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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1472, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1472
  • निर्वाण प्रकरण * ६६७

है, वैसे चैतन्य चेत्यरूप है। जैसे पृथ्वी घन होती है और आकाश शून्य होता है—जहाँ घना या ठोस है वहाँ पृथ्वी है और जहाँ शून्यता है, वहाँ आकाश है—वैसे ही जहाँ चेत्य है वहाँ चैतन्य है। जैसे स्वप्न में शुद्ध संवित् पहाड़ और नदियों के रूप में भासती है, वैसे ही चिन्मात्र-सत्ता जगतरूप होकर भासती है। हे राम! जो कुछ पदार्थ तुमको दीखते हैं; उनको त्यागकर आत्मा की ओर देखो। यह सब विश्व आत्मरूप है। वह शुद्ध चिदाकाशरूप दुःखातीत और आकाश से भी निर्मल है, ऐसा जानकर उसमें स्थित होओ। हे राम! जब तुमको स्वभावसत्ता का अनुभव साक्षात्कार होगा, तब सब द्वैतकलना जो भासती है सो शान्त हो जायगी और केवल आत्मतत्त्वमात्र शेष रहेगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नैकताप्रतिपादनं नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमस्सर्गः ॥ २१४ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन्! चिदाकाश कैसा है, जिसे तुम परब्रह्म कहते हो और उसका रूप क्या है? तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को पान करता मैं तृप्त नहीं होता, इससे कृपा करके कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे एक माता के गर्भ से दो पुत्र जुड़वा पुत्र उत्पन्न होते हैं और उनका एक सा आकार होता है, पर जगत् के व्यवहार के लिए उनका नाम भिन्न-भिन्न होता है और भेद कुछ नहीं, और जैसे दो पात्रों में जल रखिये तो जल एक ही है पर पात्रों के नाम भिन्न-भिन्न होते हैं, वैसे ही स्वप्न और जाग्रत् दो नाम हैं, परन्तु है एक ही से, किन्तु आत्मा में दोनों ही कल्पित हैं। जिसमें दोनों कल्पित हैं, वह चिदाकाश है। वृत्ति जो फुरती है और देशदेशान्तर को जाती है, उसके मध्य में जो ज्ञानरूप संवित् है, जिसके आश्रय से वृत्ति फुरती है, वह चिदाकाश संवित् है। वृक्ष जो रस को खींचकर ऊपर को जाते हैं सो उसी के आश्रय से जाते हैं। ऐसी जो सत्ता है, वह चिदाकाशरूप है। हे राम! जैसे सब वृक्ष फूल, फल, टाम आदि सहित रस के आश्रय से उगते-बढ़ते हैं, वैसे ही यह सब जगत् चिदाकाश के आश्रय से फुरता है और उसी के आश्रय से वृत्ति फुरती है—वही सत्ता चिदाकाश है।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1472, कुल 1734 में से · BharatKosha