योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1478, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ६७३
राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि जगत् अविद्यमान है, पर अज्ञान से स्वप्न की नाईं सत्य लगता है, इसमें विद्यमान भी है; और जैसे स्वप्न का नगर शून्य है, वैसे यह जगत् अज्ञानरूप है। वह अज्ञान क्या है और अविद्या कितने काल की है, किसको होती है और इसका प्रमाण क्या है ? कृपा कर कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको जगत् दिखता है, वह सब अविद्या है। वह अविद्या अनन्त है। देश और काल से इसका अन्त कभी नहीं होता। जिसको अपने वास्तव स्वरूप का अज्ञान है, उसको यह सत् दिखाई देती है। इस पर इतिहास है, सो सुनिये। हे राम ! आत्मरूप चिदाकाश के अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। उनमें से एक ब्रह्माण्ड इसी के समान है। उस ब्रह्माण्ड के जगत् में तुग्मत नाम का एक देश है, जिसका राजा विपश्चित् था। वह एक समय अपनी सभा में बैठा था। उसके चारों ओर उसकी बड़ी तेजस्वी सेना उपस्थित थी। वह अग्नि देवता के सिवा और किसी देवता को न पूजता था। राजा बड़ी लक्ष्मी से शोभित और बहुत गुणों और ऐश्वर्य से सम्पन्न था। एक समय वह सभा में बैठा था कि पूर्व दिशा की ओर से हरकारा आया और उसने कहा, हे भगवन् ! तुम्हारा जो पूर्व दिशा का मण्डलेश्वर था, वह बुढ़ापे से मरकर मानो यमराज को जीतने गया है। इसके पूर्व दिशा की रक्षा करो, क्योंकि वहाँ और मण्डलेश्वर आ रहा है। हे राम ! इस प्रकार वह कहता ही था कि दूसरा हरकारा पश्चिम से आया और कहने लगा कि हे भगवन् ! तुमने जो पश्चिम दिशा का मण्डलेश्वर किया था, वह तप करते-करते मर गया है। वहाँ एक और मण्डलेश्वर आ रहा है, इसलिए वहाँ की रक्षा करो।
हे राम ! इस प्रकार दूसरा हरकारा कह ही रहा था कि एक और हरकारा आया। उसने कहा-हे भगवन् ! दक्षिण दिशा का मण्डलेश्वर पूर्व पश्चिम की रक्षा के निमित्त गया था, सो मार्ग ही में मर गया इससे दोनों की रक्षा के लिए सेना भेजो; क्योंकि एक प्रवल शत्रु आया है। अब और विलम्ब का समय नहीं है, शीघ्र सेना भेजिये।