योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६४७
लोक में मेरे लिए भय का कारण होंगे तो ऐसे जानो कि बुरे कर्म का दुःख-कष्ट यहाँ भी होना है और परलोक में भी होगा—इससे बुरे कर्म मत करो। मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिससे तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जायँगे। वह उपाय यह है कि तुम जानो 'मैं नहीं'; अथवा ऐसे जानो कि 'सब मैं ही हूँ'। सब वासनाएँ त्यागकर अपने को अविनाशी जानो और आत्मसत्ता में स्थित होओ। यह सब जगत् भी तुम्हारा ही रूप है। जब ऐसे आत्मा को जानोगे, तब शरीर के त्याग से भी कोई दुःख न रहेगा और शरीर के होते भी दुःख न होगा। यदि पूर्व शरीर को त्यागकर नया जन्म लिया तो भी आनन्द हुआ, परम शान्ति हुई। और जो चिदाकाशरूप है तो भी परम आनन्द हुआ। हे राम! सब प्रकार आनन्द है। केवल भ्रान्ति से दुःख होता है। जब स्वरूप का साक्षात्कार होगा, तब सब जगत् ब्रह्मानन्दस्वरूप प्रतीत होगा। हे राम! जिसको आत्मसत्ता का प्रकाश प्राप्त है, वह पुरुष सदा आनन्द में मग्न रहता है। वह प्राकृत आचार भी करता है, परन्तु इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में स्वरूप से चलायमान कभी नहीं होता। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में चलायमान नहीं होता और परम गम्भीर रहता है। अतएव जो कुछ आत्मा से भिन्न उत्थान होता है, उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ, क्योंकि चिन्मात्रसत्ता शरत्काल के आकाश सदृश निर्मल है। जब ऐसे स्वच्छ केवल और चिन्मात्र का अनुभव होगा, तब जगत् द्वैतरूप न भासेगा और व्यवहार में भी द्वैत न फुरेगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमउपदेशवर्णनं नाम द्विशताधिकैकादशस्सर्गः ॥ २११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! जिन पुरुषों को आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है, वे कैसे हो जाते हैं और उनका कैसा आचार होता है, यह मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे उनकी चेष्टा और जैसा उनका निश्चय होता है, सो सुनो। उनका सबके साथ मित्रभाव होता है, बल्कि पाषाण से भी मित्रता होती है। बन्धुओं को
६४८ = * योगवाशिष्ठ *
वे ऐसे जानते हैं, जैसे वन के वृक्ष और पत्ते होते हैं, और स्त्री-पुत्रादि के साथ वे वन के मृग के पुत्र से होते हैं। जैसे जंगली मृगों का मन्न में स्नेह नहीं होता, वैसे ही वे पुत्रादिक में भी स्नेह नहीं करते। जैसे माता का पुत्र पर दया और ममता होती है, वैसे ही वे सब पर दया करते हैं, और निश्चय में उदासीन रहते हैं। जैसे आकाश किसी से स्पर्श नहीं करता, वैसे ही वे किसी में लिप्त नहीं होते। आपदा उनको परमसुख होती है। जितने जगत में रस हैं, वे उनको विरस हो जाते हैं। वे न किसी में राग करते हैं और न किसी में द्वेष। वे तृष्णा करते भी दिखते हैं, परन्तु हृदय में जड़ और पत्थर की नाईं होते हैं। व्यवहार करते भी हैं, परन्तु निश्चय में परमशून्य और मौन होते हैं; अर्थात् सदा समाधि में स्थित रहते हैं। वे सब कर्म करते दिखते हैं, सो इस प्रकार करते हैं कि सब उनकी स्तुति करते हैं। वे यत्न से रहित सब कर्मों का आरम्भ करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अपने को अकर्ता मानते हैं। जो कुछ उन्हें प्रारब्ध गति से प्राप्त होता है, उसे भोगते हैं और देश काल-कर्म, सबको अङ्गीकार करते हैं। जो परलोकादि अनिष्ट आगत प्राप्त होते हैं उनका त्याग भी करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अकर्ता ज्यों के त्यों रहते हैं। वे सुख-दुःख की प्राप्ति में समबुद्धि रहते हैं। प्राकृत आचार यथाशास्त्र करते हैं, परन्तु स्वरूप से कभी विचलित नहीं होते। जैसे फूल की चोट से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही दुख सुख की प्राप्ति में नहीं डिगते। वे सदा स्वभाव में स्थित रहते हैं और सुख-दुःख को भोगते भी दिखते हैं, पर उनके निश्चय में कुछ नहीं होता।
जैसे स्फटिकमणि के सम्मुख कोई रङ्ग रखिये तो उसमें झलकता है परन्तु उसका रूप कुछ और नहीं हो जाता, वह ज्यों का त्यों ही रहती है, वैसे ही सुख-दुःख के भोग ज्ञानवान् में भी दिखते हैं, परन्तु वे स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होते। चेष्टा वे अज्ञानी की नाईं करते हैं, परन्तु निश्चय से परमसमाधिस्थ हैं। जैसे अज्ञानी को भविष्यत् का राग-द्वेष या सुख-दुःख कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी को वर्तमान का राग-द्वेष
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६४६
नहीं होता । उनकी स्वाभाविक चेष्टा ऐसी होती है—वह सबसे मित्र-भाव रखता है । न उससे कोई खिन्न होता है और न वह किसी से खिन्न होता है । जब उसे सुख प्राप्त होता है, तब वह रागवान् दिखता है और दुःख की प्राप्ति में द्वेषी दिखता है; परन्तु निश्चय से उसको हर्ष-शोक कुछ नहीं । जैसे नट स्वाँग लाता है और जैसा स्वाँग होता है, वैसी ही चेष्टा करता है—राजा का स्वाँग हो अथवा दरिद्री का, परन्तु निश्चय उसे अपने स्वरूप में ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख-दुःख दिखते हैं, परन्तु निश्चय उसका आत्मस्वरूप में ही होता है । वह पुत्र, धन, बान्धव आदि को बुलबुले की नाईं जानता है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं और फिर लीन भी हो जाते हैं, परन्तु जल को कुछ राग द्वेष नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष कुछ नहीं होता । वह सब पर दया रखता है और पतित-प्रवाह में जो सुख-दुःख आकर प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जैसे वायु दुर्गन्ध-सुगन्ध को साथ ले जाती है, परन्तु उसको उससे रागद्वेष कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं होता । वह बाहर अज्ञानी की नाईं व्यवहार करता है, परन्तु निश्चय में जगत् को भ्रान्तिमात्र जानता अथवा 'सबब्रह्म' जानता है । वह सदा स्वभाव में स्थित रहता है और अनिच्छित प्रारब्ध को भोगता है, परन्तु जाग्रत् में सुषुप्ति की नाईं स्थित रहता है, भूत और भविष्य की चिन्ता नहीं करता और वर्तमान में विचरता है—वह हृदय से शीतल रहता है और बाहर इष्ट-अनिष्ट दिखते हैं । पर हृदय से वह अद्वैतरूप है । ज्ञानवान् कर्म करता है परन्तु कर्म में अकर्म को जानता है और जीना ही मृतक की नाईं है । हे राम ! जैसे मृतक होता और उसको फिर जगत् की कलना नहीं फुरती, वैसे ही जिसको आत्मपद में अहंप्रत्यय हुआ है, उसको द्वैत नहीं भासता । प्रत्यक्ष व्यवहार उसमें दिखता भी है, परन्तु निश्चय में अर्थ शान्त हो गया है ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ये ज्ञानी के जो लक्षण आपने कहे सो उनको वही जानें और कोई नहीं जानता; क्योंकि बाहर की चेष्टा तो
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अज्ञानी के तुल्य ही है, पर हृदय मे वे शान्तरूप हैं। ब्रह्मचर्य से भी हृदय में धैर्य होता है और तपस्या से भी राग-द्वेष कुछ नहीं फुरता एक मिथ्या तपस्वी है, जो वैसे ही बन बैठते हैं। उनका निश्चय सत्य है अथवा असत्य, वे असल हैं या नकली, यह कैसे जानिये ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! यह निश्चय सत्य हो अथवा असत्य, ये लक्षण सन्त के ही हैं। आत्मा के साक्षात्कार का निश्चय मनुष्य अपने आपसे जानता है और किसी से नहीं जाना जाता, इस कारण उसका लक्षण ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जानता। जैसे सर्प के खोज को सर्प ही जानता है और कोई नहीं जानता, वैसे ही ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद्य है। हे राम ! ये जो गुण कहे हैं, सो ज्ञानवान् में स्वाभाविक ही रहते हैं, दूसरे को यत्नसाध्य हैं। ज्ञानवान् को सब जगत् भ्रान्तिमात्र है अथवा अनुभवदृष्टि से अपना रूप ही दिखता है, इसी कारण ज्ञानी परमशान्त है और उसके निश्चय में राग-द्वेष नहीं फुरता। वह अपने निश्चय को बाहर नहीं प्रकट करता, पर जो अधिकारी है, वह उसको जानता है। जो अनधिकारी अज्ञानी है, वह उसको नहीं जान सकता। जैसे वन में चन्दन की बड़ी सुगन्ध होती है, परन्तु दूर से नहीं जान पड़ती, वैसे ही अज्ञानी उसके निश्चय से दूर है, इस कारण वह नहीं जान सकता। चर्मदृष्टि से उसको देखे तो नहीं देख सकता और वह अधिकारी बिना जनाता भी नहीं। जैसे अमूल्य चिन्तामणि नीच को दीजिये तो भी वह उसके माहात्म्य को नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि है, अनधिकारी अज्ञानी उसका माहात्म्य नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है—इसी कारण ज्ञानवान् उसे प्रकट नहीं करते।
हे राम ! यह जो प्रकट है कि हमको अर्थ की प्राप्ति होगी, हमारा मान होगा, हमारे चेले बनेंगे और हमारी पूजा होगी, उसे ज्ञानवान् गन्धर्वनगर और इन्द्रजाल की नाईं जानते हैं। फिर वे किसकी चाह करें ? इस कारण वे अनधिकारी को अपना इष्ट नहीं प्रकट करते, और जो कोई उनके निकट बैठता है तो भी अपने निश्चयरूपी अङ्ग को वे
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५१
सकुचा लेते हैं। जैसे कछुआ अपने अङ्गों को समेट लेता है, वैसे ही वे अपने निश्चयरूपी अङ्ग को समेट लेते हैं, पर जिसको अधिकारी देखते हैं, उसके आगे प्रकट करते हैं। हे राम! पात्र में रक्खा पदार्थ शोभा पाता है, अपात्र में रक्खा अशोभन हो जाता है। जैसे गौ को घास देने से वह दूध हो जाती है और सर्प को दूध देने से वह विष हो जाता है, वैसे ही अधिकारी को दिया उपदेश शुभ होता है और अनधिकारी को अनिष्ट हो जाता है। हे राम! अणिमा आदि जो सिद्धियाँ हैं, वे जप, द्रव्य, काल अथवा देश से सबको प्राप्त होती हैं—अभ्यास के बल से अज्ञानी को भी प्राप्त होती हैं—और ज्ञानी को तो होती ही हैं, परन्तु ये ज्ञान का फल नहीं, जप आदिक का फल हैं। जिसकी सिद्धि के लिए जो पुरुष दृढ़ होकर लगता है, वही सिद्ध होता है। जो इन सिद्धियों का दृढ़ अभ्यास करता है तो उनसे आकाश-मार्ग में उड़ने और आने-जाने लगता है। पर ये पदार्थ तबतक अच्छे लगते हैं, जब तक आत्ममार्ग नहीं सूझता।
हे राम! परम सिद्धता इनसे नहीं प्राप्त होती। परमसिद्धि आत्मपद है। जिसको आत्मपद की प्राप्ति हुई है, वह इन सिद्धियों की अभिलाष नहीं करता। ऐसा पदार्थ पृथ्वी में कोई नहीं और न आकाश में देवताओं के स्थानों में ही है, जिसमें ज्ञानी का चित्त मोहित हो। ज्ञानवान् को सब पदार्थ मृगतृष्णा के जल से लगते हैं। मेरा सिद्धान्त तो यही है कि सदा विषयों से उपरत रहना और आत्मा को परम इष्ट जानना ही ज्ञान है। ज्ञानी को जो प्रारब्ध से प्राप्त हो, उसको वह करता है, परन्तु करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ प्रत्यवाय भी नहीं होता। न किसी अर्थ का वह आश्रय करता है, न उसके निमित्त किसी भूत का आश्रय करता है, और सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित होता है। ऐसे निश्चय को पाकर उसे आश्चर्य होता है। वह कहता है कि बड़ा आश्चर्य है, जो सदा अपना स्वरूप है उसको भूल कर मैं इतने काल तक भरमता रहा? पर अब मुझको शान्ति प्राप्त हुई है। जगत् को देखकर वह हँसता है, क्योंकि यह जगत् आभासरूप
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है और अपनी ही संवित् में स्थित है । जैसे आरसी में प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही अपनी संवित् में जगत् स्थित है । उसको जो द्वैत जानता है और राग-द्वेष में जलता है, ऐसे अज्ञानी को देखकर ज्ञानी हँसता है और व्यवहार करता भी हँसता है । जैसे किमी ने स्वप्न में हाथ सुवर्ण दिया और फिर ले लिया और इसने उसको स्वप्न जाना तो रोदन करता है, परन्तु हँसता है और कहता है कि यह मेरा ही स्वरूप है । वैसे ही ज्ञानी व्यवहार करता भी अपने निश्चय में हँसता है । जैसे किमी ग्राम में अग्नि लगे और एक पुरुष उस गाँव से निकलकर पर्वत पर जा बैठे, तब वह जलतों को देखकर हँसता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भी संसाररूपी जलते नगर से निकलकर आत्मरूपी पर्वत पर जा बैठता है और अज्ञानियों को जलता देखकर हँसता है, अर्थात् आप अशोक होकर उनको सशोक देखता है ।
हे राम ! जब ज्ञानवान् बोधदृष्टि से देखता है, तब अद्वैतसत्ता दिखती है, और जब अन्तवाहक में स्थित होकर देखता है, तब जैसे पदार्थ होते हैं, वैसा ही उनको देखता है और अपने को सदा शान्तरूप देखता है । मतलब यह कि जो आत्मतत्त्व परमानन्दस्वरूप है, उसमें भिन्न जितने पदार्थ हैं वे सब दोषरूप हैं और सिद्धि आदि जितनी क्रिया हैं, वे संसार का कारण हैं । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग बड़े और कई छोटे
✻ निर्वाण प्रकरण ✻
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और परमदया की खान होता है। जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर वर्षा करते हैं, सो उस जल का स्थान समुद्र ही होता है, तैसे ही जितने लोग दयालु दिखते हैं, वे ज्ञान के प्रसाद से ही दया करते हैं। दया का स्थान ज्ञानवान् ही है। ज्ञानवान् सबका हृदय है। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य आकर प्राप्त होता है, उसे वह करता है, और जो शरीर को दुःख आकर प्राप्त होता है, उसे ऐसे देखता है, जैसे अन्य के शरीर को हो रहा हो। अपने में वह सुख-दुःख, दोनों का अभाव देखता है।
जिनको यह अभ्यास नहीं हुआ, वे शरीर के राग-द्वेष से संतप्त होते हैं। ज्ञानी को शान्ति युक्त देखकर औरों को भी प्रसन्नता हो आती है। जैसे पुण्य करके जो स्वर्ग को गया है, उसे वहाँ इष्ट पदार्थ दिखते हैं, कल्पवृक्ष की सुन्दर मञ्जरियाँ और सुन्दर अप्सरा आदि दिखती हैं, जिन पदार्थों को देखकर प्रसन्नता उपजती है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति जो पुरुष करता है, उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शीतल करता है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति शीतलता उपजाती है। ज्ञानवान् आत्मपद को पाकर आनन्दित होता है और वह आनन्द कभी दूर नहीं होता, क्योंकि उसको उस आनन्द के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण समान लगती हैं। हे राम! ऐसे पुरुषों को आचार और जिन स्थानों में वे रहते हैं, वह भी सुनो। कई तो एकान्त में जा बैठते हैं, कई शुभ स्थानों में रहते हैं, कई गृहस्थी ही में रहते हैं, कई अवधूत होकर सबको दुर्वचन कहते हैं, कई तपस्या करते हैं, कई परम ध्यान लगाकर बैठते हैं, कई नंगे फिरते हैं, कई बैठे राज्य करते हैं, कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं, कई परम मौन धारे हैं, कई पहाड़ की कन्दराओं में जा बैठते हैं, कई ब्राह्मण हैं, कई संन्यासी हैं, कई अज्ञानी की नाईं विचरते हैं, कई नीच पामर होते हैं, कई आकाश में उड़ते हैं और नाना प्रकार की क्रिया करते दिखते हैं, परन्तु सदा अपने स्वरूप में स्थित हैं।
हे राम! देह और इन्द्रियाँ पुरुष नहीं और अन्तःकरण चतुष्टय भी
६५४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵
पुरुष नहीं, पुरुष केवल चिदाकाशरूप है। वह न कुछ करता है और न किसी से उसका नाश होता है। जैसे नट स्वाँग भरता और मचेष्टा करता है, परन्तु नटभाव में अपने को असंग देखता है, वैसे ही ज्ञानवान् व्यवहार भी करते हैं, परन्तु अपने को अकर्ता और असंग देखते हैं। वे ऐसा निश्चय रखते हैं कि हम अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल और सनातन हैं। हे राम! इस प्रकार जिसको आत्मा में अहं प्रतीति हुई है, उसका नाश कैसे हो और वह बन्धन में कैसे पड़े? वह पुरुष चाहे जैसे आरम्भ करे और चाहे जैसे स्थान में रहे, उसको बन्धन नहीं होता। चाहे वह पाताल में चला जाय, आकाश में उड़ता फिरे अथवा देशान्तर में घूमता फिरे उसको न कुछ अधिक है और न कुछ न्यून है। पहाड़ में चूर्ण हो जाय तो भी वह चूर्ण नहीं होता। यह तो चैतन्य पुरुष है। शरीर का नाश होने से उसका नाश कैसे हो? ऐसे अपने स्वरूप में वह सदा स्थित है और आकाश सदृश परम निर्मल, अजर, अमर और शिवपद है। इससे हे राम! ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक द्वादशसर्गः ॥२१२॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक भावमात्र, दूसरा भाममात्र और तीसरा भामितमात्र है। भावमात्र केवल चैतन्यमात्र को कहते हैं। उसमें जो चेत्योन्मुखता अहंकार का उत्थान हुआ, उसका नाम भाम है, और उसमें जो जगत् हुआ, उसका नाम भामित है। भामित कल्पित का नाम है। कल्पित के नाश से अधिष्ठान का नाश नहीं होता। जो अधिष्ठान कुछ और भाव हो तो उसका नाश भी हो। वह तो और कुछ बना नहीं। उसके फुरने से तीन संज्ञा हुई हैं; अतएव फुरना भी उर्मी का किञ्चन है। आत्मा फुरने या न फुरने में ज्यों का त्यों है। जैसे स्पन्दन और निस्पन्द वायु एक ही है, वैसे ही बोध और अबोध में आत्मा एक ही है। बोध, अबोध, फुरना न फुरना एक रूप है। हे राम! उस आत्मा का किसमें और कैसे नाश हो? चैतन्य भी मरता हो तो इसका किञ्चन जगत् कैसे रहे? किञ्चन आभास को कहते हैं, वह
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५५
आभास अधिष्ठान के बिना नहीं होता, इससे आत्मा का नाश नहीं होता। और तुम जो चैतन्य को भी मरता मानो कि मरकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द की बात है। मेरा भी यही उपदेश है कि चेतनता मिटे। जब चेतनता उपजती है, तब जगत् भासित होता है। उसके मिटने पर आत्मा ही शेष रहेगा। ब्रह्म चैतन्य का तो नाश नहीं होता। जो तुम कहो कि वह चैतन्य नष्ट हो जाता है—यह और चैतन्य है, जिससे जगत् होता है, तो हे राम! अनुभव तो एक ही है, उसका नाश कैसे मानिये? जैसे बरफ शीतल है, चाहे किसी ठौर पान कीजिये वह सबको शीतल ही है, और अग्नि उष्ण ही है, चाहे जिस जगह से स्पर्श कीजिये, उष्ण ही अनुभव होता है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। वह एक अखण्डरूप है, जहाँ कोई पदार्थ दिखता है, उसी चेतनता में प्रकाशित होता है। वह चैतन्यसत्ता स्वच्छ, निर्मल और अद्वैत तथा सदा अपने आप में स्थित है; उसका नाश कैसे हो?
जो तुम शरीर के नाश से आत्मा का नाश होता मानो तो ठीक नहीं, क्योंकि शरीर यहाँ अखण्ड पड़ा है और वह परलोक में चेष्टा करता है। और पिशाच आदि का शरीर भी नहीं देख पड़ता। जो शरीर के बिना उसका अभाव होता हो तो उनका भी अभाव हो जाता। इससे शरीर का अभाव होने पर आत्मा का अभाव नहीं होता, क्योंकि शरीर के निर्जीव होने पर शरीर से कुछ चेष्टा नहीं होती, क्योंकि जीवकला में पुर्यष्टका नहीं है। शरीर तो अखण्ड पड़ा है, उसमें कुछ नहीं होता और जीव परलोक में सुख-दुःख भोगता है, तो शरीर का नाश होने पर उसका नाश नहीं हुआ। जो तुम कहो कि सब स्वभाव उसमें रहता है तो सर्वदा उसको क्यों नहीं देखते? उसी समय अपने को क्यों मृतक देखते हैं और बन्ध बान्धव भाई, सब उसी समय क्यों मृतक जानते हैं। जो तुम कहो कि जीवित धर्म से वेष्टित है, इसी से सब अवस्था का अनुभव नहीं करता, मृत्यु समय जब जीवत्व नष्ट हो जाता है तब मृतक होता है। तो जो ऐसा हो तो परलोक का अनुभव न
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करे । पर ऐसा तो नहीं है, क्योंकि जब शरीरपात होता है, तब स- अवस्था को भी जानता है और परलोक में जो शब्द होता है, उम अनुभव करता है, अपने कर्म के अनुसार सुख दुःख भोगता है और देश स्थान को प्राप्त होता है । यह बात शास्त्र में भी सिद्ध है और अ- भव से भी प्रसिद्ध है कि मृतक को किमी ने नहीं जाना और अभ को किमी ने नहीं जाना । और जिसने जाना, वह आत्मा एक अक्षर है—इससे हे राम ! शरीर के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध है और जैसा निश्चय उसमें होता है, वैसा ही होकर भासित होता है और जैसा मिलता है, वैसा ही प्रकाशता है । ऐसा जो सत्य आत्मा है, वह किमी में नहीं बँधता जैसे रस्सी में सर्प का आकार भासित होता है, पर वह रस्सी सर्प तो नहीं हो जाती; जो कल्पित सर्प का अभाव हो जाता है, तब रस्सी ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मसत्ता आकार होकर भासित होती है, परन्तु आकार तो नहीं होती, जब आकार का अभाव हो जाता है, तब आत्मसत्ता ज्यों की त्यों रहती है, इसी कारण उसे बन्धन नहीं होता । ऐसी आत्म- सत्ता में जो विकार दिखते हैं, वे भ्रममात्र हैं और भ्रान्ति से ही लोग दुःख पाते हैं ।
हे राम ! यह जगत् आभासमात्र है, और उस आभासमात्र में जो राग-द्वेष आदि फुरते हैं, उनकी निवृत्ति का उपाय मैं तुमसे कहता हूँ, जो कुछ उपदेश मैंने किया है, उसके विचारने से भ्रान्ति निवृत्त हो जायगी और आत्मपद की प्राप्ति होगी । अभ्यास के बिना जीव जो आत्मपद की प्राप्ति चाहे तो कभी न होगी । जब बारम्बार अभ्यास करेगा, तब द्वैतभ्रम मिट जायगा और आत्मपद प्राप्त होगा । जिसका कोई नित्य अभ्यास करता है और यत्न भी करता है, वह प्राप्त होता है । वह कौन पदार्थ है, जो अभ्यास से प्राप्त न हो ? जो थककर फिरे नहीं और दृढ अभ्यास करे तो प्राप्त होता ही है । राज्य की लक्ष्मी तब प्राप्त होती है, जब रण में दृढ होकर युद्ध करते हैं और जय होती है । यदि केवल मुख से कहे कि मेरी जय हो तो नहीं होती । वैसे ही
❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ६५७
आत्मपद भी तब प्राप्त होगा, जब दृढ़ अभ्यास करोगे-अभ्यास के बिना कहने भर से कुछ प्राप्त नहीं होता। हे राम ! इस मन के दो प्रवाह हैं। एक जगत् का कारण है और दूसरा स्वरूप की प्राप्ति का कारण। जो असत् शास्त्र हैं और जिनमें आत्मज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा, उनको छोड़ो। यह जो महारामायण मोक्ष का उपाय है, उसमें चार वेद, पट्शास्त्र और सब इतिहासों और पुराणों का सिद्धान्त मैंने कहा है। इसके समान और न किसी ने कहा है, न कोई कहेगा। ऐसे शास्त्र के विचार में मन लगाओ तो शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होगे।
हे राम ! आत्मज्ञान वर और शाप की नाईं नहीं है कि कहने भर से सिद्ध हो। इसकी प्राप्ति तब होगी, जब बारम्बार विचार करके दृढ़ अभ्यास करोगे और जब इसकी भावना होगी, तब मुक्ति पाओगे। ऐसा कल्याण पिता, माता और मित्र भी न करेंगे, और तीर्थ आदि सुकृत से भी न होगा, जैसा कल्याण बारम्बार विचारने से मेरा उपदेश करेगा। इससे और सब उपायों को त्यागकर इसी का विचार करो तो सब भ्रान्ति मिट जायगी। और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। हे राम ! अज्ञान एक विसूचिकारोग है और उससे जीव जलते हैं। जो मेरे शास्त्र को विचारेगा, उसका रोग नष्ट हो जायगा। ईश्वर की यह महामाया है कि मिथ्याभ्रम से जीव दुखी होते हैं। जो अपना दुःख दूर करना चाहे, वह मेरा शास्त्र विचारे। जितने सुन्दर पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। उनके लिए यत्न करना परम आपदा है। ये सब पदार्थ आपातरमणीय हैं। ये देखने भर को सुन्दर हैं, पर भीतर से खोखले हैं। इनकी प्राप्ति में मूर्ख आनन्द मानते हैं। हे राम ! ये पदार्थ तब तक सुन्दर लगते हैं, जब तक मृत्यु नहीं आई। जब मृत्यु आवेगा तब सब काम रह जायँगे। इसलिए इनके निमित्त जो यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। जिस काल में मृत्यु आती है, उस समय कष्ट प्राप्त होता है और यदि चन्दन का लेप कीजिए तो भी शान्ति नहीं मिलती। जिसके लिए जीव बड़े यत्न करता है, युद्ध करता है और प्राण त्यागता है, वह धन स्थिर नहीं रहता। एक दिन धन और प्राणी का वियोग ही
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जाता है। और जब वियोग होता है, तब मनुष्य कष्ट पाता है। मैं ऐसा उपाय कहता हूँ, जिसमें यत्न भी थोड़ा हो और सुगमता से आत्म-पद प्राप्त हो। जब शास्त्र के अर्थ में दृढ़ अभ्यास होता है, तब वह अजर, अमरपद प्राप्त होता है। इसमें तुम बोधवान हो और बोध करके अभ्यास का यत्न करो। जो यत्न न करोगे तो अज्ञानरूपी शत्रु दबावेगा। यदि उस शत्रु को मारना हो तो मान और मोह छोड़कर आत्मपद का अभ्यास करो।
हे राम ! जो पुरुष अब तक अज्ञानरूपी शत्रु को मारने और आत्म-पद पाने का यत्न नहीं करते, वे परम कष्ट पावेंगे और संसाररूपी दुःख से कभी मुक्त न होंगे। इस कष्ट से निकलने का यही उपाय है कि महारामायण ब्रह्मविद्या का जो उपदेश है, उसको विचारकर अपने हृदय में धारणा करे। इस उपाय से भ्रान्ति मिट जायगी। यह महारामायण उपदेश सब सिद्धान्तों का सार है। और शास्त्रों से आत्मपद की प्राप्ति चाहे हो या न हो, परन्तु इसके विचार से अवश्य आत्मा की प्राप्ति होगी। जैसे तिल की खली से तेल निकलना कठिन है, तिलों में ही तेल निकलना है; वैसे ही मेरा उपदेश तिल की नाईं है और अन्य उपदेश खली हैं। हे राम ! सम्पूर्ण शास्त्रों के मुख्य सिद्धान्तों का सार सिद्धान्त मैंने तुमसे कहा है। जो आत्मा सदा विद्यमान है, उसको लोग भ्रान्ति में अविद्यमान मानते हैं, इसलिए उमी के विद्यमान करने को सब शास्त्र यत्न करते हैं। पर जो उनके विचार से आत्मपद को विद्यमान नहीं जानता, वह मेरे उपदेश को विचारने से अवश्य आत्मपद को विद्यमान जानेगा, यह निश्चित है। हे राम ! और शास्त्रों के दृढ़ विचार और यत्न से जो सिद्धि होती है, वह इस शास्त्र के विचार से अनायास प्राप्त होगी। शास्त्रकर्त्ता का और लक्षण न विचारना, पर शास्त्र की युक्ति विचार देखना है। जो कुछ सब शास्त्रों का सार सिद्धान्त है, वह मैंने तुमसे सुगममार्ग में कहा है। इसके विचार से इसकी युक्ति देखो। अज्ञानी जो कुछ मुझे कहते और हँसते हैं, सो मैं सब जानता हूँ, परन्तु मेरा दया का स्वभाव है
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इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें। इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ।
हे राम! मैं जो तुमको उपदेश करता हूँ सो किसी अपने मतलब से नहीं करता कि मेरा कुछ अर्थ सिद्ध हो। जो कोई तुमको उपदेश करता है, सो सुनो। तुम्हारा जो कोई बड़ा पुरुष है, वही शुद्ध संवित् होकर मलिनसंवित् को उपदेश करता है। वह संवित् न देवता है, न मनुष्य है, न यक्ष है, न राक्षस है और पिशाच आदि भी नहीं है। केवल जो ज्ञानमात्र है, वही तुम हो, मैं भी वही हूँ और जगत् भी वही है। जब सब वही है तब वासना किसकी करनी है? हे राम! जीव के दुःख का कारण वासना ही है। जो पुरुष इस संसार-बन्धन के दुःख की चिकित्सा न करेगा, वह आत्महंता है और बड़े दुःख में जा पड़ेगा, जहाँ से निकलने की सामर्थ्य न होगा। इससे अब भी तुम मुक्ति का उपाय करो। जब तक सब भावों की वासना नहीं निवृत्त होती, तब तक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता—इसी का नाम बन्धन है। जब वासना क्षय होगी, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी। जितने पदार्थ दिखते हैं, वे सब अविचार-सिद्ध हैं, विचार करने से कुछ नहीं रहते। और जो विचार करने से न रहे, उनकी अभिलाषा करनी व्यर्थ है। जो वस्तु होती हो, उसके पाने का यत्न भी करना ठीक है। जो वस्तु हो ही नहीं, उसके लिए यत्न करना मूर्खता है। ये जगत् के पदार्थ असत् हैं। जैसे खरगोश के सींग असत् हैं और मरुस्थल की नदी असत् होती है, वैसे ही यह जगत् असत् है। सम्यक्दर्शी ज्ञानवान् पुरुष जानता है कि यह जगत् खरगोश के सींगसदृश असत् और भ्रान्तिमात्र है। इसलिए इसके लिए यत्न करना मूर्खता है। जो पदार्थ कारण बिना देख पड़े, उसको भ्रान्तिमात्र जानिये। आत्मा जगत् का कारण नहीं, इससे जगत् मिथ्या है। आत्मपद सब इन्द्रियों और मन से अतीत है और यह जगत् पाञ्चभौतिक है। जगत् मन और इन्द्रियों का विषय है और आत्मपद मन और इन्द्रियों का विषय नहीं है। तो उसे जगत् का कारण कैसे कहिये? जो अशब्दपद है, वह नाना प्रकार शब्द का कारण कैसे
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हो और जो निराकार आत्मपद है सो पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के भूत आकारों का कारण कैसे हो ?
हे राम ! जैसा कारण होता है, उसमें वैसा ही कार्य उपजता है। आत्मा निराकार है और जगत् साकार, इसलिए निराकार साकार का कारण कैसे हो ? जैसे वट का बीज साकार होता है, इसलिए उसका कार्य वट भी साकार होता है और साकार से निराकार कार्य नहीं होता, वैसे ही निराकार से साकार कार्य भी नहीं होता। इससे इस जगत् का कारण आत्मा नहीं। वह न समवाय कारण है, न निमित्त कारण। निमित्त कारण तब होता है, जब कुछ द्वितीय वस्तु होती है। जैसे मृत्तिका से कुम्हार घट बनाता है, पर आत्मा तो अद्वैत है, वह निमित्त कारण कैसे हो ? और समवाय कारण भी तब होता है, जब साकार वस्तु होता है—जैसे मृत्तिका के परिणाम से घट बनता है—पर आत्मा निराकार अपरिणामी है, वह जगत् का कारण कैसे हो ? जो दोनों कारणों से रहित दिखे, उसे भ्रान्तिमात्र जानिये। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के आकार कारण के बिना दिखते हैं, इसलिए वे भ्रान्तिमात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी कारण के बिना भ्रान्तिमात्र भासित होता है। आत्मा में जगत् कभी नहीं हुआ। जैसे प्रकाश में अँधेरा नहीं होता, वैसे ही आत्मा में जगत् नहीं है। यदि तुम कहो कि फिर दिखता क्या है तो उसी का किञ्चन भासित होता है, जो वही रूप है। जैसे चलती है तो भी वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, चलने और ठहरने में कुछ भेद नहीं होता, और जैसे आकाश और शून्यता में भेद कुछ नहीं होता वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं है—वही आत्मसत्ता फुरने से जगद्रूप होकर भासित होती है। जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं। कुछ द्वैत वस्तु नहीं है। जो लोग कहते हैं कि जगत् कर्मों से होता है सो असत्य है; क्योंकि कर्म भी बुद्धि से होते हैं जब आत्मा में बुद्धि ही नहीं तब कर्म कैसे हो ? और जब कर्म ही नहीं तो जगत् कैसे हो ?
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६६१
जैसे खरगोश के सींग के धनुष से बाण चलाना असत्य है, वैसे ही कर्म से जगत् का होना असत्य है । एक कहते हैं कि सूक्ष्म परमाणु से जगत् हो जाता है । पर यह भी असत्य है; क्योंकि जो सूक्ष्म परमाणु परिणाम से जगत्रूप हुए होते तो बुद्धिरूप जगत् न दिखता । पर यह तो बुद्धिरूप क्रिया होती दिखती है । जो परमाणु से जगत् होता तो इन्हीं से बढ़ता जाता; क्योंकि जो परमाणु जड़ हैं, वे ही बढ़ते हैं । पर ऐसा तो नहीं होता । बुद्धिपूर्वक चेष्टा होती दिखती है । इसी से कहा है कि वे असत्य कहते हैं; क्योंकि सूक्ष्म भी किसी से उत्पन्न होना चाहिए और कोई उसके रहने का स्थान भी चाहिए; पर आत्मा में देश, काल और वस्तु तीनों कल्पित हैं । जब आत्मा में ये न हुए तो परमाणु कैसे हों और जगत् कैसे हो ? आत्मा अद्वैत है, इससे जगत् न उपजा है और न नष्ट होना है । जो जगत् उपजा होता तो नष्ट भी होता । जो उपजा ही नहीं तो वह नष्ट कैसे हो ? आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है । इससे हे राम ! मैं, तुम और सब जगत् आकाशरूप है । किसी के साथ आकार नहीं—सब निराकाररूप हैं । जो तुम कहो कि फिर बोलते-चालते क्यों हैं तो जैसे स्वप्न में सब आकाशरूप होते हैं, पर नाना प्रकार की चेष्टा करते और बोलते-चालते हैं, वैसे ही ये भी बोलते-चालते हैं, परन्तु आकाशरूप हैं । तुम्हारा जो स्वरूप है, वह भी सुनो । देश को त्यागकर देशान्तर को जो संवित् जाती है, और उसके मध्य जो ज्ञानसंवित् है वही तुम्हारा स्वरूप है । वह अनामय और सब दुःखों से रहित है । जैसे जब जाग्रत् दशा को त्यागकर जीव स्वप्न में जाता है, तब जाग्रत् त्याग दिया हो, और स्वप्न न आया हो, ऐसे मध्य काल में जो अचेत चिन्मात्र सत्ता है, वही तुम्हारा स्वरूप है । उसमें पण्डितों और ज्ञानवानों का निश्चय है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक उसी में स्थित रहते हैं, उनका कभी उत्थान नहीं होता । जैसे बर्फ से अग्नि कभी नहीं उपजती, वैसे ही उनका स्वरूप से उत्थान कभी नहीं होता । वह आत्मसत्ता न उपजती है, न विनशती है और न और की ओर होती है—सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है ।
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हे राम ! जितना कुछ जगत् तुम देखते हो, सो वास्तव में कुछ उपजा नहीं—भ्रम से भासता है। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के आरम्भ होते दीखते हैं और जागने में उनका अत्यन्त अभाव दिखता है, वैसे ही यह जगत् भी है। आदि में जो अद्वैत तत्त्व में स्वप्न हुआ है, उसमें ब्रह्मा उपजे और उन्होंने आगे जगत् रचा। वह ब्रह्मा भी आकाशरूप है। स्वरूप में भिन्न कुछ नहीं हुआ—सब असतरूप है। जैसे स्वप्न में नदी और पर्वत दीखते हैं, परन्तु उपजे नहीं, अनुभवसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है, वैसे ही ब्रह्मा से लेकर तृण तक जगत् सब असतरूप है। जिसको तुम ब्रह्मा कहते हो, वह वास्तव में उपजे नहीं, तब उनसे जगत् की उत्पत्ति में तुमसे कैसे कहूँ। जैसे मरुस्थल की नदी ही उपजी नहीं तो उसमें मछलियाँ कैसे कहिये, वैसे ही आदि में ब्रह्मा नहीं उपजे तो उनमें जगत् कैसे उपजा कहिये ? केवल आत्मचैतन्य-सत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। यह जगत् भी वही है, परन्तु अज्ञान में विपर्ययरूप प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न में पुरुष अनुभवरूप होता है और अपने प्रमाद में नाना प्रकार के पदार्थ और पर्वत, जल, पृथ्वी, जन्म, मरणादिक विकार देखता है, परन्तु हुआ कुछ नहीं, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है और अज्ञान से सब भासते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं। सब चिदाकाशरूप है। अज्ञान में आत्मसत्ता ही जगतरूप भासित होती है। इसमें हे राम ! जिसके अज्ञान में यह जगत् भासता है और जिसके ज्ञान में निवृत्त हो जाता है, ऐसे आत्मतत्त्व को पाने का यत्न करो। वह नित्य, शुद्ध, परमानन्दस्वरूप और सदा अपने स्वभाव में स्थित है। वही तुम्हारा अनुभवरूप है, जो सदा अनुभव से प्रकाशित होता है। उसमें स्थित होने में क्या कायरता करनी है ? हे राम ! सब प्रपञ्च भ्रान्तिमात्र है। जैसे रम्मी में सर्प भ्रान्तिमात्र है, वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रममात्र है। इसमें उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वपदार्थाभाववर्णनं नाम त्रयो- दशाधिकद्विशततमस्मर्गः ॥ २१३ ॥
- निर्वाण प्रकरण * ६६३
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार यह जगत् आभास फुरा है और भासित होता है, यह भी सुनो। आदि जो शुद्ध अचेत चिन्मात्र है, उसमें जब चेतनता फुरती है, तब वह वेदन होती है। उसमें शब्द-तन्मात्रा होती है। फिर उसमें आकाश उत्पन्न होता है। फिर स्पर्श की इच्छा होती है, तब वायु उपजती है। जब आकाश में क्षोभ होता है, तब उस वायु और आकाश के संघर्षण से अग्नि उपजती है। जब अग्नि में उष्णस्वभाव होता है, तब जल उत्पन्न होता है, अर्थात् जब तेज की अधिकता होती है, तब जल उत्पन्न होता है। जब स्वेद-सा जल बहुत इकट्ठा होता है, तब उसने पृथ्वी उत्पन्न होती है। इस प्रकार आकाश और वायु में जल और पृथ्वी उत्पन्न होते हैं। तब तत्त्वों से शरीर उपजते हैं और स्थावर-जङ्गम नाना प्रकार का जगत् दिखता है। वह सब पाञ्चभौतिक है। वास्तव में न पञ्चभूत हैं न कोई उपजता है और न नष्ट होता है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में आरम्भ-परिणाम-सहित नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं, आत्मसत्ता ही जगत् के आरम्भ-परिणाम-सहित भासती है, परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं, आत्म-सत्ता ही चित्त के फुरने में जगद्रूप भासती है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी जानो। हे राम ! यह सब जगत् अपना अनुभवरूप है, पर भ्रम से आकारसहित दिखता है। जब भली-भाँति विचार करके देखिये तब जगद्भ्रम मिट जाता है, केवल चैतन्य आत्मतत्त्वमात्र शेष रहता है। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में नाना प्रकार के क्षोभ होते हैं, और जब जागता है तब एक आप ही रहता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जागने से अद्वैत-ही-अद्वैत भान होता है।
हे राम ! जो बोधसमय में द्वैत कुछ न भासित हो तो अबोध के समय भी जानिये कि द्वैत कुछ नहीं हुआ, और जो बोध के समय सत्य भासित हो तो जानिये कि सर्वदा यही सत्ता है। हे राम ! यह निश्चय करो कि जगत् कुछ वस्तु नहीं—जैसे आकाश में नीलता, किरणों में जल और रश्मी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत्
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दिखता है और विचार करने से कुछ नहीं पाया जाता। हे राम! अपन कल्पना ही जीव को जगतरूप भासित होती है, और कुछ नहीं। जे स्वप्न की सृष्टि अपनी कल्पना है, परन्तु निद्रादोष से अपने में भि दिखती है और उसमें राग-द्वेष उपजता है, पर जागने पर सब क्षो मिट जाते हैं, वैसे ही अज्ञान से जगत् सत्य लगता है और उसमें राग द्वेष भासित होते हैं और ज्ञान से शान्त हो जाते हैं। हे राम! य जगत् भ्रममात्र है। ज्ञानवान् के निश्चय में सब चिदाकाश है औ अज्ञानी के निश्चय में जगत् है। यदि बड़े क्षोभ प्राप्त हों तो भी ज्ञानवान् को डिगा नहीं सकते, क्योंकि उसके निश्चय में कुछ द्वै नहीं फुरता, वह सदा एकरस रहता है। यदि प्रलयकाल के मेघ गर्जे समुद्र उमड़ें और पहाड़ के ऊपर पहाड़ पड़ें, जिसमे भयानक शब् हों तो भी ज्ञानवान् के निश्चय में कुछ द्वैत नहीं फुरता। जैसे कोई पुरु सोया पड़ा हो तो उसके स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं और जगत् के निकट बैठे भी नहीं भासित होते, वैसे ही ज्ञानवान् के निश्चय में द्वै कुछ नहीं भासता; क्योंकि है नहीं। और अज्ञानी को होते भासते हैं जैसे बन्ध्या स्त्री स्वप्न में अपने पुत्र को देखती है, सो अनहोता भी वह भ्रम से उसको भासता है, वैसे ही अज्ञानी को अनहोता जगत् सत्य लगता है।
हे राम! भ्रम से अनहोता जगत् दिखता है और होने का अभाव प्रतीत होता है। जैसे बन्ध्या अनहोते पुत्र को देखती है और पुत्रवाला स्वप्न में पुत्र का अभाव देखता है, वैसे ही अज्ञान से अनहोता जगत् सत् भासित होता है और सदा अनुभवरूप आत्मा का अभाव प्रतीति होता है। सो भ्रम में ही और का और भासता है। दिन में सोया हुआ पुरुष स्वप्न में रात्रि देखता है और रात्रि को सोया हुआ स्वप्न में दिन देखता है, शून्यस्थान में नाना प्रकार के व्यवहार और अन्धकार में प्रकाश देखता है, सो भ्रम में ही देखता है। पृथ्वी पर सोया मनुष्य स्वप्न में आकाश पर दौड़ता फिरता है और अपने को गड्ढे में गिरता देखता है। यह सब भ्रम से ही दिखता है। वैसे ही यह जाग्रत जीव भ्रम से ही जाग्रत को
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६६५
विपर्ययरूप देखता है। जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं। जैसे स्वप्न में मुर्दे भी बोलते-चालते दिखते हैं, जैसे स्वप्न में तुमको नाना प्रकार का जगत् दिखता है और जागकर कहते हो कि सब भ्रममात्र था, वैसे ही मुझको यह जाग्रत् जगत् भ्रममात्र जान पड़ता है। जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं । जैसे दो मनुष्य एक ही से होते हैं, और दो सूर्य हों तो उनमें कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद न जानना । राम ने पूछा, हे भगवन् ! स्वप्न की प्रतिभा अल्पमात्र भासती है और मनुष्य शीघ्र ही जागकर कहता है कि वह भ्रममात्र थी और जाग्रत् में वह दृढ़ होकर भासती है । पर तुम दोनों को समान कैसे कहते हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रतिभा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वह जाग्रत् कहाती है और जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता और चित्त में स्मृति होती है, वह स्वप्न है। वह जाग्रत् और स्वप्न दो प्रकार का है-जिसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वह जाग्रत् है और उसमें जब सो गया तब स्वप्न हुआ । उस स्वप्न में जगत् दिखा तो जहाँ जगत् दिखा वही उसका जाग्रत् हो गया और जहाँ से सोया था, वह स्वप्न हो गया। वहाँ जो स्वप्न भासित हुआ, उसको जाग्रत् जानो । मनुष्य लोगों से चेष्टा करने लगा। जब वहाँ से मृतक हो गया, फिर इस अवस्था में आया तो पिछली को स्वप्न जानने लगा । तो चित्त के भ्रम से स्वप्न को जाग्रत् देखा और जाग्रत् को स्वप्न देखा । हे राम ! यह क्या हुआ ? जैसे किसी को स्वप्न आया और उसमें अपनी चेष्टा और व्यवहार करने लगा, तब फिर उसमें स्वप्न हुआ, उस स्वप्नान्तर से जागा तो फिर उस पहले स्वप्न में आया तो उसको स्वप्न जानने लगा और उस स्वप्न को जाग्रत् जानने लगा । हे राम ! जैसे वह स्वप्नान्तर से जागकर उसको स्वप्न कहता है और स्वप्न को जाग्रत् कहता है, वैसे ही यहाँ जाग्रत् स्वप्नरूप है और आगे जो होता है, वह स्वप्नान्तर है । एक और प्रकार है। जो इस जाग्रत् में मृतक हुआ, शरीर छूट गया, तब परलोक देखता है तो वह परलोक जाग्रत् हो गया और इस जाग्रत् को जीव स्वप्न जानने लगा। जैसे स्वप्न
६६६ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
से जागा स्वप्न को भ्रम कहता है, वैसे ही इस जाग्रत् को परलोक में भ्रम मानता है। फिर परलोक में स्वप्न आया, तब परलोक की जाग्रत् अवस्था स्वप्नवत् हो गई। और जो स्वप्न में सृष्टि देखी उसको जाग्रत् जानता है। फिर वहाँ से मृतक होकर यहाँ आया, तब यह जाग्रत् हो गई और परलोक स्वप्न हो गया। इससे हे राम ! स्वप्न और जाग्रत् दोनों मिथ्या हैं। जब मूर्ख स्वप्न से जागते हैं, तब वे जानते हैं कि इसका नाम जागना है और इसको जाग्रत् मानते हैं और उसको स्वप्न जानते हैं। पर वास्तव में वह स्वप्नान्तर है और यह स्वप्न। इसमें जो तीव्रसंवेग हो रहा है, इससे इसको जाग्रत् और उसको स्वप्न जानते हैं, पर दोनों तुल्य हैं, कुछ भेद नहीं।
आत्मा में दोनों असतरूप हैं और इनकी प्रतिभा भ्रममात्र भासती है। आत्मा न कभी उपजता है, न मरता है। और उपजता भी है और मरता भी है। उपजता इस कारण से नहीं कि पूर्व-सिद्ध है और मरता इस कारण नहीं कि भविष्यतकाल में भी सिद्ध है। परलोक में सुख-दुःख भोगता है और भ्रमकाल में जन्मता भी है और मरता भी है। सो प्रत्यक्ष भासित होता है, पर वास्तव में ज्यों का त्यों है। हे राम ! यह जगत् उसका आभास है और चेत्य का चमत्कार चैतन्य होकर भासित होता है। जैसे घट मृत्तिकारूप है-मृत्तिका से भिन्न नहीं, वैसे ही चेतन भी चैतन्यरूप है। चैतन्य से भिन्न जगत् नहीं-स्थावर-जङ्गम सब जगत् चिन्मात्र है। हे राम ! जैसे तुमको स्वप्न आता है और उसमें पत्थर और पहाड़ दिखते हैं सो तुम्हारा ही अनुभवरूप है, भिन्न तो नहीं, वैसे ही यह सब दृश्य चिन्मात्र का रूप है। जैसे घट मृत्तिका से भिन्न नहीं वैसे ही यह जगत् चिदाकाश से भिन्न नहीं है। जैसे काष्ठ के पात्र काष्ठ से भिन्न नहीं सब काष्ठ ही हैं, वैसे ही जगत् चैतन्यरूप है-चैतन्य से भिन्न नहीं। जैसे पाषाण की मूर्ति पाषाण है, वैसे ही जगत् भी चैतन्यरूप है। जैसे समुद्र ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही चैतन्य जगत्रूप होकर दिखता है। जैसे अग्नि उष्णरूप है, वैसे ही चैत्य चैतन्यरूप है। जैसे वायु स्पन्दरूप है, वैसे ही चैतन्य चेत्यरूप है। जैसे वायु निष्पन्दरूप