योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1479, कुल 1734 में से
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हे राम ! यह सुनकर राजा बाहर निकला और कहने लगा कि सब सेना मेरे पास होकर दिशाओं की रक्षा के लिए जावे। बड़े-बड़े शस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ आदि सेना ले जाओ । हे राम ! इस प्रकार राजा कहता ही था कि एक और पुरुष आया और बोला कि हे भगवन् ! उत्तर दिशा की ओर जो तुम्हारा मण्डलेश्वर था, उसके ऊपर और शत्रु आ गया है और बड़ा युद्ध हो रहा है, इससे उसकी रक्षा के लिए शीघ्र ही सेना भेजो। अब विलम्ब का समय नहीं है। मैं लौटा जाता हूँ, क्योंकि मेरा स्वामी युद्ध कर रहा है। हे राम ! यों कहकर वह चला गया। तब द्वारपाल ने आकर कहा कि हे भगवन् ! उत्तर दिशा का मण्डलेश्वर आया है। आज्ञा हो तो ले आऊँ । राजा ने कहा, ले आओ। वह उसे ले आया। उस मण्डलेश्वर ने राजा के सम्मुख आकर प्रणाम किया। राजा ने देखा कि उसके अङ्ग टूट गये हैं और मुख से रुधिर निकल रहा है। पर ऐसी अवस्था में भी उस धैर्यसंयुक्त मण्डलेश्वर ने कहा कि हे भगवन् ! मेरे अङ्गों की यह दशा हुई है। मैं तुम्हारे देश की रक्षा करने को चला था, पर मेरे ऊपर शत्रु ने आक्रमण किया। मेरी सेना थोड़ी थी, इस कारण दौड़कर तुम्हारे पास आया हूँ कि प्रजा की रक्षा करो ।
हे राम ! जब इस प्रकार उसने कहा, तब राजा ने सब मन्त्रियों को बुलाया। मन्त्री राजा के पास आये और बोले, हे भगवन् ! अब तीन उपाय छोड़कर चौथा उपाय करो, अर्थात् एक नम्रता, दूसरा धन देना और तीसरा बुद्धि का भेद, ये तीनों अब नहीं चल सकते। ये दुष्ट नम्रता माननेवाले नहीं हैं; क्योंकि नीच और पापी हैं। धन इस कारण न देना चाहिए कि ये अधीन हैं। और भेदभाव भी नहीं चलेगा, क्योंकि सब मिलकर इकट्ठे हुए हैं। इससे ये तीनों उपाय छोड़ो और चौथा उपाय करो—युद्ध करो। अब विलम्ब का समय नहीं है, क्योंकि उनकी सेना निकट आ गई है—अब उत्साहसहित कर्म करना है। केवल प्राणों की रक्षा नहीं चाहिए। हे राम ! जब इस प्रकार मन्त्रियों ने कहा, तब राजा ने आज्ञा की कि सब सेना मेरी आज्ञा