योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1451, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६४६ * योगवाशिष्ठ *
'मैं जीता हूँ' और 'मैं मरूँगा'। जो प्रथम न हो और उपजे उसको जन्म कहते हैं, मध्य में जीना कहते हैं और फिर नाश हो उसको मृतक कहते हैं। पर आत्मा में तीनों विकार नहीं हैं। आत्मा उपजा भी नहीं, क्योंकि आदि ही सिद्ध है। वह मृतक भी नहीं होता, क्योंकि अवि-नाशी है। चैतन्य आकाश सबका और काल का भी अधिष्ठान है, फिर उसका कैसे नाश हो? वह तो उदय-अस्त से रहित है। जिसमें देश, काल, वस्तु और जगत् का किञ्चन होता है, उसमें आत्मा का नाश कैसे हो? इससे आत्मा अविनाशी है। हे राम! जिस वस्तु को देश और काल का परिच्छेद होता है, उसका नाश भी होता है। ये देश, काल और वस्तु, तीनों आत्मा में कल्पित हैं। जैसे सूर्य की किरणों में जल कल्पित होता है, वैसे ही आत्मा में ये तीनों कल्पित हैं। कल्पित वस्तुओं से सत्य का नाश कैसे हो? इससे आत्मा अविनाशी और अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे शून्य स्थान में बैताल कल्पित होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् कल्पित है। उस अभावरूप जगत् में जीव प्रमाद से एक का अभाव और दूसरे का सद्भाव जानता है। जब इस निश्चय को त्यागकर मोक्ष हो, तब शान्ति प्राप्त होगी। विचार करके देखिये तो इस संसार में दुःख कहीं नहीं। जो मरकर फिर जन्म लेता है, तो भी दुःख न होना चाहिए; क्योंकि शरीर जब वृद्ध होकर शीर्ण हुआ, तब उसको त्यागकर नव तनु को ग्रहण किया तो उत्साह हुआ होना चाहिए। जो मृतक होकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द होना चाहिए, क्योंकि जब तक जीता था, तब तक ताप था। एक का भाव जानता था, एक को ग्रहण करता था और एक को त्याग करता था। इससे सन्तप्त होता था। उनसे यदि छूटा तो बड़े आनन्द की बात है। और जो सब चिदाकाशरूप है तो भी अपना रूप आनन्दरूप है; दुःख कुछ न हुआ।
हे राम! एक प्रमाद से ही दुःख होता है, और किसी प्रकार दुःख नहीं होता। यह सब जगत् आत्मरूप है, और जब आत्मरूप है तो दुःख कैसे हो? जो तुम कहो कि मैं अपने कर्मों से डरता हूँ, जो पर-