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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1443, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1443

६३८ ❈ योगवाशिष्ट ❈

भावना होती है, वैसा ही उसको भासित होता है। मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, सबका अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है। जैसा संकल्प किसी को दृढ़ हो रहा है, उसको वैसा ही स्वरूप भासित होता है। जैसे मनुष्य राग, द्वेष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, क्षुधा, तृषा, हर्ष, शोक आदि विकारों में आसक्त होता है, वैसे ही कीट पतङ्ग, पक्षी आदि को भी होता है, परन्तु भेद इतना ही है कि जैसे हमको यह जगत् स्पष्टरूप दिखता है, वैसे उनको नहीं दिखता। संसारी सब हैं परन्तु वासना के अनुसार न्यून-अधिक भासता है और दुःख का अनुभव स्थावर-जङ्गम को भी होता है।

जब किसी स्थान में अग्नि लगती है और उसमें वृक्ष और पाषाण जलते हैं, तब उनको भी दुःख होता है, परन्तु सूक्ष्म-स्थूल का भेद है। जैसे और जीव के शस्त्रप्रहार करने से शरीर नष्ट होने का दुःख होता है, वैसे ही वृक्षादिक को भी होता है, परन्तु घनसुषुप्ति, क्षीण-सुषुप्ति और स्वप्न जाग्रत् का भेद है। पर्वत पाषाण को सूक्ष्म दुःख होता है, वृक्ष को पाषाण से विशेष दुःख होता है, परन्तु स्पष्ट मान और अपमान का दुःख नहीं होता; स्वप्न की नाईं होता है। मनुष्य और देवताओं को स्पष्ट रागद्वेष जाग्रत् की नाईं होता है; क्योंकि वे जाग्रत् अवस्था में स्थित हैं। और वृक्ष, पाषाण आदि को स्पष्ट दुःख का विकल्प नहीं उठता; क्योंकि वे जड़ स्वभाव में स्थित हैं, पर दुःख तो सबको होता ही है। और आश्चर्य देखो कि कीट महादुःखी रहते हैं। जब वे मृतक होते हैं, तब सुखी होते हैं। अज्ञान से जो इस शरीर में आस्था हुई है, उसको भी मरना बुरा लगता है तो और जीवों को भला कैसे न लगे। हे राम! अपने स्वरूप के प्रमाद से भय, क्रोध, लोभ, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, तृषा, राग-द्वेष, हर्ष, शोक, इच्छा आदि विकारों की अग्नि में जीव जलते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते और घटीयन्त्र की नाईं वासना के अनुसार भटकते हैं। जब वासना दृढ़ पाप की होती है, तब जीव पाषाण और वृक्षयोनि पाते हैं। जब क्षीण वासना तामसी होती है, तब तिर्यक् पक्षी, सर्प और कीटयोनि पाते