योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६६८ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
जिसकी इच्छा सब निवृत्त हो गई है और रागद्वेषरूपी मल से हीन जो शरदकाल के आकाशसम निर्मल हो गया है, उसकी शुद्ध संवित् है। उसको चिदाकाश जानो।
हे राम ! जगत् का जब अन्त हुआ, पर जड़ता नहीं आई, उस मध्य काल में जो अद्वैत सत्ता है, वह चिदाकाश है, बेल, फूल, फल, गुच्छे और वृक्ष जिसके आश्रय से बढ़ते हैं, वह चिदाकाश है। रूप, अवलोक, मनस्कार, इन तीनों का जहाँ अभाव है, ऐसी शुद्धसंवित् ही चिदाकाश है। पृथ्वी, पर्वत और नदी आदि सबका जो आश्रय है, वह चिदाकाश है। द्रष्टा, दृश्य, दर्शन, ये तीनों जिससे उपजे हैं और फिर जिसमें लीन होते हैं, वह अधिष्ठान सत्ता ही चिदाकाश है। जिससे सब उपजते हैं, जो यह सब है और जिसमें सब है ऐसा सर्वात्मा चिदाकाश है। अर्द्धरात्रि को उठने पर इन्द्रियों की चपलता का विषय में अभाव होता है। उस काल में जो शान्तसत्ता होती है, वह चिदाकाश है।
हे राम ! जिस संवित् में स्वप्न की सृष्टि जगती है और फिर जाग्रत् भासती है और दोनों के करनेवाले में मोहता है, वह चिदाकाश है। जैसा फुरना होता है, वैसा ही जगत् में भासित होता है। वही द्रष्टा, दर्शन, दृश्य होकर भासता है, दूसरा कुछ नहीं। आत्मरूपी सूत्र में असत्य-सत्य जगतरूपी मणि पिरोये हुए हैं। जिसके आश्रय में इनका फुरना होता है, वह चिदाकाश है। हे राम ! जिसके आश्रय में एक निमेष में जगत् उपजता है और उन्मेष में लीन हो जाता है, ऐसी जो अधिष्ठान सत्ता है, उसको चिदाकाश जानो। यह सब जगत् मिथ्या है और भ्रान्ति से भासता है, जैसे मरुस्थल की नदी भासती है। इससे जो रहित है और जिसमें संकल्प-विकल्प का क्षोभ नहीं और सदा अपने आपमें स्थित और दुःख से रहित निर्विकल्प सत्ता है वही चिदाकाश है। हे राम ! नेति-नेति के पीछे जो अनास्पद शेष रहता है उसको तुम चिदाकाश जानो। शुद्ध चैतन्य आत्मसत्ता सबका अपना और अनुभवरूप होकर प्रकाशित है। उसमें जैसे फुरना होता है कि ये ऐसे हैं वैसा ही भासित होता है। वह चिदाकाशरूप है। इसमें शुद्ध आत्मसत्ता ही
❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ६६६
फुरने से जगतरूप होकर प्रकट होती है । जैसे जाग्रत् के अन्त में अद्वैत सत्ता होती है और फिर उससे स्वप्न की सृष्टि भासित होती है, पर स्वप्न की सृष्टि वास्तव में नहीं उपजी, वही अनुभव स्वप्न की सृष्टि होकर भासित होता है, वैसे ही यह जगत् जो कार्यरूप दिखता है, सो अविद्या से दिखता है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं । जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण दिखती है, वैसे ही यह सृष्टि अकारण है । ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सब स्थावर-जङ्गम जगत् चिदाकाश रूप है । कुछ उत्पन्न नहीं हुआ और जो दूसरा कुछ न हुआ तो कारण-कार्य भी कुछ न हुआ ।
हे राम ! न कोई द्रष्टा है, न कोई दृश्य है न भोक्ता है और न भोग है, सब कल्पनामात्र है । आत्मा के अज्ञान से कल्पनाएँ उठती हैं और आत्मज्ञान से लीन हो जाती हैं—जैसे समुद्र के जाने से तरङ्ग कल्पना मिट जाती है; क्योंकि अनुभव आत्मा में कारण-कार्य कुछ नहीं हुआ । जो तुम कहो कि कारण-कार्य क्यों भासित होते हैं, तो जैसे इन्द्रजाल की बाजी में नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं बने, वैसे ही यह जगत् कारण-कार्य कुछ बना नहीं । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही नगररूप होकर दिखता है, वैसे ही यह जगत् दिखता है । हे राम ! आत्मसत्ता ही फुरने से जगत् की नाईं भासती है । जिस जगत् को इदम् रूप कहते हैं, वह अहंरूप है । जिसको समुद्र कहते हैं, वह भी अहंकाररूप है । जिसको रुद्र कहते हैं, वह अपना ही अनुभवरूप है इत्यादि । जो सब जगत् भासित होता है वह भावनामात्र है । जिसकी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसा ही रूप होकर भासता है । जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु में जैसी भावना होती है, वैसे ही सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है, वैसी ही होकर भासित होती है । इससे जब चिदाकाश का निश्चय दृढ़ होता है, तब अज्ञान से जो विरुद्ध भावना हुई थी, वह निवृत्त होती है ।
इति श्रीयो० जगन्निर्वाणवर्णनंनामपञ्चदशाधिकद्विशततमस्सर्गः॥२१५॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मन थोड़ा भी फुरता है, तब यह जगत् उत्पन्न हो आता है और जब फुरने से रहित होता है, तब जगत्-
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भावना मिट जाती है। इस प्रकार जो जानता है, वह ज्ञानवान् है। वह पुरुष इन्द्रियों से देखता, सुनता, ग्रहण करता भी निर्वासनिक ही जाता है और जगत की ओर से घनसुषुप्त होता है। हे राम! जिसका मन निर्वासनिक और शान्त हुआ है, वह बोलता, चलना, खाता, पीता भी पाषाण-सदृश मौन हो जाता है—उसमें यह जगत कुछ उत्पन्न नहीं। जैसे मृगतृष्णा की नदी अनहोनी भासती है और भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासित होता है, वैसे ही मन के भ्रम में आत्मा में जगत भासित होता है। आदिकारण से कुछ नहीं उत्पन्न हुआ। जिसका आदिकारण न पाइये, वह कारण भी असत्य जानिये। इससे सब जगत कारण के बिना ही भासता है, उपजा कुछ नहीं। हे राम! जो पदार्थ कारण के बिना भासता है और जिसमें भासता है वह अधिष्ठानसत्ता है, क्योंकि जो अधिष्ठान में भासित होता है उसको भी वही रूप जानिये और जो अधिष्ठान से व्यतिरेक भासित हो, उसे भ्रममात्र जानिये। जैसे स्वप्न में इन्द्रियादिक पदार्थ भासित होते हैं और उसमें दृश्य दर्शन सब मिथ्या है, हुआ कुछ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत भी मिथ्या है। न कुछ उपजा है, न स्थित हुआ है। न आगे होना है और न नाश होता है। जब उपजा ही नहीं, तब नाश कैसे हो? न कोई द्रष्टा है, न दर्शन है, न दृश्य है; केवल चिन्मात्र-सत्ता अपने आपमें स्थित है।
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह द्रष्टा, दर्शन और दृश्य क्या है और कैसे भासित होता है? यह आपने पहले भी कहा है और अब फिर भी कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह दृश्य सब अदृशरूप है; अकारण ही दृश्य होकर भासित होता है। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, जो कुछ जगत विस्तारसहित दीखता है वह आदिस्वरूप है। जैसे स्वप्न में आकाश का वन दिखे और पदार्थ दिखे भी वे सब चिदाकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत भी चिन्मात्ररूप है—कारण-कार्यभाव कहीं नहीं। जैसे वायु स्पन्दरूप होती है, तब प्रतीत होती है और निष्पन्द होने पर नहीं प्रतीत होती, वैसे ही आत्मा में जब चित्त फुरता है, तब
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आत्मसत्ता जगतरूप होकर भासती है । सो वही आत्मसत्ता भाव में अभावरूप है । जैसे आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् आत्मारूप है । इससे जो कुछ भासित होता है, वह चैतन्य का आभास प्रकाश है और परमार्थसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । इससे इतर कहिये तों न द्रष्टा है और न दृश्य है, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है । राम ने पूछा, हे ब्राह्मण, ब्रह्म के ज्ञाता ! जो इसी प्रकार है तो कारण-कार्य का भेद कैसे होता दीखता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उसमें जैसा-जैसा फुरना होता है, वैसा ही वैसा रूप होकर भासित होता है । चैतन्य आकाश ही जगतरूप होकर भामता है, और न कहीं कारण है, न कार्य । जैसे स्वप्नसृष्टि जो कारण-कार्यसहित भासित होती है, वह किसी कारण से नहीं उपजी—अकारणरूप है, वैसे ही यह सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजी, अकारणरूप है । न कहीं कर्त्ता है और न भोक्ता । केवल भ्रम से कर्त्ता-भोक्ता भासित होता है और स्वप्न की नाईं विकल्प उठते हैं—वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है ।
हे राम ! जैसे स्वप्न में नगर और जगत् दिखता है, वह चिदाकाश अनुभवसत्ता ही ऐसे होकर भासित होती है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् सम्पूर्ण चिदाकाश है । जब ऐसे जानोगे, तब जगत् भी ब्रह्मतत्त्व दिखेगा । हे राम ! यह जगत् चित्त के फुरने से उपजा है । जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, वैसे ही चित्तभ्रम से जगत् की कल्पना होती है, पर इसका कारण ब्रह्म ही है । और कारण कहीं नहीं, क्योंकि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है, अतःकारण किसका हो ? वही सत्ता इन्द्र, रुद्र, नदियाँ पर्वत आदि जगत् होकर भासती है । उसमें भिन्न द्वैतरूप कुछ नहीं । इसमें जैसा-जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही रूप दिखता है । जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है, वैसा ही रूप भासित होता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है, वैसा ही पदार्थरूप होता है ।
इति नि० कारणकार्याभाववर्णनं नाम षोडशाधिकद्विशततमस्सगंः ॥२१६॥
६७२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अचिन्त्य चिन्मात्र आकाशरूप आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है । शुद्ध चिन्मात्र में जब अहं का स्फुरण होता है तब जगत् होकर भासता है । वही अहंश्रूप जीव जगत् में जीता दिखता है, परन्तु मृतक की नाईं स्थित है । और तुम, मैं आदि सब जगत् जीता, बोलता, चलता और व्यवहार करता भी दिखता है, परन्तु काष्ठवत् मौन स्थित है । आत्मरूपी रत्न की चमक जगत् है और वह प्रकाश आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे आकाश में तरुवर, मरुस्थल में जल और धुएँ के पर्वत मेघ भासते हैं सो भ्रान्तिमात्र है, वैसे ही यह जगतलक्षण भी भासता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, अवस्तु है-उपजा कुछ नहीं ।
हे राम ! चित्तरूपी बालक ने जगत्जालरूपी सेना रची है, सो असत्य है । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि पंचभूत भ्रान्तिमात्र हैं और उनमें सत्य प्रतीति करना मूर्खता है । बालक की कल्पना में सत्य प्रतीति बालक ही करते हैं और जो इस जगत् का आश्रय करके सुख की इच्छा करते हैं, वे मानो आकाश के धोने का यत्न करते हैं । उनका सब यत्न व्यर्थ है । यह सब जगत् भ्रान्तिरूप है; इसमें आस्था करके जो इसके पदार्थ पाने का यत्न करते हैं, वे जैसे बन्ध्या स्त्री पुत्र पाने का यत्न करे वैसे ही व्यर्थ है । जगत् में जो सुख के पाने का यत्न करते हैं, वह व्यर्थ यत्न है । हे राम ! ये पृथ्वी आदि जो सम्पूर्ण भूत पदार्थ दीखते हैं सो भ्रान्तिमात्र हैं । जब भ्रान्तिमात्र हैं तब इनकी उत्पत्ति किसमें और कैसे कहिये ? जो मूर्ख बालक हैं, उनको पृथ्वी आदि जगत् के पदार्थ सत्य लगते हैं । ज्ञानवान् को ये सत्य नहीं दीखते और अज्ञानी को सत्य लगते हैं । पर उनसे हमको क्या प्रयोजन है । जैसे सोये को स्वप्न में आत्म-अनुभवसत्ता ही पृथ्वी, पहाड़ और नदियाँ जगत् हो भासती है, पर वे सब आकार दिखने पर भी निराकाररूप हैं । वैसे ही यह जगत् आकाशसहित दिखता है, परन्तु आकार कुछ बना नहीं, निराकारसत्ता ही जगतरूप भासित होती है । यह जगत् निराकार ही है, पर और कुछ नहीं, आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है ।
इति श्री नि० भावप्रतिपादननामसप्तदशाधिकद्विशततमस्सर्गः ॥ २१७ ॥
- निर्वाण प्रकरण * ६७३
राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि जगत् अविद्यमान है, पर अज्ञान से स्वप्न की नाईं सत्य लगता है, इसमें विद्यमान भी है; और जैसे स्वप्न का नगर शून्य है, वैसे यह जगत् अज्ञानरूप है। वह अज्ञान क्या है और अविद्या कितने काल की है, किसको होती है और इसका प्रमाण क्या है ? कृपा कर कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको जगत् दिखता है, वह सब अविद्या है। वह अविद्या अनन्त है। देश और काल से इसका अन्त कभी नहीं होता। जिसको अपने वास्तव स्वरूप का अज्ञान है, उसको यह सत् दिखाई देती है। इस पर इतिहास है, सो सुनिये। हे राम ! आत्मरूप चिदाकाश के अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। उनमें से एक ब्रह्माण्ड इसी के समान है। उस ब्रह्माण्ड के जगत् में तुग्मत नाम का एक देश है, जिसका राजा विपश्चित् था। वह एक समय अपनी सभा में बैठा था। उसके चारों ओर उसकी बड़ी तेजस्वी सेना उपस्थित थी। वह अग्नि देवता के सिवा और किसी देवता को न पूजता था। राजा बड़ी लक्ष्मी से शोभित और बहुत गुणों और ऐश्वर्य से सम्पन्न था। एक समय वह सभा में बैठा था कि पूर्व दिशा की ओर से हरकारा आया और उसने कहा, हे भगवन् ! तुम्हारा जो पूर्व दिशा का मण्डलेश्वर था, वह बुढ़ापे से मरकर मानो यमराज को जीतने गया है। इसके पूर्व दिशा की रक्षा करो, क्योंकि वहाँ और मण्डलेश्वर आ रहा है। हे राम ! इस प्रकार वह कहता ही था कि दूसरा हरकारा पश्चिम से आया और कहने लगा कि हे भगवन् ! तुमने जो पश्चिम दिशा का मण्डलेश्वर किया था, वह तप करते-करते मर गया है। वहाँ एक और मण्डलेश्वर आ रहा है, इसलिए वहाँ की रक्षा करो।
हे राम ! इस प्रकार दूसरा हरकारा कह ही रहा था कि एक और हरकारा आया। उसने कहा-हे भगवन् ! दक्षिण दिशा का मण्डलेश्वर पूर्व पश्चिम की रक्षा के निमित्त गया था, सो मार्ग ही में मर गया इससे दोनों की रक्षा के लिए सेना भेजो; क्योंकि एक प्रवल शत्रु आया है। अब और विलम्ब का समय नहीं है, शीघ्र सेना भेजिये।
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हे राम ! यह सुनकर राजा बाहर निकला और कहने लगा कि सब सेना मेरे पास होकर दिशाओं की रक्षा के लिए जावे। बड़े-बड़े शस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ आदि सेना ले जाओ । हे राम ! इस प्रकार राजा कहता ही था कि एक और पुरुष आया और बोला कि हे भगवन् ! उत्तर दिशा की ओर जो तुम्हारा मण्डलेश्वर था, उसके ऊपर और शत्रु आ गया है और बड़ा युद्ध हो रहा है, इससे उसकी रक्षा के लिए शीघ्र ही सेना भेजो। अब विलम्ब का समय नहीं है। मैं लौटा जाता हूँ, क्योंकि मेरा स्वामी युद्ध कर रहा है। हे राम ! यों कहकर वह चला गया। तब द्वारपाल ने आकर कहा कि हे भगवन् ! उत्तर दिशा का मण्डलेश्वर आया है। आज्ञा हो तो ले आऊँ । राजा ने कहा, ले आओ। वह उसे ले आया। उस मण्डलेश्वर ने राजा के सम्मुख आकर प्रणाम किया। राजा ने देखा कि उसके अङ्ग टूट गये हैं और मुख से रुधिर निकल रहा है। पर ऐसी अवस्था में भी उस धैर्यसंयुक्त मण्डलेश्वर ने कहा कि हे भगवन् ! मेरे अङ्गों की यह दशा हुई है। मैं तुम्हारे देश की रक्षा करने को चला था, पर मेरे ऊपर शत्रु ने आक्रमण किया। मेरी सेना थोड़ी थी, इस कारण दौड़कर तुम्हारे पास आया हूँ कि प्रजा की रक्षा करो ।
हे राम ! जब इस प्रकार उसने कहा, तब राजा ने सब मन्त्रियों को बुलाया। मन्त्री राजा के पास आये और बोले, हे भगवन् ! अब तीन उपाय छोड़कर चौथा उपाय करो, अर्थात् एक नम्रता, दूसरा धन देना और तीसरा बुद्धि का भेद, ये तीनों अब नहीं चल सकते। ये दुष्ट नम्रता माननेवाले नहीं हैं; क्योंकि नीच और पापी हैं। धन इस कारण न देना चाहिए कि ये अधीन हैं। और भेदभाव भी नहीं चलेगा, क्योंकि सब मिलकर इकट्ठे हुए हैं। इससे ये तीनों उपाय छोड़ो और चौथा उपाय करो—युद्ध करो। अब विलम्ब का समय नहीं है, क्योंकि उनकी सेना निकट आ गई है—अब उत्साहसहित कर्म करना है। केवल प्राणों की रक्षा नहीं चाहिए। हे राम ! जब इस प्रकार मन्त्रियों ने कहा, तब राजा ने आज्ञा की कि सब सेना मेरी आज्ञा
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से उनके सम्मुख जावै और निशान, नगाड़े, हस्ती, घोड़ा, रथ, पियादे सेना के साथ जावैं। इस प्रकार जब राजा ने कहा, तब सब सेना आकर स्थित हुई और नौबत-नगाड़े बजने लगे। जब नाना प्रकार के शस्त्रों सहित चारों प्रकार की सेना इकट्ठी हुई, तब राजा ने कहा, हे साधु ! तुम आगे जाओ। आगे सेना हो, उसके पीछे सेनापति जावें। जाकर शत्रुओं के साथ युद्ध करो। मैं भी स्नान करके आता हूँ। हे राम ! इस प्रकार कहकर राजा ने मन्त्री को भेजा और आप गङ्गा-जल से स्नानकर एक स्थान में जो अग्नि-कुण्ड था, उसके निकट जाकर हवन करने लगा। जब अग्नि प्रज्वलित हुई, तब राजा ने कहा-हे भगवन् ! इतना समय मुझे यथाशास्त्र आचरण करते व्यतीत हुआ है। मैंने अपनी प्रजा सुखी रखी, निष्कंटक राज्य किया, शत्रु को नष्ट करके सिंहासन के नीचे दबाया और आप सिंहासन पर बैठा हूँ। पातालवासी दैत्य भी मैंने जीत लिये हैं। दसों दिशाएँ अपने अधीन की हैं। सातों समुद्रों तक सब लोग मेरे भय से काँपते हैं और सब जगह मेरी कीर्ति फैल रही है। रत्नों से मेरे कोष भरे हुए हैं। वस्त्र, सेना, घोड़े और हाथी भी बहुत हैं। मैंने बड़े भोग भी भोगे और बड़े-बड़े दान भी किये हैं। सिद्ध और देवता भी मेरा यश गाते हैं। निदान सब ओर मेरा यश फैला है। अब शरीर भी बूढ़ा हुआ और क्षोभ भी बड़ा प्राप्त हुआ है, इससे अब मेरा जीने से मरना भला है।
हे भगवन् ! मैं तुमको शीश निवेदन करता हूँ, कृपा करके स्वीकार करो। यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे चार रूप दो, जिनसे मैं चारों ओर जाऊँ। और जब जहाँ मुझे कुछ कष्ट हो, वहाँ दर्शन देना। हे राम ? इस प्रकार कहकर उसने खड्ग निकाला और अपना शीश काट-कर अग्नि में डाल दिया। तब धड़ भी आप ही अग्नि में जा पड़ा और शीश धड़ दोनों भस्म हो गये अथवा अग्नि ने भक्षण कर लिये। तब उसी की सी चार मूर्तियाँ कुण्ड से निकल आईं। वे उसी के से आकार, वस्त्र, भूषण, मुकुट, कवच और नाना प्रकार के शस्त्र धारण किये थीं। हे राम ! तब बड़े तेजस्वी वे चारों राजा विपश्चित् के रूप
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प्रकट हुए। रथ, हाथी, घोड़े, प्यादे और चारों प्रकार की सेना भी प्रकट हुई। निदान चारों ओर शत्रुओं से बड़ा युद्ध होने लगा। नगर जलने लगे, बड़ा हाहाकार होने लगा। शूरवीर युद्ध में उछल-उछलकर लड़ने और प्राण त्यागते थे। बड़े रुधिर के प्रवाह चलते थे, खङ्ग और बरछी की वर्षा होती थी और अग्नि का अट्ट-अट्ट शब्द होता था—मानो समय बिना ही प्रलय होने लगा हो। निदान बड़ा युद्ध हुआ। जो सूरमा थे, वे युद्ध में मरने को जीना मानते थे और जीने को मरना जानते थे। ऐसा निश्चय करके वे युद्ध करते थे। और जो कायर थे, वे भाग जाते थे—जैसे गरुड़ के भय से सर्प भाग जाते हैं। पर सूरमा सम्मुख होकर लड़ते थे। इस प्रकार बड़ा युद्ध होने लगा। रुधिर की नदियाँ बह चलीं, जिनमें हाथी, घोड़े, रथ और सूरमा बहते जाते थे। बड़े-बड़े वृक्ष और नगर गिरते और बहते जाते थे। मांसभक्षण के लिए योगिनियाँ भी आकर उपस्थित हुईं। जो-जो युद्ध में मरता, उसे अप्सराएँ और विद्याधरियाँ विमान पर चढ़ाकर स्वर्ग को ले जाती थीं।
हे राम! इस प्रकार जब युद्ध हुआ, तब राजा विपश्चित् की सेना सब शून्य हो गई अर्थात् थोड़ी रह गई। राजा ने सुना कि सेना बहुत मारी गई है, इसलिए उसने रथ पर सवार होकर देखा कि सेना थोड़ी रह गई है। तब एक-एक राजा एक-एक ओर को गया अर्थात् चारों राजा चारों ओर गये और विचार करने लगे कि यह महागम्भीर सेना-रूपी समुद्र है। इसमें शव ही जल है, उनका धार ही तरङ्ग है और सूरमा ही मत्स्य है। इस समुद्र को मैं अगस्त्य की तरह पी जाऊँगा। ऐसा विचार-कर उसने उद्यम किया, क्योंकि शत्रु की विशेष सेना देखी—एक तो सेना आगे ही को चली आती थी, दूसरे बहुत सूरमा तेज से सेना को जलाते थे और तीसरे बहुत सेना आती थी। ऐसी तीन प्रकार की सेना-के राजा ने तीन उपाय किये। प्रथम उसने वायव्यास्त्र हाथ में लिया और परमात्मा ईश्वर को नमस्कार कर और मन्त्र पढ़कर पवन का अस्त्र चलाया। इससे अँधेरी छा गई और जितनी सेना आगे चली आती थी, वह सब उलटी उड़ने लगी। फिर उसने मेघ का अस्त्र चलाया।
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तब वर्षा होने लगी और उससे जो तेज उनकी सेना को जला रहा था, वह शान्त हो गया । उसके बाद उसने शिव का अस्त्र चलाया । उसमें से प्रथम शस्त्रां की नदी चली, फिर त्रिशूलों की नदी चली, फिर चक्रों की नदी चली, फिर वज्र की नदी चली, बरछी की नदी चली, बिजली की नदी चली और अग्नि इत्यादिक की नदियाँ चलीं । दूसरे शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा हुई । जब इस प्रकार नदियाँ बह चलीं, तब जो कुछ सेना सम्मुख आती थी, वह मृतक हो गई । जैसे कमलिनी काटी जाती है, वैसे ही शूरवीर काटे गये । कोई पहाड़ों की कन्दराओं में गिरे और वहाँ से उड़कर समुद्र में जा पड़े और कोई सुमेरु की कन्द-राओं में जाकर छिपे और समुद्र में जाकर डूबे—जैसे अज्ञानी विषयों में डूबते हैं इस प्रकार दोनों ओर से सेना शून्य हुई और चारों दिशाओं की सेना नष्ट हो गई । नीच से नीच देशों के और पहाड़ की कन्दराओं के रहनेवाले सब बहते जाते थे ।
हे राम ! कई शस्त्रों से और कई आँधी से उड़े, वे सब क्षेत्रों में जा पड़े । कई वन में और कई नीचे देशों में गिरे । जो पुण्यवान् थे, वे उत्तम क्षेत्र में जा पड़े और मृतक होकर स्वर्ग को गये, और पापी नीच देशों में जा पड़े, उसमे दुर्गति को प्राप्त हुए । कई पिशाच हुए, कितनों को विद्याधरियाँ ले गईं और कई ऋषीश्वरों के स्थानों में जा पड़े । उनकी उन्होंने रक्षा की । इसी प्रकार कितने बाणों से छेदे हुए नष्ट हुए और कई रुधिर की नदियों में बहते समुद्र की ओर चले गये । हे राम ! जब सब सेना नष्ट हो गई, तब आकाश शुद्ध हुआ । जैसे ज्ञानी का मन निर्मल होता है, वैसे ही आकाश अधिक क्षोभ से रहित हुआ । जब सब सेना समाप्त हो गई, तब चारों राजा आगे चले । हे राम ! निदान चारों विपश्चित् चारों दिशाओं के समुद्रों तक जा पहुँचे । तब उन्होंने क्या देखा कि बड़े गहरे समुद्र हैं । कहीं रत्न, कहीं हीरा, मोती इत्यादि चमकते हैं । बड़े गहरे समुद्र में बड़े मच्छ और तरङ्ग उछलते हैं । रेती में नाना प्रकार के लौंग, इलायची, चन्दन इत्यादि के वृक्ष समुद्र तट पर जाकर देखे ।
इति नि० विपश्चित्समुद्रप्रासिनांम द्विशताधिकाष्टादशसर्गः ॥ २१ ॥
६७८ | ✹ योगवाशिष्ठ ✹
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार राजा विपश्चित् समुद्र के पार जा पहुँचा, तब उसके साथ जो मन्त्री पहुँचे थे, उन्होंने राजा को सब स्थान दिखाये, जो बड़े गम्भीर थे । बड़े गम्भीर समुद्र, जो पृथ्वी को बहुँफेर घेरे थे, वे भी दिखाये और बड़े-बड़े तमालवृक्ष, बावलियाँ, पर्वतों की कन्दरा, तालाब और नाना प्रकार के स्थान दिखाये । ऐसे स्थान राजा को मन्त्री ने दिखाकर कहा, हे राजन् ! तीन पदार्थ बड़े अनर्थ और परमसार के कारण हैं—एक तो लक्ष्मी, दूसरा आरोग्य और तीसरा यौवनावस्था । जो पापी जीव हैं वे लक्ष्मी को पाप में लगाते हैं, देह के आरोग्य से विषयों का सेवन करते हैं और यौवन अवस्था में भी सुकृत नहीं करते, पाप ही करते हैं और जो पुण्यवान् हैं, वे इन्हें मोक्ष में लगाते हैं अर्थात् लक्ष्मी से यज्ञादिक शुभकर्म और आरोग्य से परमार्थ साधते हैं और यौवन अवस्था में भी शुभ-कर्म करते हैं—पाप नहीं करते ।
हे राम ! जैसे समुद्र और पर्वत के किसी स्थान में रत्न और किसी स्थान में घोंघे होते हैं, वैसे ही संसार-समुद्र में कहीं रत्नों की नाईं ज्ञानवान् होते हैं और कहीं अज्ञानारूपी घोंघे होते हैं । हे राजन् ! यह समुद्र मानो जीवन्मुक्त है, क्योंकि जल में भी मर्यादा नहीं छोड़ता और रागद्वेष से रहित है । किसी स्थान में दैत्य रहते हैं, कहीं पंखों से युक्त पर्वत, कहीं वड़वाग्नि और कहीं रत्न हैं, परन्तु समुद्र को न किसी स्थान में राग है, न द्वेष । जैसे ज्ञानवान् को किसी में रागद्वेष नहीं होता, परन्तु सबमें ज्ञानवान् कोई विरला ही होता है । जैसे जिस सीपी और बाँस से मोती निकलते हैं, वे विरले ही होते हैं, वैसे ही तत्त्वदर्शी ज्ञानवान् कोई विरला होता है । हे राम ! यहाँ की सम्पूर्ण रचना देखो कि कैसे पर्वत हैं, जिनके किसी स्थान में पक्षी रहते हैं, किसी स्थान में विद्याधर रहते हैं, कहीं देवियाँ विलास करती हैं, कहीं योगी रहते हैं और कहीं ऋषीश्वर, मुनीश्वर, कहीं ब्रह्मचारी, वैरागी आदि पुरुष रहते हैं । यह द्वीप है और सात समुद्र हैं जिनके बड़े तरङ्ग उछलते हैं, और पर्वत का कौतुक, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, तारे,
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ऋषि, मुनि आदि को देखो । और देखो कि सबको आकाश स्थान दे रहा है, पर महापुरुष की नाईं आप सदा असंग रहता है । वह शुभ अशुभ दोनों के लिए समान है । स्वर्गादिक शुभस्थान हैं और चाण्डाल, पापी आदि के निवासस्थान नरक अपवित्र हैं, परन्तु आकाश दोनों के लिए समान है—असंग होने के कारण निर्विकार है । जैसे ज्ञानी का मन सब स्थानों से निर्लेप होता है, वैसे ही आकाश सब पदार्थों से असंग, न्यारा है और महात्मा पुरुष की नाईं सर्वव्यापी है । हे आकाश ! तू प्रकाशरूप है, तुझमें अन्धकार दिखता है—यह आश्चर्य है । हे आकाश ! तू सबका आधार है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूर्ख हैं । दिन को तुझमें श्वेतता भासित होती है, रात्रि को अन्धकार भासित होता है और संध्याकाल में तुझमें लाली चमकती है; पर तू तीनों से न्यारा है । ये तीनों राजसी, तामसी और सात्त्विकी गुण हैं; पर तू इनके होते भी असंग है । हे आकाश ! तू निर्मल है और तम तुझमें दिखता है, परन्तु तू सदा ज्यों का त्यों है । यह अनित्यरूप है । चन्द्रमा तुझमें शीतलता करता है, सूर्य दाहक होते हैं । तीर्थ आदिक पवित्र स्थान हैं और पापमय अपवित्र स्थान हैं; परन्तु तू सबमें एक समान ज्यों का त्यों रहता है । वृक्षों को बढ़ने और ऊँचे होने की सत्ता तू ही देता है । अपनी महिमा को तू आप ही जाने । और कोई तेरी महिमा जान नहीं सकता । तू निष्किञ्चन अद्वैत है; सबको धारण कर रहा है । सबका प्रयोजन तुझसे ही सिद्ध होता है । जल नीचे को जाता है, पर तू सबसे ऊँचा और व्यापक विभु है । अनेक पदार्थ तुझमें उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, पर तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जैसे अग्नि से चिनगारी उपजती और अग्नि ही में लीन हो जाती है, वैसे ही तुझमें अनन्त जगत् उपजते और लीन होते हैं और तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूढ़ हैं ।
हे राजन् ! ऐसा आकाश कौन है, यह भी सुनो । ऐसा आकाश आत्मा है, जो चैतन्य आकाश है, और जिसमें अनन्त जगत् उत्पन्न और लीन हो जाते हैं । उसको जो शून्य कहते हैं, वे महामूर्ख हैं जो
६८० ✻ योगवासिष्ठ ✻
सबका अधिष्ठान है, सबको धारण कर रहा है और सदा निःसंग है ऐसे चिदाकाश को नमस्कार है । हे राजन् ! यह आश्चर्य है कि वह सदा एकरस है, पर उसमें नाना तरङ्ग भासित होते हैं—यही माया है । हे राजन् ! एक विद्याधरी और विद्याधर थे । उनके मन्दिर में एक ऋषि आ पहुँचा, पर उस विद्याधर ने उनका आदर-सत्कार नहीं किया । इससे ऋषीश्वर ने शाप दिया कि तू बारह वर्ष तक वृक्ष होगा । निदान वह विद्याधर वृक्ष हो गया । पर अब हम आये हैं, हमारे देखते ही वह शाप से मुक्त हो वृक्षभाव को त्यागकर फिर विद्याधर हुआ है । यह ईश्वर की माया है कि कभी कुछ हो जाता है, और कभी कुछ हो जाता है । हे मेघ ! तू धन्य है ! तेरी चेष्टा भी सुन्दर है । तीर्थों में सदा तेरी स्थिति है । तू सबमे ऊँचे बिराजता है और सब आकार तेरा भला दिखता है, परन्तु एक तुझमें नीचता है कि ओले की वर्षा करता है जिसमे खेती नष्ट हो जाती और फिर नहीं उगती । वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा देखने पर की सुन्दर है और हृदय मूर्ख है, उनकी संगति बुरी है । ज्ञानवान् की चेष्टा देखने में भला नहीं, तो भी उसकी संगति कल्याण करती है । हे राजन् ! सबमे नीच कुत्ता है; क्योंकि जो कोई उसके निकट आता है, उसे काट लेता है । वह घर-घर में भटकता फिरता और मलिन स्थानों में जाता है । वैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषों की निन्दा करता है, पर मन में तृष्णा रखता है । और विषयरूपी मलिन स्थानों में गिरता है । वह मूर्ख मनुष्य मानों कुत्ता है, बल्कि कुत्ते से भी नीच है । ब्रह्मा ने सम्पूर्ण जगत् रचा है, परन्तु उसमें कुत्ता सबसे नीच है । पर कुत्ता क्या समझता है, सो सुनो ।
एक पुरुष ने कुत्ते से प्रश्न किया कि हे कुत्ते ! तुझसे कोई नीच है, या नहीं ? तब कुत्ते ने कहा कि मुझसे भी नीच मूर्ख मनुष्य है, उससे में श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि प्रथम तो में स्पृश्य हूँ, दूसरे जिसका भोजन खाता हूँ, उसकी रक्षा करता हूँ और उसके द्वारे बैठा रहता हूँ ; पर मूर्ख से ये तीनों कार्य नहीं होते । इससे में उससे श्रेष्ठ हूँ । मूर्ख को देहाभिमान है, इससे वह कुत्ते से भी नीच है । हे राजन् ! परम
- निर्वाण प्रकरण * ६८१
अनर्थ का कारण देहाभिमान है। देहाभिमान से जीव परम आपदा को प्राप्त होता है। वह मूर्ख नहीं, मानो कौआ है, जो सबसे ऊँची टहनी पर बैठकर काँ-काँ करता है। हे राजन् ! कमल की खान तालाब के निकट एक कौआ जा निकला तो क्या देखा कि भौंरे बैठे कमल की सुगन्ध लेते हैं। उनको देखकर वह हँसने लगा और काँ-काँ शब्द करने लगा। तब उसको देख भौंरे हँसे कि यह कमल की सुगन्ध क्या जाने। वैसे ही जिज्ञासु भौंरे के समान हैं, जो परमार्थरूपी सुगन्ध लेते हैं। जो अज्ञानीरूपी कौए हैं, वे परमार्थरूपी सुगन्ध को नहीं जानते। इस कारण मूर्ख को देखकर जिज्ञासु हँसते हैं, जो आत्मरूपी सुगन्ध को नहीं जानता। अरे कौए ! तू क्यों हंस की बराबरी करता है ? हंस तो मोती चुगनेवाले हैं और तू नीच स्थानों में रहनेवाला है। मन्त्री ने कहा, हे कोयल ! तुम कमल को देखकर क्या प्रसन्न होती हो ? प्रसन्न तो तब हो, जब वसन्तऋतु हो; पर यह तो वर्षाकाल है—ये फूल ओलों से नष्ट हो जावेंगे।
हे राजन् ! कोयलरूपी जो जिज्ञासु हैं, उनको यह उपदेश है। हे जिज्ञासु ! जो सुन्दर पदार्थ तुमको दिखते हैं, उनको देखकर तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? प्रसन्न तो तब हो, जो ये सत्य हों, पर ये तो मिथ्या हैं और अविद्या के रचे हैं। तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? अपनी बिरादरी में जाकर बैठो और अज्ञानी का संग छोड़ दो। जैसे कौआ हंसों में जा बैठता तो भी उसका चित्त गन्दगी खाने में लगा होता है और हंस के आहार मोतियों की ओर देखता भी नहीं, वैसे ही अज्ञानी जीव कभी सन्तों की संगति में जा बैठता है, तो भी उसका चित्त विषयों की ओर ही घूमता रहता है, स्थिर नहीं होता। जैसे कोयल का बच्चा कौए को माता-पिता जानकर उनमें जा बैठता है, तब उनकी संगति से वह भी गन्दगी खानेवाला हो जाता है। इससे कोयल उसको वर्जन करती है कि अरे बेटा ! तू कौए की संगति में मत बैठ, अपने कुल में बैठ; क्योंकि तेरा भी नीच आहार हो जायगा। वैसे ही जिज्ञासु जो अज्ञानी का संग करता है, तो उसके अनुसार उसको भी विषयों
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की तृष्णा उत्पन्न होती है। तब ज्ञानी उसको वर्जन करते हैं कि रे जिज्ञासु ! तू मूर्ख अज्ञानियों में मत बैठ। अपना कुल जो सन्त जन हैं, उनमें बैठ। जैसे कोयल के बच्चे को कौए सुख देनेवाले नहीं होते, वैसे ही मूर्ख तुझको सुख देनेवाले नहीं होंगे। मन्त्री फिर कहने लगा—
अरे चील ! तू क्यों हंस की बराबरी करती है ? तू भी बहुत ऊँचे उड़ती है; परन्तु तुझमें हंस का कोई गुण नहीं है। जब तू मांस को पृथ्वी पर देखती है, तब वहाँ गिर पड़ती है, पर हंस नहीं गिरते। वैसे ही जो मूर्ख हैं, वे सन्तों की तरह ऊँचे कर्म भी करते हैं, परन्तु विषयों को देखकर गिरते हैं; पर संत नहीं गिरते। तो मूर्ख सन्तों की बराबरी कैसे करें ? फिर मन्त्री ने कहा, हे बगले ! तू हंस की बराबरी क्या करता है ? अपने पाखण्ड को छिपाकर तू अपने को हंस की नाईं उज्ज्वल दिखाता है, पर जब मछली निकलती है, तब तू खा लेता है। यही तुझ में अवगुण है। हंस मानसरोवर के मोती चुगनेवाले हैं, और तू गढ़े में से तृष्णा करके मछली खानेवाला है। तू क्यों अपने को हंस मानता है ? वैसे ही अज्ञानी जीव विषयों की तृष्णा करते हैं और ज्ञानवान् विवेक से तृप्त हैं। उनकी बराबरी अज्ञानी क्यों करते हैं ?
हे राजन् ! जो हंस हैं, वे सदा अपनी महिमा में रहते हैं और अपना जो मोती का आहार है, उसको करते हैं; दूसरे किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करते। जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर शोभा पाते हैं—चन्द्रमा बिना शोभा नहीं पाते, वैसे ही बुद्धि भी तब शोभा पाती है, जब ज्ञान का उदय होता है—आत्मज्ञान के बिना बुद्धि शोभा नहीं पाती। बड़े-बड़े सुगन्धवाले वृक्षों का माहात्म्य भौंरे ही जानते हैं, और जीव नहीं जानते। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! समुद्र के किनारे पर राजा विपश्चित् से मन्त्रियों ने ऐसे कहकर फिर कहा, हे राजन् ! अब पृथ्वीनगर के मण्डलेश्वर स्थापित करो। हे राम ! जब मन्त्री ने ऐसे कहा, तब सब दिशाओं के मण्डलेश्वर स्थापित किये गये। तब चारों राजा, जो अपनी-अपनी दिशा के समुद्र पर बैठे थे, उन्होंने अपने-अपने मन्त्री से कहा, हे साधु ! अब हमने समुद्रपर्यन्त दिग्विजय
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की है और हमारी जय हुई है। अब चैत्य जो दृश्य है, उस दृश्य विभूति को देखो। समुद्र के पार द्वीप है, फिर उस समुद्र के पार और द्वीप है; फिर समुद्र है और फिर द्वीप है। इसी प्रकार सात द्वीप और सात समुद्र हैं, पर उनके आगे क्या है ? इस प्रकार सब दृश्य देखने की इच्छा करके उन्होंने अग्निदेवता का आवाहन किया। उनकी दृढ़भावना से अग्नि-देवता सम्मुख आकर स्थित हुए और बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुमको कामना हो, सो माँगो। राजा ने कहा, हे भगवन् ! ईश्वर की माया में पाञ्चभौतिक दृश्य में जो प्राणी हैं, उनको देखने की मेरी इच्छा है। उसे पूर्ण करो। हे देव ! हम इसी शरीर से दृश्य देखने जावें, और जब यह शरीर न चल सके, तब मन्त्रसत्ता में जावें। पर जहाँ मन्त्र की भी गति नहीं, वहाँ सिद्धि में जावें। और जहाँ सिद्धि की भी गति नहीं, वहाँ मन के वेग में जावें और मृतक भी न हों। यह वर हमको दो।
हे राम ! जब इस प्रकार राजा ने कहा, तब अग्नि ने कहा कि ऐसा ही होगा। यों कहकर अग्नि अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लय हो जाती है, वैसे ही अग्नि अन्तर्धान हो गये। जब राजा विपश्चित् वर पाकर चलने को उद्यत हुआ, तब जितने मन्त्री और मित्र थे, वे रोने लगे और बोले, हे राजन् ! तुमने यह क्या निश्चय किया है ? ईश्वर की माया का अन्त किसी ने नहीं पाया, इसमें तुम अपने स्थान को चलो। यह क्या तुमने निश्चय किया है। हे राम ! इस प्रकार मन्त्री कहते रहे, परन्तु राजा ने उनको आज्ञा देकर एक-एक दिशा के समुद्र में प्रवेश किया। यों चारों दिशाओं में चारों राजाओं ने गमन किया। तब जो बड़े-बड़े शक्तिशाली मन्त्री थे, वे साथ ही चले। तब राजा मन्त्रशक्ति से समुद्र को नाँघ गया। कहीं पृथ्वी पर चला और कहीं ऊँचे चला। इसी प्रकार और द्वीप में जो निकला। तब बड़ा समुद्र आया उसमें प्रवेश कर गया। उसमें बड़े तरंग उछलते थे और उसका सौ योजन विस्तार था। कभी नीचे और कभी ऊपर को जाते थे। हे राम ! ऐसे तरंग उछलते, मानो पर्वत उछ-लते हों। जब वे ऊपर को उछलते, तब स्वर्ग तक उछलने लगते, और
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जब नीचे जाते, तब पातालपर्यन्त चलते जान पड़ते । जैसे पानी में तृण फिरता है, वैसे ही राजा फिरे । इस प्रकार कष्ट से रहित राजा समुद्र और दिशा को नाँघ गया, परन्तु बीच में जो वृत्तान्त हुआ सो सुनो । क्षीरसमुद्र में एक मच्छ रहता था, जिसको सब देवता प्रणाम करते थे और जो विष्णु भगवान के मच्छ अवतार के परिवार में था । जब राजा ने क्षीरसमुद्र में प्रवेश किया, तब राजा को उसने मुख में डाल लिया । पर राजा मन्त्र के बल से उसके मुख से निकल गया । आगे फिर एक मच्छ मिला, उसने भी उसे मुख में डाल लिया । पर उसमें भी वह निकल गया ।
फिर आगे पिशाचों का देश था । वहाँ राजा को पिशाच ने काम में मोहित किया । फिर उसने दक्षप्रजापति की कुछ अवज्ञा की, जिससे उन्होंने शाप दिया और राजा वृक्ष हो गया । निदान कुछ काल वृक्ष रहकर फिर छूटा तो एक देश में मेंढक हुआ और सौ वर्ष तक खाई में पड़ा रहा । फिर उसमें छूटकर मनुष्य हुआ । तब किसी सिद्ध के शाप से शिला हो गया और सौ वर्ष तक शिला ही रहा । उसके उपरान्त अग्नि देवता ने शिला की योनि से छुड़ाया तो फिर मनुष्य हुआ । तब उस सिद्ध को आश्चर्य हुआ कि मेरे शाप को दूर करके यह मनुष्य क्योंकर हुआ—यह तो मुझसे भी बड़ा सिद्ध है । ऐसे जानकर उसने उसके साथ मैत्री की । इसी प्रकार दूसरे समुद्रों को भी वह नाँघता गया । क्षीरसमुद्र, खारी समुद्र और इक्षु रस के समुद्र को नाँघकर द्वीपों को नाँघता गया । फिर एक अप्सरा पर मोहित हुआ और बहुत काल में वहाँ से छूटा । फिर एक देश में पक्षी हुआ । बहुत काल तक पक्षी रहकर छूटा तो एक गोपी पिशाचिनी ने बैल बनाकर उसे रक्खा । तब दूसरे विपश्चित् ने बैल विपश्चित् को उपदेश करके जगाया । निदान हे राम ! चारों दिशाओं में चारों विपश्चित् घूमते फिरे । दक्षिण दिशा का राजा तो पिशाचिनी से मोहित हुआ, इससे उसने बहुत जन्म पाये, और पूर्व का राजा बहता हुआ मच्छ के मुख में चला गया । उसने निकाल दिया, इससे उसने वह अवस्था देखी । उत्तर दिशा का
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जो राजा हुआ, उसने वही अवस्था देखी । पश्चिम दिशा का हेमचू पक्षी की पीठ पर पहुँचा । उसने उसे कुशद्वीप में डाल दिया, इससे उसने भी अनेक अवस्था पाई । हे राम ! एक-एक विपश्चित् ने भिन्न- भिन्न योनियों और अवस्थाओं का अनुभव किया ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि विपश्चित् एक ही था और उन चारों की संवित् भी एक ही थी, आकार भी एक ही था तो भिन्न- भिन्न रुचि कैसे हुई, जो एक पक्षी हुआ, दूसरा वृक्ष हुआ और वे वासना के अनुसार अनेक शरीर पाते फिरे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? उनकी संवित् एक ही थी, परन्तु भ्रम से भिन्नता हो जाती है । जैसे किसी पुरुष को स्वप्न होता है तो उसमें वह पशु-पक्षी हो जाता है और भिन्न-भिन्न रुचि भी हो जाती है, वैसे ही उनकी भी भिन्न-भिन्न रुचि हो गईं । जैसे देखो कि शरीर तो एक ही होता है, पर उसमें नेत्र, श्रवण, नासिका, जिह्वा और त्वचा की रुचि भिन्न-भिन्न होती है और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती हैं, सो एक ही शरीर में अनेकता भासित होती है, वैसे ही उनकी एक ही संवित् थी, परन्तु संकल्प भिन्न-भिन्न हो गया था, इससे मन के फुरने से एक देह में अनेक भासित हुई । जैसे एक ही योगेश्वर इच्छा करके और और शरीर धर लेता है और एक से अनेक हो जाता है । एक सहस्र- बाहु अर्जुन था । वह किमी भुजा से युद्ध करता था, किमी भुजा से दान करता था और किमी एक मे लेता-देता था । इमी प्रकार मब भुजाओं से चेष्टा करता था—वे भी भिन्न-भिन्न हुए ? एक ही शरीर में भिन्न-भिन्न चेष्टा होती है । जैसे विष्णु भगवान् कहीं दैत्यों के साथ युद्ध और कहीं कर्म करते हैं, कहीं लीला करते हैं और कहीं शयन करते हैं, सो संवित् तो एकही है, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न होती हैं, वैसे ही उनकी संवित् में अनेक रुचि हुई तो इसमें क्या आश्चर्य है ? हे राम ! इस प्रकार उन्होंने जन्म से जन्मान्तर को अविद्याकृत संसार में देखा ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे तो बोधवान् विपश्चित् थे और बोधवान् जन्म नहीं पाता, फिर उनका किस प्रकार जन्म हुआ ?
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❊ योगवाशिष्ठ ❊
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वे विपश्चित् बोधवान् न थे, परन्तु बोध के निकट धारणा अभ्यासवाले थे। जो वे ज्ञानवान् होते तो दृश्यभ्रम देखने की इच्छा क्यों करते ? इससे वे ज्ञानवान् न थे—धारणा के अभ्यासी थे, अतः समुद्र को नाँघ गये और मच्छ के उदर से बलपूर्वक निकल आये। वह प्रसिद्ध योगशक्ति है। ज्ञान का लक्षण स्वसंवेद्य है, परसंवेद्य नहीं। राजा विपश्चित् ज्ञानवान् न थे, इस कारण देश-देशान्तर में घूमते रहे और ज्ञान बिना अविद्याकृत संसार में जन्म-मरण में भटकते रहे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञानवान् योगीश्वरों को भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों कालों का ज्ञान कैसे होता है ? ज्ञानी योगी एक देश में स्थित हुआ सर्वत्र कर्मों को कैसे करता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानी की बात, यह मैंने तुमसे कही है। जितना जगत् है, सब चिदाकाशस्वरूप है। जिनको ऐसी सत्ता का ज्ञान हुआ है, वे महापुरुष हैं। जैसे स्वप्न में कोई पुरुष जागे तो स्वप्न की सब सृष्टि उसे अपना ही स्वरूप लगती है और उसमें वह नहीं बँधता। हे राम ! यह सब नानात्व भासता है, सो नाना नहीं और अनाना भी नहीं, केवल आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने आपमें स्थित है। ये तीनों काल भी ज्ञानवान् को ब्रह्मरूप हो जाते हैं, सब जगत् भी ब्रह्मरूप हो जाता है और उसका द्वैतभाव मिट जाता है। ऐसे ज्ञानवान् को ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे अमृत को जो पीता है, वही उसके स्वाद को जानता है, और कोई ज्ञान नहीं सकता। हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तो तुल्य दिखती है, परन्तु ज्ञानी का निश्चय कुछ और है और अज्ञानी का निश्चय और। जिसका हृदय शान्त हुआ है, वह ज्ञानवान् है और जिसका हृदय त्रिताप से जलता है, वह अज्ञानी है। वह बँधा हुआ है। ज्ञानवान् का शरीर चूर्ण हो अथवा उसे राज्य प्राप्त हो तो भी उसको रागद्वेष नहीं उपजता। वह सदा ज्यों का त्यों एकरस रहता है। वह जीवन्मुक्त है, परन्तु उसका यह लक्षण कोई नहीं जान सकता, वह
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आप ही जानता है। शरीर को दुःख और सुख भी प्राप्त होता है; वह मरता और रुदन भी करता है, हँसता, लेता और देता भी है और इस प्रकार की सब चेष्टा करता दिखता है, पर वह अपने निश्चय में न दुःखी होता है, न सुखी होता है, न देता है और न लेता है, सदा ज्यों का त्यों रहता है।
हे राम ! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दिखता है, परन्तु हृदय से उसका यही निश्चय होता है। वह अद्भुत पद में स्थित रहता है, कभी उससे नहीं गिरता। उसका परम उदितरूप होता है। वह राग सहित भी दिखता है। पर हृदय से राग किसी में नहीं करता। क्रोध करता भी दिखता है, पर उसको क्रोध कभी नहीं होता। जैसे आकाश शुभ पदार्थ को धारण करता है और धुएँ और बादल से ढका भी दिखता है, पर किसी का स्पर्श नहीं करता; वैसे ही ज्ञानवानों में सब क्रिया दिखती है, पर अपने निश्चय में उसे कोई स्पर्श नहीं करती। जैसे नट स्वाँग ले आता है और चेष्टा करता दीखता है, पर हृदय से अपने नटत्व भाव में उसे निश्चय होता है, वैसे ही ज्ञानवान् को भी सब क्रियाओं में अपने आत्मभाव का निश्चय होता है। जैसे जिसको स्वप्न आता है, वह यदि स्वप्न भी अपना पूर्वरूप स्मरण रखता है तो स्वप्न के पदार्थ में बर्तता है, तो भी स्वप्न के सुख में अपने को सुखी और दुख में दुखी नहीं मानता—सब सृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् को स्वरूप के निश्चय से सुख-दुःख का क्षोभ नहीं होता। जो ऐसे पुरुष हैं, उनको दुःख से कष्ट होता है ? जैसी उनकी इच्छा होती है, वैसे ही सिद्धि होकर भासती है। हे राम ! यह जितनी सृष्टि है, सब चित्सत्ता में है। योगीश्वर पुरुष उसी में स्थित होकर जहाँ पहुँचना चाहते हैं, वहाँ अन्तवाहक मे जा पहुँचते हैं। तीनों काल उनको विद्यमान होते हैं। साधन कुछ नहीं, परन्तु ज्ञानी अवश्य किसी काम के लिए यत्न नहीं करते—जैसा प्राप्त होता है, उसी में प्रसन्न रहते हैं। हे राम ! एक समय ब्रह्माजी ऊर्ध्वमुख से सामवेद का गायन करते थे। उन्होंने सदाशिव