योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1480, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६७५
से उनके सम्मुख जावै और निशान, नगाड़े, हस्ती, घोड़ा, रथ, पियादे सेना के साथ जावैं। इस प्रकार जब राजा ने कहा, तब सब सेना आकर स्थित हुई और नौबत-नगाड़े बजने लगे। जब नाना प्रकार के शस्त्रों सहित चारों प्रकार की सेना इकट्ठी हुई, तब राजा ने कहा, हे साधु ! तुम आगे जाओ। आगे सेना हो, उसके पीछे सेनापति जावें। जाकर शत्रुओं के साथ युद्ध करो। मैं भी स्नान करके आता हूँ। हे राम ! इस प्रकार कहकर राजा ने मन्त्री को भेजा और आप गङ्गा-जल से स्नानकर एक स्थान में जो अग्नि-कुण्ड था, उसके निकट जाकर हवन करने लगा। जब अग्नि प्रज्वलित हुई, तब राजा ने कहा-हे भगवन् ! इतना समय मुझे यथाशास्त्र आचरण करते व्यतीत हुआ है। मैंने अपनी प्रजा सुखी रखी, निष्कंटक राज्य किया, शत्रु को नष्ट करके सिंहासन के नीचे दबाया और आप सिंहासन पर बैठा हूँ। पातालवासी दैत्य भी मैंने जीत लिये हैं। दसों दिशाएँ अपने अधीन की हैं। सातों समुद्रों तक सब लोग मेरे भय से काँपते हैं और सब जगह मेरी कीर्ति फैल रही है। रत्नों से मेरे कोष भरे हुए हैं। वस्त्र, सेना, घोड़े और हाथी भी बहुत हैं। मैंने बड़े भोग भी भोगे और बड़े-बड़े दान भी किये हैं। सिद्ध और देवता भी मेरा यश गाते हैं। निदान सब ओर मेरा यश फैला है। अब शरीर भी बूढ़ा हुआ और क्षोभ भी बड़ा प्राप्त हुआ है, इससे अब मेरा जीने से मरना भला है।
हे भगवन् ! मैं तुमको शीश निवेदन करता हूँ, कृपा करके स्वीकार करो। यदि मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे चार रूप दो, जिनसे मैं चारों ओर जाऊँ। और जब जहाँ मुझे कुछ कष्ट हो, वहाँ दर्शन देना। हे राम ? इस प्रकार कहकर उसने खड्ग निकाला और अपना शीश काट-कर अग्नि में डाल दिया। तब धड़ भी आप ही अग्नि में जा पड़ा और शीश धड़ दोनों भस्म हो गये अथवा अग्नि ने भक्षण कर लिये। तब उसी की सी चार मूर्तियाँ कुण्ड से निकल आईं। वे उसी के से आकार, वस्त्र, भूषण, मुकुट, कवच और नाना प्रकार के शस्त्र धारण किये थीं। हे राम ! तब बड़े तेजस्वी वे चारों राजा विपश्चित् के रूप