राम ! अज्ञानी के निश्चय में दुःख है, पर विचार किये से दुःख कुछ नहीं । यह जगत् आत्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित है, परन्तु यह जगतरूपी कैसा प्रतिबिम्ब है, जो अकारणरूप है । इसका कारणरूप बिम्ब कोई नहीं । यह कारण से रहित है । जैसे नदी में जो नीलता का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह अकारणरूप है, वैसे ही यह जगत् अकारणरूप है । अज्ञानी को प्रमाद्दोष से उसमें सत्यता है और ज्ञानी को द्वैत नहीं भासित होता—अज्ञानी को द्वैत