सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1471, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1471

६६६ ✴ योगवाशिष्ठ ✴

से जागा स्वप्न को भ्रम कहता है, वैसे ही इस जाग्रत् को परलोक में भ्रम मानता है। फिर परलोक में स्वप्न आया, तब परलोक की जाग्रत् अवस्था स्वप्नवत् हो गई। और जो स्वप्न में सृष्टि देखी उसको जाग्रत् जानता है। फिर वहाँ से मृतक होकर यहाँ आया, तब यह जाग्रत् हो गई और परलोक स्वप्न हो गया। इससे हे राम ! स्वप्न और जाग्रत् दोनों मिथ्या हैं। जब मूर्ख स्वप्न से जागते हैं, तब वे जानते हैं कि इसका नाम जागना है और इसको जाग्रत् मानते हैं और उसको स्वप्न जानते हैं। पर वास्तव में वह स्वप्नान्तर है और यह स्वप्न। इसमें जो तीव्रसंवेग हो रहा है, इससे इसको जाग्रत् और उसको स्वप्न जानते हैं, पर दोनों तुल्य हैं, कुछ भेद नहीं।

आत्मा में दोनों असतरूप हैं और इनकी प्रतिभा भ्रममात्र भासती है। आत्मा न कभी उपजता है, न मरता है। और उपजता भी है और मरता भी है। उपजता इस कारण से नहीं कि पूर्व-सिद्ध है और मरता इस कारण नहीं कि भविष्यतकाल में भी सिद्ध है। परलोक में सुख-दुःख भोगता है और भ्रमकाल में जन्मता भी है और मरता भी है। सो प्रत्यक्ष भासित होता है, पर वास्तव में ज्यों का त्यों है। हे राम ! यह जगत् उसका आभास है और चेत्य का चमत्कार चैतन्य होकर भासित होता है। जैसे घट मृत्तिकारूप है-मृत्तिका से भिन्न नहीं, वैसे ही चेतन भी चैतन्यरूप है। चैतन्य से भिन्न जगत् नहीं-स्थावर-जङ्गम सब जगत् चिन्मात्र है। हे राम ! जैसे तुमको स्वप्न आता है और उसमें पत्थर और पहाड़ दिखते हैं सो तुम्हारा ही अनुभवरूप है, भिन्न तो नहीं, वैसे ही यह सब दृश्य चिन्मात्र का रूप है। जैसे घट मृत्तिका से भिन्न नहीं वैसे ही यह जगत् चिदाकाश से भिन्न नहीं है। जैसे काष्ठ के पात्र काष्ठ से भिन्न नहीं सब काष्ठ ही हैं, वैसे ही जगत् चैतन्यरूप है-चैतन्य से भिन्न नहीं। जैसे पाषाण की मूर्ति पाषाण है, वैसे ही जगत् भी चैतन्यरूप है। जैसे समुद्र ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही चैतन्य जगत्रूप होकर दिखता है। जैसे अग्नि उष्णरूप है, वैसे ही चैत्य चैतन्यरूप है। जैसे वायु स्पन्दरूप है, वैसे ही चैतन्य चेत्यरूप है। जैसे वायु निष्पन्दरूप