योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1481, कुल 1734 में से
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प्रकट हुए। रथ, हाथी, घोड़े, प्यादे और चारों प्रकार की सेना भी प्रकट हुई। निदान चारों ओर शत्रुओं से बड़ा युद्ध होने लगा। नगर जलने लगे, बड़ा हाहाकार होने लगा। शूरवीर युद्ध में उछल-उछलकर लड़ने और प्राण त्यागते थे। बड़े रुधिर के प्रवाह चलते थे, खङ्ग और बरछी की वर्षा होती थी और अग्नि का अट्ट-अट्ट शब्द होता था—मानो समय बिना ही प्रलय होने लगा हो। निदान बड़ा युद्ध हुआ। जो सूरमा थे, वे युद्ध में मरने को जीना मानते थे और जीने को मरना जानते थे। ऐसा निश्चय करके वे युद्ध करते थे। और जो कायर थे, वे भाग जाते थे—जैसे गरुड़ के भय से सर्प भाग जाते हैं। पर सूरमा सम्मुख होकर लड़ते थे। इस प्रकार बड़ा युद्ध होने लगा। रुधिर की नदियाँ बह चलीं, जिनमें हाथी, घोड़े, रथ और सूरमा बहते जाते थे। बड़े-बड़े वृक्ष और नगर गिरते और बहते जाते थे। मांसभक्षण के लिए योगिनियाँ भी आकर उपस्थित हुईं। जो-जो युद्ध में मरता, उसे अप्सराएँ और विद्याधरियाँ विमान पर चढ़ाकर स्वर्ग को ले जाती थीं।
हे राम! इस प्रकार जब युद्ध हुआ, तब राजा विपश्चित् की सेना सब शून्य हो गई अर्थात् थोड़ी रह गई। राजा ने सुना कि सेना बहुत मारी गई है, इसलिए उसने रथ पर सवार होकर देखा कि सेना थोड़ी रह गई है। तब एक-एक राजा एक-एक ओर को गया अर्थात् चारों राजा चारों ओर गये और विचार करने लगे कि यह महागम्भीर सेना-रूपी समुद्र है। इसमें शव ही जल है, उनका धार ही तरङ्ग है और सूरमा ही मत्स्य है। इस समुद्र को मैं अगस्त्य की तरह पी जाऊँगा। ऐसा विचार-कर उसने उद्यम किया, क्योंकि शत्रु की विशेष सेना देखी—एक तो सेना आगे ही को चली आती थी, दूसरे बहुत सूरमा तेज से सेना को जलाते थे और तीसरे बहुत सेना आती थी। ऐसी तीन प्रकार की सेना-के राजा ने तीन उपाय किये। प्रथम उसने वायव्यास्त्र हाथ में लिया और परमात्मा ईश्वर को नमस्कार कर और मन्त्र पढ़कर पवन का अस्त्र चलाया। इससे अँधेरी छा गई और जितनी सेना आगे चली आती थी, वह सब उलटी उड़ने लगी। फिर उसने मेघ का अस्त्र चलाया।