योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1452, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६४७
लोक में मेरे लिए भय का कारण होंगे तो ऐसे जानो कि बुरे कर्म का दुःख-कष्ट यहाँ भी होना है और परलोक में भी होगा—इससे बुरे कर्म मत करो। मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिससे तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जायँगे। वह उपाय यह है कि तुम जानो 'मैं नहीं'; अथवा ऐसे जानो कि 'सब मैं ही हूँ'। सब वासनाएँ त्यागकर अपने को अविनाशी जानो और आत्मसत्ता में स्थित होओ। यह सब जगत् भी तुम्हारा ही रूप है। जब ऐसे आत्मा को जानोगे, तब शरीर के त्याग से भी कोई दुःख न रहेगा और शरीर के होते भी दुःख न होगा। यदि पूर्व शरीर को त्यागकर नया जन्म लिया तो भी आनन्द हुआ, परम शान्ति हुई। और जो चिदाकाशरूप है तो भी परम आनन्द हुआ। हे राम! सब प्रकार आनन्द है। केवल भ्रान्ति से दुःख होता है। जब स्वरूप का साक्षात्कार होगा, तब सब जगत् ब्रह्मानन्दस्वरूप प्रतीत होगा। हे राम! जिसको आत्मसत्ता का प्रकाश प्राप्त है, वह पुरुष सदा आनन्द में मग्न रहता है। वह प्राकृत आचार भी करता है, परन्तु इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में स्वरूप से चलायमान कभी नहीं होता। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में चलायमान नहीं होता और परम गम्भीर रहता है। अतएव जो कुछ आत्मा से भिन्न उत्थान होता है, उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ, क्योंकि चिन्मात्रसत्ता शरत्काल के आकाश सदृश निर्मल है। जब ऐसे स्वच्छ केवल और चिन्मात्र का अनुभव होगा, तब जगत् द्वैतरूप न भासेगा और व्यवहार में भी द्वैत न फुरेगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमउपदेशवर्णनं नाम द्विशताधिकैकादशस्सर्गः ॥ २११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! जिन पुरुषों को आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है, वे कैसे हो जाते हैं और उनका कैसा आचार होता है, यह मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे उनकी चेष्टा और जैसा उनका निश्चय होता है, सो सुनो। उनका सबके साथ मित्रभाव होता है, बल्कि पाषाण से भी मित्रता होती है। बन्धुओं को