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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1477, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1477

६७२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अचिन्त्य चिन्मात्र आकाशरूप आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है । शुद्ध चिन्मात्र में जब अहं का स्फुरण होता है तब जगत् होकर भासता है । वही अहंश्रूप जीव जगत् में जीता दिखता है, परन्तु मृतक की नाईं स्थित है । और तुम, मैं आदि सब जगत् जीता, बोलता, चलता और व्यवहार करता भी दिखता है, परन्तु काष्ठवत् मौन स्थित है । आत्मरूपी रत्न की चमक जगत् है और वह प्रकाश आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे आकाश में तरुवर, मरुस्थल में जल और धुएँ के पर्वत मेघ भासते हैं सो भ्रान्तिमात्र है, वैसे ही यह जगतलक्षण भी भासता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, अवस्तु है-उपजा कुछ नहीं ।

हे राम ! चित्तरूपी बालक ने जगत्जालरूपी सेना रची है, सो असत्य है । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि पंचभूत भ्रान्तिमात्र हैं और उनमें सत्य प्रतीति करना मूर्खता है । बालक की कल्पना में सत्य प्रतीति बालक ही करते हैं और जो इस जगत् का आश्रय करके सुख की इच्छा करते हैं, वे मानो आकाश के धोने का यत्न करते हैं । उनका सब यत्न व्यर्थ है । यह सब जगत् भ्रान्तिरूप है; इसमें आस्था करके जो इसके पदार्थ पाने का यत्न करते हैं, वे जैसे बन्ध्या स्त्री पुत्र पाने का यत्न करे वैसे ही व्यर्थ है । जगत् में जो सुख के पाने का यत्न करते हैं, वह व्यर्थ यत्न है । हे राम ! ये पृथ्वी आदि जो सम्पूर्ण भूत पदार्थ दीखते हैं सो भ्रान्तिमात्र हैं । जब भ्रान्तिमात्र हैं तब इनकी उत्पत्ति किसमें और कैसे कहिये ? जो मूर्ख बालक हैं, उनको पृथ्वी आदि जगत् के पदार्थ सत्य लगते हैं । ज्ञानवान् को ये सत्य नहीं दीखते और अज्ञानी को सत्य लगते हैं । पर उनसे हमको क्या प्रयोजन है । जैसे सोये को स्वप्न में आत्म-अनुभवसत्ता ही पृथ्वी, पहाड़ और नदियाँ जगत् हो भासती है, पर वे सब आकार दिखने पर भी निराकाररूप हैं । वैसे ही यह जगत् आकाशसहित दिखता है, परन्तु आकार कुछ बना नहीं, निराकारसत्ता ही जगतरूप भासित होती है । यह जगत् निराकार ही है, पर और कुछ नहीं, आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है ।

इति श्री नि० भावप्रतिपादननामसप्तदशाधिकद्विशततमस्सर्गः ॥ २१७ ॥

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1477, कुल 1734 में से · BharatKosha