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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1473, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1473

६६८ 卐 योगवाशिष्ठ 卐

जिसकी इच्छा सब निवृत्त हो गई है और रागद्वेषरूपी मल से हीन जो शरदकाल के आकाशसम निर्मल हो गया है, उसकी शुद्ध संवित् है। उसको चिदाकाश जानो।

हे राम ! जगत् का जब अन्त हुआ, पर जड़ता नहीं आई, उस मध्य काल में जो अद्वैत सत्ता है, वह चिदाकाश है, बेल, फूल, फल, गुच्छे और वृक्ष जिसके आश्रय से बढ़ते हैं, वह चिदाकाश है। रूप, अवलोक, मनस्कार, इन तीनों का जहाँ अभाव है, ऐसी शुद्धसंवित् ही चिदाकाश है। पृथ्वी, पर्वत और नदी आदि सबका जो आश्रय है, वह चिदाकाश है। द्रष्टा, दृश्य, दर्शन, ये तीनों जिससे उपजे हैं और फिर जिसमें लीन होते हैं, वह अधिष्ठान सत्ता ही चिदाकाश है। जिससे सब उपजते हैं, जो यह सब है और जिसमें सब है ऐसा सर्वात्मा चिदाकाश है। अर्द्धरात्रि को उठने पर इन्द्रियों की चपलता का विषय में अभाव होता है। उस काल में जो शान्तसत्ता होती है, वह चिदाकाश है।

हे राम ! जिस संवित् में स्वप्न की सृष्टि जगती है और फिर जाग्रत् भासती है और दोनों के करनेवाले में मोहता है, वह चिदाकाश है। जैसा फुरना होता है, वैसा ही जगत् में भासित होता है। वही द्रष्टा, दर्शन, दृश्य होकर भासता है, दूसरा कुछ नहीं। आत्मरूपी सूत्र में असत्य-सत्य जगतरूपी मणि पिरोये हुए हैं। जिसके आश्रय में इनका फुरना होता है, वह चिदाकाश है। हे राम ! जिसके आश्रय में एक निमेष में जगत् उपजता है और उन्मेष में लीन हो जाता है, ऐसी जो अधिष्ठान सत्ता है, उसको चिदाकाश जानो। यह सब जगत् मिथ्या है और भ्रान्ति से भासता है, जैसे मरुस्थल की नदी भासती है। इससे जो रहित है और जिसमें संकल्प-विकल्प का क्षोभ नहीं और सदा अपने आपमें स्थित और दुःख से रहित निर्विकल्प सत्ता है वही चिदाकाश है। हे राम ! नेति-नेति के पीछे जो अनास्पद शेष रहता है उसको तुम चिदाकाश जानो। शुद्ध चैतन्य आत्मसत्ता सबका अपना और अनुभवरूप होकर प्रकाशित है। उसमें जैसे फुरना होता है कि ये ऐसे हैं वैसा ही भासित होता है। वह चिदाकाशरूप है। इसमें शुद्ध आत्मसत्ता ही