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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1450, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1450

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ <span style="float:right;">६४५</span>


वशिष्ठजी बोले, हे राम! मैं चिदाकाशरूप हूँ और द्रष्टा दर्शन दृश्य त्रिपुटी जो भासती है, वह भी चिदाकाशरूप है। आत्मसत्ता ही त्रिपुटीरूप होकर भासती है—दूसरी वस्तु कुछ नहीं। नास्तिकवादी जो यह कहते हैं कि परलोक कोई नहीं, अर्थात् जो कहते हैं कि आत्मसत्ता कोई नहीं, वे मूर्ख हैं। हे राम! जो अनुभव आत्मसत्ता न हो तो नास्तिक किसमे सिद्ध हो? जिसमे नास्तिकवाद भी सिद्ध होता है वही आत्मसत्ता है। जो इष्ट-अनिष्ट पदार्थ में राग-द्वेष करते हैं और आत्मा का नाश कहते हैं, वे महामूर्ख हैं। जैसे जाग्रत् के प्रमाद से स्वप्न में इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष होता है, जीव इष्ट को ग्रहण करता और अनिष्ट को त्यागता है, जागने पर सब अपना ही स्वरूप दिखता है और ग्रहण-त्याग तथा रागद्वेष किसी पदार्थ में नहीं रहता, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से किसी पदार्थ में राग होता है और किसी में द्वेष होता है। जब आत्मज्ञान होता है, तब सब अपना ही स्वरूप दिखता है और किसी में राग-द्वेष नहीं रहता। चित्त के फुरने से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के शान्त होने पर लय हो जाता है, इससे जगत् मन में स्थित है; और वह मन आत्मा के अज्ञान से हुआ है। जब आत्मज्ञान होता है, तब मनुष्य, देवता, हाथी, नाग आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आत्मरूप दिखता है और किसी में राग-द्वेष नहीं रहता। नास्तिकवादी जो नास्ति कहते हैं, वही अस्ति का साक्षी सिद्ध होता है। जिससे नास्ति भी सिद्ध होता है, वह अस्ति आत्मपद है। उस अस्ति अनुभव के इतने नाम शास्त्रकार कहते हैं—सत्, आत्मा, विष्णु, शिव, चिदाकाश, ब्रह्म, अहंब्रह्म और अस्ति। एक कहते हैं कि शून्य ही रहता है और एक कहते हैं कि अस्ति पद रहता है।

हे राम! ये सब संज्ञा आत्मसत्ता ही की हैं। वह आत्मसत्ता अपना ही आप स्वरूप है। वही आत्मा मैं हूँ। ये अङ्ग जो मेरे साथ दिखते हैं, इनको इष्ट पदार्थों से लेपन कीजिये अथवा चूर्ण करिये तो मुझे हर्ष या शोक कुछ नहीं होगा। इनके बढ़ने से मैं बढ़ता नहीं और इनके नष्ट होने से मैं नष्ट नहीं होता। हे राम! तीन शब्द होते हैं—'मैं जन्मा हूँ',