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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1470, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1470

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६६५

विपर्ययरूप देखता है। जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं। जैसे स्वप्न में मुर्दे भी बोलते-चालते दिखते हैं, जैसे स्वप्न में तुमको नाना प्रकार का जगत् दिखता है और जागकर कहते हो कि सब भ्रममात्र था, वैसे ही मुझको यह जाग्रत् जगत् भ्रममात्र जान पड़ता है। जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं । जैसे दो मनुष्य एक ही से होते हैं, और दो सूर्य हों तो उनमें कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद न जानना । राम ने पूछा, हे भगवन् ! स्वप्न की प्रतिभा अल्पमात्र भासती है और मनुष्य शीघ्र ही जागकर कहता है कि वह भ्रममात्र थी और जाग्रत् में वह दृढ़ होकर भासती है । पर तुम दोनों को समान कैसे कहते हो ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रतिभा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वह जाग्रत् कहाती है और जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता और चित्त में स्मृति होती है, वह स्वप्न है। वह जाग्रत् और स्वप्न दो प्रकार का है-जिसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वह जाग्रत् है और उसमें जब सो गया तब स्वप्न हुआ । उस स्वप्न में जगत् दिखा तो जहाँ जगत् दिखा वही उसका जाग्रत् हो गया और जहाँ से सोया था, वह स्वप्न हो गया। वहाँ जो स्वप्न भासित हुआ, उसको जाग्रत् जानो । मनुष्य लोगों से चेष्टा करने लगा। जब वहाँ से मृतक हो गया, फिर इस अवस्था में आया तो पिछली को स्वप्न जानने लगा । तो चित्त के भ्रम से स्वप्न को जाग्रत् देखा और जाग्रत् को स्वप्न देखा । हे राम ! यह क्या हुआ ? जैसे किसी को स्वप्न आया और उसमें अपनी चेष्टा और व्यवहार करने लगा, तब फिर उसमें स्वप्न हुआ, उस स्वप्नान्तर से जागा तो फिर उस पहले स्वप्न में आया तो उसको स्वप्न जानने लगा और उस स्वप्न को जाग्रत् जानने लगा । हे राम ! जैसे वह स्वप्नान्तर से जागकर उसको स्वप्न कहता है और स्वप्न को जाग्रत् कहता है, वैसे ही यहाँ जाग्रत् स्वप्नरूप है और आगे जो होता है, वह स्वप्नान्तर है । एक और प्रकार है। जो इस जाग्रत् में मृतक हुआ, शरीर छूट गया, तब परलोक देखता है तो वह परलोक जाग्रत् हो गया और इस जाग्रत् को जीव स्वप्न जानने लगा। जैसे स्वप्न