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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

६७६

प्रकट हुए। रथ, हाथी, घोड़े, प्यादे और चारों प्रकार की सेना भी प्रकट हुई। निदान चारों ओर शत्रुओं से बड़ा युद्ध होने लगा। नगर जलने लगे, बड़ा हाहाकार होने लगा। शूरवीर युद्ध में उछल-उछलकर लड़ने और प्राण त्यागते थे। बड़े रुधिर के प्रवाह चलते थे, खङ्ग और बरछी की वर्षा होती थी और अग्नि का अट्ट-अट्ट शब्द होता था—मानो समय बिना ही प्रलय होने लगा हो। निदान बड़ा युद्ध हुआ। जो सूरमा थे, वे युद्ध में मरने को जीना मानते थे और जीने को मरना जानते थे। ऐसा निश्चय करके वे युद्ध करते थे। और जो कायर थे, वे भाग जाते थे—जैसे गरुड़ के भय से सर्प भाग जाते हैं। पर सूरमा सम्मुख होकर लड़ते थे। इस प्रकार बड़ा युद्ध होने लगा। रुधिर की नदियाँ बह चलीं, जिनमें हाथी, घोड़े, रथ और सूरमा बहते जाते थे। बड़े-बड़े वृक्ष और नगर गिरते और बहते जाते थे। मांसभक्षण के लिए योगिनियाँ भी आकर उपस्थित हुईं। जो-जो युद्ध में मरता, उसे अप्सराएँ और विद्याधरियाँ विमान पर चढ़ाकर स्वर्ग को ले जाती थीं।

हे राम! इस प्रकार जब युद्ध हुआ, तब राजा विपश्चित् की सेना सब शून्य हो गई अर्थात् थोड़ी रह गई। राजा ने सुना कि सेना बहुत मारी गई है, इसलिए उसने रथ पर सवार होकर देखा कि सेना थोड़ी रह गई है। तब एक-एक राजा एक-एक ओर को गया अर्थात् चारों राजा चारों ओर गये और विचार करने लगे कि यह महागम्भीर सेना-रूपी समुद्र है। इसमें शव ही जल है, उनका धार ही तरङ्ग है और सूरमा ही मत्स्य है। इस समुद्र को मैं अगस्त्य की तरह पी जाऊँगा। ऐसा विचार-कर उसने उद्यम किया, क्योंकि शत्रु की विशेष सेना देखी—एक तो सेना आगे ही को चली आती थी, दूसरे बहुत सूरमा तेज से सेना को जलाते थे और तीसरे बहुत सेना आती थी। ऐसी तीन प्रकार की सेना-के राजा ने तीन उपाय किये। प्रथम उसने वायव्यास्त्र हाथ में लिया और परमात्मा ईश्वर को नमस्कार कर और मन्त्र पढ़कर पवन का अस्त्र चलाया। इससे अँधेरी छा गई और जितनी सेना आगे चली आती थी, वह सब उलटी उड़ने लगी। फिर उसने मेघ का अस्त्र चलाया।

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६७७

तब वर्षा होने लगी और उससे जो तेज उनकी सेना को जला रहा था, वह शान्त हो गया । उसके बाद उसने शिव का अस्त्र चलाया । उसमें से प्रथम शस्त्रां की नदी चली, फिर त्रिशूलों की नदी चली, फिर चक्रों की नदी चली, फिर वज्र की नदी चली, बरछी की नदी चली, बिजली की नदी चली और अग्नि इत्यादिक की नदियाँ चलीं । दूसरे शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा हुई । जब इस प्रकार नदियाँ बह चलीं, तब जो कुछ सेना सम्मुख आती थी, वह मृतक हो गई । जैसे कमलिनी काटी जाती है, वैसे ही शूरवीर काटे गये । कोई पहाड़ों की कन्दराओं में गिरे और वहाँ से उड़कर समुद्र में जा पड़े और कोई सुमेरु की कन्द-राओं में जाकर छिपे और समुद्र में जाकर डूबे—जैसे अज्ञानी विषयों में डूबते हैं इस प्रकार दोनों ओर से सेना शून्य हुई और चारों दिशाओं की सेना नष्ट हो गई । नीच से नीच देशों के और पहाड़ की कन्दराओं के रहनेवाले सब बहते जाते थे ।

हे राम ! कई शस्त्रों से और कई आँधी से उड़े, वे सब क्षेत्रों में जा पड़े । कई वन में और कई नीचे देशों में गिरे । जो पुण्यवान् थे, वे उत्तम क्षेत्र में जा पड़े और मृतक होकर स्वर्ग को गये, और पापी नीच देशों में जा पड़े, उसमे दुर्गति को प्राप्त हुए । कई पिशाच हुए, कितनों को विद्याधरियाँ ले गईं और कई ऋषीश्वरों के स्थानों में जा पड़े । उनकी उन्होंने रक्षा की । इसी प्रकार कितने बाणों से छेदे हुए नष्ट हुए और कई रुधिर की नदियों में बहते समुद्र की ओर चले गये । हे राम ! जब सब सेना नष्ट हो गई, तब आकाश शुद्ध हुआ । जैसे ज्ञानी का मन निर्मल होता है, वैसे ही आकाश अधिक क्षोभ से रहित हुआ । जब सब सेना समाप्त हो गई, तब चारों राजा आगे चले । हे राम ! निदान चारों विपश्चित् चारों दिशाओं के समुद्रों तक जा पहुँचे । तब उन्होंने क्या देखा कि बड़े गहरे समुद्र हैं । कहीं रत्न, कहीं हीरा, मोती इत्यादि चमकते हैं । बड़े गहरे समुद्र में बड़े मच्छ और तरङ्ग उछलते हैं । रेती में नाना प्रकार के लौंग, इलायची, चन्दन इत्यादि के वृक्ष समुद्र तट पर जाकर देखे ।

इति नि० विपश्चित्समुद्रप्रासिनांम द्विशताधिकाष्टादशसर्गः ॥ २१ ॥

६७८ | ✹ योगवाशिष्ठ ✹

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार राजा विपश्चित् समुद्र के पार जा पहुँचा, तब उसके साथ जो मन्त्री पहुँचे थे, उन्होंने राजा को सब स्थान दिखाये, जो बड़े गम्भीर थे । बड़े गम्भीर समुद्र, जो पृथ्वी को बहुँफेर घेरे थे, वे भी दिखाये और बड़े-बड़े तमालवृक्ष, बावलियाँ, पर्वतों की कन्दरा, तालाब और नाना प्रकार के स्थान दिखाये । ऐसे स्थान राजा को मन्त्री ने दिखाकर कहा, हे राजन् ! तीन पदार्थ बड़े अनर्थ और परमसार के कारण हैं—एक तो लक्ष्मी, दूसरा आरोग्य और तीसरा यौवनावस्था । जो पापी जीव हैं वे लक्ष्मी को पाप में लगाते हैं, देह के आरोग्य से विषयों का सेवन करते हैं और यौवन अवस्था में भी सुकृत नहीं करते, पाप ही करते हैं और जो पुण्यवान् हैं, वे इन्हें मोक्ष में लगाते हैं अर्थात् लक्ष्मी से यज्ञादिक शुभकर्म और आरोग्य से परमार्थ साधते हैं और यौवन अवस्था में भी शुभ-कर्म करते हैं—पाप नहीं करते ।

हे राम ! जैसे समुद्र और पर्वत के किसी स्थान में रत्न और किसी स्थान में घोंघे होते हैं, वैसे ही संसार-समुद्र में कहीं रत्नों की नाईं ज्ञानवान् होते हैं और कहीं अज्ञानारूपी घोंघे होते हैं । हे राजन् ! यह समुद्र मानो जीवन्मुक्त है, क्योंकि जल में भी मर्यादा नहीं छोड़ता और रागद्वेष से रहित है । किसी स्थान में दैत्य रहते हैं, कहीं पंखों से युक्त पर्वत, कहीं वड़वाग्नि और कहीं रत्न हैं, परन्तु समुद्र को न किसी स्थान में राग है, न द्वेष । जैसे ज्ञानवान् को किसी में रागद्वेष नहीं होता, परन्तु सबमें ज्ञानवान् कोई विरला ही होता है । जैसे जिस सीपी और बाँस से मोती निकलते हैं, वे विरले ही होते हैं, वैसे ही तत्त्वदर्शी ज्ञानवान् कोई विरला होता है । हे राम ! यहाँ की सम्पूर्ण रचना देखो कि कैसे पर्वत हैं, जिनके किसी स्थान में पक्षी रहते हैं, किसी स्थान में विद्याधर रहते हैं, कहीं देवियाँ विलास करती हैं, कहीं योगी रहते हैं और कहीं ऋषीश्वर, मुनीश्वर, कहीं ब्रह्मचारी, वैरागी आदि पुरुष रहते हैं । यह द्वीप है और सात समुद्र हैं जिनके बड़े तरङ्ग उछलते हैं, और पर्वत का कौतुक, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, तारे,

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६७६

ऋषि, मुनि आदि को देखो । और देखो कि सबको आकाश स्थान दे रहा है, पर महापुरुष की नाईं आप सदा असंग रहता है । वह शुभ अशुभ दोनों के लिए समान है । स्वर्गादिक शुभस्थान हैं और चाण्डाल, पापी आदि के निवासस्थान नरक अपवित्र हैं, परन्तु आकाश दोनों के लिए समान है—असंग होने के कारण निर्विकार है । जैसे ज्ञानी का मन सब स्थानों से निर्लेप होता है, वैसे ही आकाश सब पदार्थों से असंग, न्यारा है और महात्मा पुरुष की नाईं सर्वव्यापी है । हे आकाश ! तू प्रकाशरूप है, तुझमें अन्धकार दिखता है—यह आश्चर्य है । हे आकाश ! तू सबका आधार है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूर्ख हैं । दिन को तुझमें श्वेतता भासित होती है, रात्रि को अन्धकार भासित होता है और संध्याकाल में तुझमें लाली चमकती है; पर तू तीनों से न्यारा है । ये तीनों राजसी, तामसी और सात्त्विकी गुण हैं; पर तू इनके होते भी असंग है । हे आकाश ! तू निर्मल है और तम तुझमें दिखता है, परन्तु तू सदा ज्यों का त्यों है । यह अनित्यरूप है । चन्द्रमा तुझमें शीतलता करता है, सूर्य दाहक होते हैं । तीर्थ आदिक पवित्र स्थान हैं और पापमय अपवित्र स्थान हैं; परन्तु तू सबमें एक समान ज्यों का त्यों रहता है । वृक्षों को बढ़ने और ऊँचे होने की सत्ता तू ही देता है । अपनी महिमा को तू आप ही जाने । और कोई तेरी महिमा जान नहीं सकता । तू निष्किञ्चन अद्वैत है; सबको धारण कर रहा है । सबका प्रयोजन तुझसे ही सिद्ध होता है । जल नीचे को जाता है, पर तू सबसे ऊँचा और व्यापक विभु है । अनेक पदार्थ तुझमें उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, पर तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जैसे अग्नि से चिनगारी उपजती और अग्नि ही में लीन हो जाती है, वैसे ही तुझमें अनन्त जगत् उपजते और लीन होते हैं और तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूढ़ हैं ।

हे राजन् ! ऐसा आकाश कौन है, यह भी सुनो । ऐसा आकाश आत्मा है, जो चैतन्य आकाश है, और जिसमें अनन्त जगत् उत्पन्न और लीन हो जाते हैं । उसको जो शून्य कहते हैं, वे महामूर्ख हैं जो

६८० ✻ योगवासिष्ठ ✻

सबका अधिष्ठान है, सबको धारण कर रहा है और सदा निःसंग है ऐसे चिदाकाश को नमस्कार है । हे राजन् ! यह आश्चर्य है कि वह सदा एकरस है, पर उसमें नाना तरङ्ग भासित होते हैं—यही माया है । हे राजन् ! एक विद्याधरी और विद्याधर थे । उनके मन्दिर में एक ऋषि आ पहुँचा, पर उस विद्याधर ने उनका आदर-सत्कार नहीं किया । इससे ऋषीश्वर ने शाप दिया कि तू बारह वर्ष तक वृक्ष होगा । निदान वह विद्याधर वृक्ष हो गया । पर अब हम आये हैं, हमारे देखते ही वह शाप से मुक्त हो वृक्षभाव को त्यागकर फिर विद्याधर हुआ है । यह ईश्वर की माया है कि कभी कुछ हो जाता है, और कभी कुछ हो जाता है । हे मेघ ! तू धन्य है ! तेरी चेष्टा भी सुन्दर है । तीर्थों में सदा तेरी स्थिति है । तू सबमे ऊँचे बिराजता है और सब आकार तेरा भला दिखता है, परन्तु एक तुझमें नीचता है कि ओले की वर्षा करता है जिसमे खेती नष्ट हो जाती और फिर नहीं उगती । वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा देखने पर की सुन्दर है और हृदय मूर्ख है, उनकी संगति बुरी है । ज्ञानवान् की चेष्टा देखने में भला नहीं, तो भी उसकी संगति कल्याण करती है । हे राजन् ! सबमे नीच कुत्ता है; क्योंकि जो कोई उसके निकट आता है, उसे काट लेता है । वह घर-घर में भटकता फिरता और मलिन स्थानों में जाता है । वैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषों की निन्दा करता है, पर मन में तृष्णा रखता है । और विषयरूपी मलिन स्थानों में गिरता है । वह मूर्ख मनुष्य मानों कुत्ता है, बल्कि कुत्ते से भी नीच है । ब्रह्मा ने सम्पूर्ण जगत् रचा है, परन्तु उसमें कुत्ता सबसे नीच है । पर कुत्ता क्या समझता है, सो सुनो ।

एक पुरुष ने कुत्ते से प्रश्न किया कि हे कुत्ते ! तुझसे कोई नीच है, या नहीं ? तब कुत्ते ने कहा कि मुझसे भी नीच मूर्ख मनुष्य है, उससे में श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि प्रथम तो में स्पृश्य हूँ, दूसरे जिसका भोजन खाता हूँ, उसकी रक्षा करता हूँ और उसके द्वारे बैठा रहता हूँ ; पर मूर्ख से ये तीनों कार्य नहीं होते । इससे में उससे श्रेष्ठ हूँ । मूर्ख को देहाभिमान है, इससे वह कुत्ते से भी नीच है । हे राजन् ! परम

  • निर्वाण प्रकरण * ६८१

अनर्थ का कारण देहाभिमान है। देहाभिमान से जीव परम आपदा को प्राप्त होता है। वह मूर्ख नहीं, मानो कौआ है, जो सबसे ऊँची टहनी पर बैठकर काँ-काँ करता है। हे राजन् ! कमल की खान तालाब के निकट एक कौआ जा निकला तो क्या देखा कि भौंरे बैठे कमल की सुगन्ध लेते हैं। उनको देखकर वह हँसने लगा और काँ-काँ शब्द करने लगा। तब उसको देख भौंरे हँसे कि यह कमल की सुगन्ध क्या जाने। वैसे ही जिज्ञासु भौंरे के समान हैं, जो परमार्थरूपी सुगन्ध लेते हैं। जो अज्ञानीरूपी कौए हैं, वे परमार्थरूपी सुगन्ध को नहीं जानते। इस कारण मूर्ख को देखकर जिज्ञासु हँसते हैं, जो आत्मरूपी सुगन्ध को नहीं जानता। अरे कौए ! तू क्यों हंस की बराबरी करता है ? हंस तो मोती चुगनेवाले हैं और तू नीच स्थानों में रहनेवाला है। मन्त्री ने कहा, हे कोयल ! तुम कमल को देखकर क्या प्रसन्न होती हो ? प्रसन्न तो तब हो, जब वसन्तऋतु हो; पर यह तो वर्षाकाल है—ये फूल ओलों से नष्ट हो जावेंगे।

हे राजन् ! कोयलरूपी जो जिज्ञासु हैं, उनको यह उपदेश है। हे जिज्ञासु ! जो सुन्दर पदार्थ तुमको दिखते हैं, उनको देखकर तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? प्रसन्न तो तब हो, जो ये सत्य हों, पर ये तो मिथ्या हैं और अविद्या के रचे हैं। तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? अपनी बिरादरी में जाकर बैठो और अज्ञानी का संग छोड़ दो। जैसे कौआ हंसों में जा बैठता तो भी उसका चित्त गन्दगी खाने में लगा होता है और हंस के आहार मोतियों की ओर देखता भी नहीं, वैसे ही अज्ञानी जीव कभी सन्तों की संगति में जा बैठता है, तो भी उसका चित्त विषयों की ओर ही घूमता रहता है, स्थिर नहीं होता। जैसे कोयल का बच्चा कौए को माता-पिता जानकर उनमें जा बैठता है, तब उनकी संगति से वह भी गन्दगी खानेवाला हो जाता है। इससे कोयल उसको वर्जन करती है कि अरे बेटा ! तू कौए की संगति में मत बैठ, अपने कुल में बैठ; क्योंकि तेरा भी नीच आहार हो जायगा। वैसे ही जिज्ञासु जो अज्ञानी का संग करता है, तो उसके अनुसार उसको भी विषयों

६८२ * योगवाशिष्ठ *

की तृष्णा उत्पन्न होती है। तब ज्ञानी उसको वर्जन करते हैं कि रे जिज्ञासु ! तू मूर्ख अज्ञानियों में मत बैठ। अपना कुल जो सन्त जन हैं, उनमें बैठ। जैसे कोयल के बच्चे को कौए सुख देनेवाले नहीं होते, वैसे ही मूर्ख तुझको सुख देनेवाले नहीं होंगे। मन्त्री फिर कहने लगा—

अरे चील ! तू क्यों हंस की बराबरी करती है ? तू भी बहुत ऊँचे उड़ती है; परन्तु तुझमें हंस का कोई गुण नहीं है। जब तू मांस को पृथ्वी पर देखती है, तब वहाँ गिर पड़ती है, पर हंस नहीं गिरते। वैसे ही जो मूर्ख हैं, वे सन्तों की तरह ऊँचे कर्म भी करते हैं, परन्तु विषयों को देखकर गिरते हैं; पर संत नहीं गिरते। तो मूर्ख सन्तों की बराबरी कैसे करें ? फिर मन्त्री ने कहा, हे बगले ! तू हंस की बराबरी क्या करता है ? अपने पाखण्ड को छिपाकर तू अपने को हंस की नाईं उज्ज्वल दिखाता है, पर जब मछली निकलती है, तब तू खा लेता है। यही तुझ में अवगुण है। हंस मानसरोवर के मोती चुगनेवाले हैं, और तू गढ़े में से तृष्णा करके मछली खानेवाला है। तू क्यों अपने को हंस मानता है ? वैसे ही अज्ञानी जीव विषयों की तृष्णा करते हैं और ज्ञानवान् विवेक से तृप्त हैं। उनकी बराबरी अज्ञानी क्यों करते हैं ?

हे राजन् ! जो हंस हैं, वे सदा अपनी महिमा में रहते हैं और अपना जो मोती का आहार है, उसको करते हैं; दूसरे किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करते। जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर शोभा पाते हैं—चन्द्रमा बिना शोभा नहीं पाते, वैसे ही बुद्धि भी तब शोभा पाती है, जब ज्ञान का उदय होता है—आत्मज्ञान के बिना बुद्धि शोभा नहीं पाती। बड़े-बड़े सुगन्धवाले वृक्षों का माहात्म्य भौंरे ही जानते हैं, और जीव नहीं जानते। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! समुद्र के किनारे पर राजा विपश्चित् से मन्त्रियों ने ऐसे कहकर फिर कहा, हे राजन् ! अब पृथ्वीनगर के मण्डलेश्वर स्थापित करो। हे राम ! जब मन्त्री ने ऐसे कहा, तब सब दिशाओं के मण्डलेश्वर स्थापित किये गये। तब चारों राजा, जो अपनी-अपनी दिशा के समुद्र पर बैठे थे, उन्होंने अपने-अपने मन्त्री से कहा, हे साधु ! अब हमने समुद्रपर्यन्त दिग्विजय

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६८३

की है और हमारी जय हुई है। अब चैत्य जो दृश्य है, उस दृश्य विभूति को देखो। समुद्र के पार द्वीप है, फिर उस समुद्र के पार और द्वीप है; फिर समुद्र है और फिर द्वीप है। इसी प्रकार सात द्वीप और सात समुद्र हैं, पर उनके आगे क्या है ? इस प्रकार सब दृश्य देखने की इच्छा करके उन्होंने अग्निदेवता का आवाहन किया। उनकी दृढ़भावना से अग्नि-देवता सम्मुख आकर स्थित हुए और बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुमको कामना हो, सो माँगो। राजा ने कहा, हे भगवन् ! ईश्वर की माया में पाञ्चभौतिक दृश्य में जो प्राणी हैं, उनको देखने की मेरी इच्छा है। उसे पूर्ण करो। हे देव ! हम इसी शरीर से दृश्य देखने जावें, और जब यह शरीर न चल सके, तब मन्त्रसत्ता में जावें। पर जहाँ मन्त्र की भी गति नहीं, वहाँ सिद्धि में जावें। और जहाँ सिद्धि की भी गति नहीं, वहाँ मन के वेग में जावें और मृतक भी न हों। यह वर हमको दो।

हे राम ! जब इस प्रकार राजा ने कहा, तब अग्नि ने कहा कि ऐसा ही होगा। यों कहकर अग्नि अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लय हो जाती है, वैसे ही अग्नि अन्तर्धान हो गये। जब राजा विपश्चित् वर पाकर चलने को उद्यत हुआ, तब जितने मन्त्री और मित्र थे, वे रोने लगे और बोले, हे राजन् ! तुमने यह क्या निश्चय किया है ? ईश्वर की माया का अन्त किसी ने नहीं पाया, इसमें तुम अपने स्थान को चलो। यह क्या तुमने निश्चय किया है। हे राम ! इस प्रकार मन्त्री कहते रहे, परन्तु राजा ने उनको आज्ञा देकर एक-एक दिशा के समुद्र में प्रवेश किया। यों चारों दिशाओं में चारों राजाओं ने गमन किया। तब जो बड़े-बड़े शक्तिशाली मन्त्री थे, वे साथ ही चले। तब राजा मन्त्रशक्ति से समुद्र को नाँघ गया। कहीं पृथ्वी पर चला और कहीं ऊँचे चला। इसी प्रकार और द्वीप में जो निकला। तब बड़ा समुद्र आया उसमें प्रवेश कर गया। उसमें बड़े तरंग उछलते थे और उसका सौ योजन विस्तार था। कभी नीचे और कभी ऊपर को जाते थे। हे राम ! ऐसे तरंग उछलते, मानो पर्वत उछ-लते हों। जब वे ऊपर को उछलते, तब स्वर्ग तक उछलने लगते, और

६८४ ❄ योगवाशिष्ठ ❄

जब नीचे जाते, तब पातालपर्यन्त चलते जान पड़ते । जैसे पानी में तृण फिरता है, वैसे ही राजा फिरे । इस प्रकार कष्ट से रहित राजा समुद्र और दिशा को नाँघ गया, परन्तु बीच में जो वृत्तान्त हुआ सो सुनो । क्षीरसमुद्र में एक मच्छ रहता था, जिसको सब देवता प्रणाम करते थे और जो विष्णु भगवान के मच्छ अवतार के परिवार में था । जब राजा ने क्षीरसमुद्र में प्रवेश किया, तब राजा को उसने मुख में डाल लिया । पर राजा मन्त्र के बल से उसके मुख से निकल गया । आगे फिर एक मच्छ मिला, उसने भी उसे मुख में डाल लिया । पर उसमें भी वह निकल गया ।

फिर आगे पिशाचों का देश था । वहाँ राजा को पिशाच ने काम में मोहित किया । फिर उसने दक्षप्रजापति की कुछ अवज्ञा की, जिससे उन्होंने शाप दिया और राजा वृक्ष हो गया । निदान कुछ काल वृक्ष रहकर फिर छूटा तो एक देश में मेंढक हुआ और सौ वर्ष तक खाई में पड़ा रहा । फिर उसमें छूटकर मनुष्य हुआ । तब किसी सिद्ध के शाप से शिला हो गया और सौ वर्ष तक शिला ही रहा । उसके उपरान्त अग्नि देवता ने शिला की योनि से छुड़ाया तो फिर मनुष्य हुआ । तब उस सिद्ध को आश्चर्य हुआ कि मेरे शाप को दूर करके यह मनुष्य क्योंकर हुआ—यह तो मुझसे भी बड़ा सिद्ध है । ऐसे जानकर उसने उसके साथ मैत्री की । इसी प्रकार दूसरे समुद्रों को भी वह नाँघता गया । क्षीरसमुद्र, खारी समुद्र और इक्षु रस के समुद्र को नाँघकर द्वीपों को नाँघता गया । फिर एक अप्सरा पर मोहित हुआ और बहुत काल में वहाँ से छूटा । फिर एक देश में पक्षी हुआ । बहुत काल तक पक्षी रहकर छूटा तो एक गोपी पिशाचिनी ने बैल बनाकर उसे रक्खा । तब दूसरे विपश्चित् ने बैल विपश्चित् को उपदेश करके जगाया । निदान हे राम ! चारों दिशाओं में चारों विपश्चित् घूमते फिरे । दक्षिण दिशा का राजा तो पिशाचिनी से मोहित हुआ, इससे उसने बहुत जन्म पाये, और पूर्व का राजा बहता हुआ मच्छ के मुख में चला गया । उसने निकाल दिया, इससे उसने वह अवस्था देखी । उत्तर दिशा का

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

६८५

जो राजा हुआ, उसने वही अवस्था देखी । पश्चिम दिशा का हेमचू पक्षी की पीठ पर पहुँचा । उसने उसे कुशद्वीप में डाल दिया, इससे उसने भी अनेक अवस्था पाई । हे राम ! एक-एक विपश्चित् ने भिन्न- भिन्न योनियों और अवस्थाओं का अनुभव किया ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि विपश्चित् एक ही था और उन चारों की संवित् भी एक ही थी, आकार भी एक ही था तो भिन्न- भिन्न रुचि कैसे हुई, जो एक पक्षी हुआ, दूसरा वृक्ष हुआ और वे वासना के अनुसार अनेक शरीर पाते फिरे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? उनकी संवित् एक ही थी, परन्तु भ्रम से भिन्नता हो जाती है । जैसे किसी पुरुष को स्वप्न होता है तो उसमें वह पशु-पक्षी हो जाता है और भिन्न-भिन्न रुचि भी हो जाती है, वैसे ही उनकी भी भिन्न-भिन्न रुचि हो गईं । जैसे देखो कि शरीर तो एक ही होता है, पर उसमें नेत्र, श्रवण, नासिका, जिह्वा और त्वचा की रुचि भिन्न-भिन्न होती है और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती हैं, सो एक ही शरीर में अनेकता भासित होती है, वैसे ही उनकी एक ही संवित् थी, परन्तु संकल्प भिन्न-भिन्न हो गया था, इससे मन के फुरने से एक देह में अनेक भासित हुई । जैसे एक ही योगेश्वर इच्छा करके और और शरीर धर लेता है और एक से अनेक हो जाता है । एक सहस्र- बाहु अर्जुन था । वह किमी भुजा से युद्ध करता था, किमी भुजा से दान करता था और किमी एक मे लेता-देता था । इमी प्रकार मब भुजाओं से चेष्टा करता था—वे भी भिन्न-भिन्न हुए ? एक ही शरीर में भिन्न-भिन्न चेष्टा होती है । जैसे विष्णु भगवान् कहीं दैत्यों के साथ युद्ध और कहीं कर्म करते हैं, कहीं लीला करते हैं और कहीं शयन करते हैं, सो संवित् तो एकही है, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न होती हैं, वैसे ही उनकी संवित् में अनेक रुचि हुई तो इसमें क्या आश्चर्य है ? हे राम ! इस प्रकार उन्होंने जन्म से जन्मान्तर को अविद्याकृत संसार में देखा ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे तो बोधवान् विपश्चित् थे और बोधवान् जन्म नहीं पाता, फिर उनका किस प्रकार जन्म हुआ ?

६८६

❊ योगवाशिष्ठ ❊

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वे विपश्चित् बोधवान् न थे, परन्तु बोध के निकट धारणा अभ्यासवाले थे। जो वे ज्ञानवान् होते तो दृश्यभ्रम देखने की इच्छा क्यों करते ? इससे वे ज्ञानवान् न थे—धारणा के अभ्यासी थे, अतः समुद्र को नाँघ गये और मच्छ के उदर से बलपूर्वक निकल आये। वह प्रसिद्ध योगशक्ति है। ज्ञान का लक्षण स्वसंवेद्य है, परसंवेद्य नहीं। राजा विपश्चित् ज्ञानवान् न थे, इस कारण देश-देशान्तर में घूमते रहे और ज्ञान बिना अविद्याकृत संसार में जन्म-मरण में भटकते रहे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञानवान् योगीश्वरों को भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों कालों का ज्ञान कैसे होता है ? ज्ञानी योगी एक देश में स्थित हुआ सर्वत्र कर्मों को कैसे करता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानी की बात, यह मैंने तुमसे कही है। जितना जगत् है, सब चिदाकाशस्वरूप है। जिनको ऐसी सत्ता का ज्ञान हुआ है, वे महापुरुष हैं। जैसे स्वप्न में कोई पुरुष जागे तो स्वप्न की सब सृष्टि उसे अपना ही स्वरूप लगती है और उसमें वह नहीं बँधता। हे राम ! यह सब नानात्व भासता है, सो नाना नहीं और अनाना भी नहीं, केवल आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने आपमें स्थित है। ये तीनों काल भी ज्ञानवान् को ब्रह्मरूप हो जाते हैं, सब जगत् भी ब्रह्मरूप हो जाता है और उसका द्वैतभाव मिट जाता है। ऐसे ज्ञानवान् को ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे अमृत को जो पीता है, वही उसके स्वाद को जानता है, और कोई ज्ञान नहीं सकता। हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तो तुल्य दिखती है, परन्तु ज्ञानी का निश्चय कुछ और है और अज्ञानी का निश्चय और। जिसका हृदय शान्त हुआ है, वह ज्ञानवान् है और जिसका हृदय त्रिताप से जलता है, वह अज्ञानी है। वह बँधा हुआ है। ज्ञानवान् का शरीर चूर्ण हो अथवा उसे राज्य प्राप्त हो तो भी उसको रागद्वेष नहीं उपजता। वह सदा ज्यों का त्यों एकरस रहता है। वह जीवन्मुक्त है, परन्तु उसका यह लक्षण कोई नहीं जान सकता, वह

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ६८७

आप ही जानता है। शरीर को दुःख और सुख भी प्राप्त होता है; वह मरता और रुदन भी करता है, हँसता, लेता और देता भी है और इस प्रकार की सब चेष्टा करता दिखता है, पर वह अपने निश्चय में न दुःखी होता है, न सुखी होता है, न देता है और न लेता है, सदा ज्यों का त्यों रहता है।

हे राम ! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दिखता है, परन्तु हृदय से उसका यही निश्चय होता है। वह अद्भुत पद में स्थित रहता है, कभी उससे नहीं गिरता। उसका परम उदितरूप होता है। वह राग सहित भी दिखता है। पर हृदय से राग किसी में नहीं करता। क्रोध करता भी दिखता है, पर उसको क्रोध कभी नहीं होता। जैसे आकाश शुभ पदार्थ को धारण करता है और धुएँ और बादल से ढका भी दिखता है, पर किसी का स्पर्श नहीं करता; वैसे ही ज्ञानवानों में सब क्रिया दिखती है, पर अपने निश्चय में उसे कोई स्पर्श नहीं करती। जैसे नट स्वाँग ले आता है और चेष्टा करता दीखता है, पर हृदय से अपने नटत्व भाव में उसे निश्चय होता है, वैसे ही ज्ञानवान् को भी सब क्रियाओं में अपने आत्मभाव का निश्चय होता है। जैसे जिसको स्वप्न आता है, वह यदि स्वप्न भी अपना पूर्वरूप स्मरण रखता है तो स्वप्न के पदार्थ में बर्तता है, तो भी स्वप्न के सुख में अपने को सुखी और दुख में दुखी नहीं मानता—सब सृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् को स्वरूप के निश्चय से सुख-दुःख का क्षोभ नहीं होता। जो ऐसे पुरुष हैं, उनको दुःख से कष्ट होता है ? जैसी उनकी इच्छा होती है, वैसे ही सिद्धि होकर भासती है। हे राम ! यह जितनी सृष्टि है, सब चित्सत्ता में है। योगीश्वर पुरुष उसी में स्थित होकर जहाँ पहुँचना चाहते हैं, वहाँ अन्तवाहक मे जा पहुँचते हैं। तीनों काल उनको विद्यमान होते हैं। साधन कुछ नहीं, परन्तु ज्ञानी अवश्य किसी काम के लिए यत्न नहीं करते—जैसा प्राप्त होता है, उसी में प्रसन्न रहते हैं। हे राम ! एक समय ब्रह्माजी ऊर्ध्वमुख से सामवेद का गायन करते थे। उन्होंने सदाशिव

६८८ ✲ योगवाशिष्ठ ✲

का मान न किया। तब सदाशिव ने अपने नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ शीश काट डाला। परन्तु ब्रह्माजी के मन में कुछ क्रोध न फुरा। उन्होंने विचारा कि मैं चिदाकाश हूँ, सो अब भी चिदाकाश हूँ, मेरा तो कुछ गया नहीं। सिर से मुझे क्या प्रयोजन है? न कुछ हानि है और न कुछ लाभ।

हे राम! इस प्रकार सब विश्व रचनेवाले ब्रह्माजी का सिर कटा। जो वे फिर सिर लगा लेते तो समर्थ थे, पर उनको सिर लगाने का कुछ प्रयोजन न था और न लगाने में कुछ हानि भी न थी। उनका भी निश्चय सदा आत्मपद में है, इस कारण उन्हें कुछ क्षोभ न हुआ। हे राम! काम के सदृश और कोई विकार नहीं है। जो सदाशिव पार्वती को वायं अङ्ग में धारण करते हैं, उन्होंने ही जिस कामदेव के पाँच बाण चलने से सब विश्व मोहित होता है, उसी काम को भस्म कर डाला। तो क्या स्त्री को वह छोड़ नहीं सकते थे? पर उनको राग-द्वेष कुछ नहीं है, इस कारण त्याग नहीं करते। त्यागने में उन्हें कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं होती और रखने में कुछ अनर्थ नहीं होता। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य होता है, उसको करते हैं, खेद नहीं मानते, इसी से वे जीवन्मुक्त हैं। विष्णुजी सदा विक्षेप में रहते हैं। आप भी कर्म करते हैं और लोगों से भी कराते हैं। शरीर धारण करते हैं और त्याग भी देते हैं। इत्यादि क्षोभ वह सहते हैं। वह इसे त्यागने को समर्थ भी हैं, परन्तु त्यागने में उनका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और करने में कुछ हानि नहीं होती। उनको लोग कई गुणों से युक्त सगुण जानते हैं, मुझको तो उनका शुद्ध चिदाकाशरूप भासित होता है। मूर्ख कहते हैं कि विष्णु श्यामसुन्दर हैं, परन्तु वे शुद्ध चिदाकाशरूप हैं और उनको सदा शुद्धस्वरूप में अहंप्रत्यय है।

आकाशमार्ग में जो सूर्य स्थित हैं, वे कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं। तो क्या उनमें स्थिर होने की सामर्थ्य नहीं है? है, परन्तु चलना और ठहरना, दोनों उनके लिए समान हैं। वह खेद से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य करते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। जीवन्मुक्त चन्द्रमा

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६८६

भी हैं, वह घटते-घटते सूक्ष्म होते दिखते हैं और कभी बढ़ते जाते हैं। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्ष उनमें होते हैं। वह केवल रात्रि को प्रकाश करते हैं। तो क्या वे अपनी क्रिया को त्याग नहीं सकते? त्याग सकते हैं; परन्तु क्षोभ से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य में विचरते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। अग्नि सदा दौड़ता रहता है और यज्ञ और होम की आहुतियाँ भोजन करने को सब ओर जाता है। तो क्या उसको गृह में बैठने की सामर्थ्य नहीं है? अवश्य है, परन्तु जो कुछ अपना आचार है, उसको वह नहीं त्यागता, क्योंकि ठहरने में उसका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और चलने में कुछ हानि नहीं होती—दोनों में वह तुल्यरूप से जीवन्मुक्त है। हे राम! बृहस्पति और शुक्र को बड़ा क्षोभ रहता है। बृहस्पति देवताओं की जय के लिए यत्न करते हैं और शुक्र दैत्यों की जय के लिए यत्न करते रहते हैं। तो क्या इनको त्यागने की सामर्थ्य नहीं है? परन्तु दोनों इनको तुल्य हैं, इस कारण खेद से रहित होकर अपने कार्य में लगे रहते हैं, इससे जीवन्मुक्त पुरुष हैं। हे राम! राज्य में बड़े क्षोभ होते हैं, पर राजा जनक आनन्दसहित राज्य करते हैं और जीवन्मुक्त हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्तासुर, और मुर आदि दैत्य जीवन्मुक्त हुए हैं। वे समताभाव को लिये, खेद से रहित नाना प्रकार की चेष्टा करते और हृदय से शांत और जीवन्मुक्त रहे हैं। राजा नल, दिलीप और मान्धाता आदि ने भी समताभाव से राज्य किया है। वे भी जीवन्मुक्त हैं। ऐसे ही अनेक राजा हुए हैं। उनमें रागवान् भी देखे गये हैं, परन्तु हृदय में वे रागद्वेष से रहित शान्ति चित्त थे।

हे राम! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है, परन्तु भेद इतना ही है कि ज्ञानी का चित्त शान्त और अज्ञानी का चित्त क्षोभ में होता है। अज्ञानी इष्ट की प्राप्ति में हर्षवान् होता है और अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करता है, और ग्रहण-त्याग की इच्छा में जलता है, क्योंकि उसको संसार सत्य भासित होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसके भीतर न राग है, न द्वेष। स्वाभाविक शरीर की जो प्रारब्ध होती है, उसमें उसे कुछ भी अपना अभिमान नहीं होता। उसके निश्चय में

६६० योगवाशिष्ठ

सब आकाशरूप है। जगत् कुछ बना नहीं-भ्रममात्र है। जैसे आकाश में नीलिमा भ्रममात्र है, और दूर नहीं होती, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है, परन्तु है नहीं। जैसे आकाश में नाना प्रकार के तरुवर दिखें, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। जैसे काठ की पुतली काठरूप होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रमरूप है। जो कुछ भ्रम में भिन्न भासता है, वह सब भविष्यन्नगर में असत्य है और जो कुछ तुम्हें देख पड़ता है, वह कुछ नहीं, केवल मन कल्पना से रहित, शुद्ध-संविद्, जड़ता बिना, मुक्तस्वभाव, एक, अद्वैत आत्मसत्ता स्थित है। वह केवल आकाशरूप है। उसमें जगत् भी वही रूप है। वह पाषाण की शिला सदृश ठोस और मौन है। तुम भी उसी रूप में स्थित हो जाओ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनन्नाम द्विशताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ २१६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! उस राजा विपश्चित् ने फिर क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उनकी दशा हुई, सो सुनो। पश्चिम दिशा का विपश्चित् वन में विचरता फिरता था कि एक मत्त हाथी के आगे जा पड़ा और उसने उसे पहाड़ की कन्दरा में मार डाला। दूसरे विपश्चित् को राक्षस ले गया और बड़वाग्नि में डाल दिया। वहाँ अग्नि ने उसे भक्षण कर लिया। तीसरे विपश्चित् को एक विद्याधर स्वर्ग में ले गया। उसने वहाँ इन्द्र का मान न किया, इसलिए उसको इन्द्र ने शाप दिया और यह भस्म हो गया। इसी प्रकार चौथा भी मरा। उसके एक मच्छ ने आठ टुकड़े कर डाले। जैसे प्रलयकाल में लोक भस्म हो जाते हैं, वैसे ही चारों विपश्चित् मर गये। तब उनकी संविद् आकाशरूप हुई, परन्तु उनको जगत् देखने का संस्कार था, इससे उनकी आकाशरूप संवित् फिर जगी, उससे जाग्रत् भासित होने लगा। उसने पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, स्थावर, जङ्गमरूप जगत् को देखा और अन्तवाहक शरीर से वे चेष्टा करने लगे। उनमें से एक पश्चिम दिशा का विपश्चित् विष्णु भगवान् के स्थान में मरकर निर्वाण हो

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ६६१

गया इससे उसकी संवित् में सब अर्थ शून्य हो गये और वह वहाँ मुक्त हुआ। एक मच्छ के उदर में सहस्र वर्ष पर्यन्त रहा। फिर एक देश का राजा हुआ और वहाँ राज्य करने लगा। एक चन्द्रमा के निकट गया, वहाँ मरकर चन्द्रमा के लोक को पहुँचा। और एक बहता हुआ समुद्र के पार हुआ और आगे चौरासी हजार योजन पृथ्वी को नाँघता गया। इसी प्रकार चारों फिर जिये और समुद्र, वन और पर्वतों को नाँघते गये।

सबको आगे दशसहस्र योजन सुवर्ण की पृथ्वी मिली, जहाँ देवताओं के विचरने के स्थान हैं। उसको भी वे नाँघते गये। आगे लोकालोक पर्वत आया, जिसने सब पृथ्वी को घेर लिया है। जैसे वृक्षों से वन का आवरण होता है, वैसे ही उस पर्वत ने पचास कोटि योजन पृथ्वी का आवरण किया है। वह पचास हजार योजन ऊँचा है—वे उस लोकालोक पर्वत में पहुँचे, जहाँ तारों का नक्षत्रचक्र घूमता है। उसको भी वे नाँघ गये। उसमें आगे एक शून्य नक्षत्र था। वह महाशून्य था। वहाँ पृथ्वी, जल आदि कोई तत्त्व न था। एक शून्य आकाश है, जहाँ न कोई स्थावर पदार्थ है, न कोई जङ्गम पदार्थ है, न कोई उपजता है न कभी मिटता है। उसको भी उन्होंने देखा। इसी प्रकार सम्पूर्ण भूगोल उन्होंने देखा। राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूगोल क्या है? किसके आश्रय में है? उसके ऊपर क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे गेंद होता है, वैसे भूगोल है और वह संकल्प के आश्रय में है। उसके सब ओर आकाश है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र सहित यह चक्र फिरता है। हे राम ! यह कोई वस्तु बुद्धि से नहीं बनी, संकल्प से बनी है। जो वस्तु बुद्धि से बनी होती है, वह क्रम से स्थित होती है, पर यह तो विपर्यरूप से स्थित है। पृथ्वी के चहुँफेर दसगुना जल है। उसके बाद दसगुनी अग्नि है। उसके उपरान्त दसगुना वायु है और फिर ब्रह्माण्ड खप्पर है।

वह खप्पर एक नीचे और एक ऊपर को गया है उसके मध्य में जो पोल है, वह आकाश है, जो वज्रसार की नाईं है। इसका विस्तार

६६२ ❊ योगवासिष्ठ ❊

अनन्तकोटि योजन है। उस ब्रह्माण्ड का उसमें भूगोल है। उसके उत्तर में सुमेरु पर्वत, पश्चिम में लोकालोक पर्वत है, और ऊपर नक्षत्रचक्र घूमता है। जहाँ वह जाता है, वहाँ प्रकाश होता है, और जहाँ वह नहीं होता, वहाँ तमरूप भासित होता है सो सब संकल्प की रचना है। जैसे बालक संकल्प से पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही चैतन्यरूपी बालक ने यह संकल्परूपी भूगोल रचा है। हे राम! जैसे-जैसे उस समय उसमें निश्चय हुआ है वैसे ही वैसे वह स्थित हुआ है। जहाँ पृथ्वी रची है, वहीं वह स्थित है। जहाँ खात रचा है, वहाँ खात ही है। परन्तु जैसे स्वप्न में अविद्यमान प्रतिभा होती है वैसे ही भूगोल है। हे राम! जिनको ऐसा ज्ञान है कि सुमेरु में देवता और पूर्वाद दिशाओं में मनुष्य आदि जीव रहते हैं, वे पण्डित होने पर भी मूर्ख हैं; क्योंकि ये देवता आदि तो भ्रममात्र हैं, कुछ बने नहीं। जो मुझ सरीखे तत्त्ववेत्ता हैं, उनको ज्ञाननेत्र से आत्मसत्ता ज्यों की त्यों दिखती है, और जो अज्ञानी मन सहित षट् इन्द्रियों से देखते हैं, उनको जगत् दिखता है; ज्ञानवानों को परब्रह्म सूक्ष्म ज्यों का त्यों भासता है। वे जगत् को असत् जानते हैं। जैसे आकाश में अनहोती नीलमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में अनहोता जगत् दिखता है। जैसे नेत्र दोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासित होता है। सो वह केवल आभासमात्र है।

हे राम! जगत् उपजा भी दिखता है। और नष्ट होता भी दिखता है, परन्तु बना कुछ नहीं। जैसे संकल्प का रचा नगर अपने मन में भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मन में फुरता है। यह सम्पूर्ण भूगोल संकल्प में स्थित है। जैसे बालक संकल्प करके पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही भूगोल है। यह ब्रह्माण्ड सोकोटि योजन पर्यन्त विस्तृत है। उसका एक भाग नीचे गया है और एक ऊपर को। उसमें चैतन्य रूपी बालक ने यह भूगोल रचा है, सो संकल्प के आश्रय से खड़ा है। जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही भासता है। इस पृथ्वी के उत्तर में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम और लोकालोक पर्वत है और ऊपर तारों और

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६६३

नक्षत्रों का चक्र घूमता है। लोकालोक के जिस ओर वह आता है, उस ओर प्रकाश होता है। भूगोल ऐसे है, जैसे गेंद होता है। उसके एक ओर पाताल, एक ओर स्वर्ग है और एक ओर मध्यमण्डल है। आकाश सब ओर है। पातालवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं, आकाशवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं और मध्यवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं। इस प्रकार भूगोल है। उसके ऊपर महातमरूप एक शून्य खात है। वहाँ न पृथ्वी है, न कोई पहाड़ है, न स्थावर है, न जङ्गम है और न कुछ उपजा है। उसके ऊपर एक सुवर्ण की दीवार है, जिसका विस्तार दस सहस्र योजन है। उसके ऊपर दसगुना जल है। वह पृथ्वी को चहुँफेर से घेरे है। उससे परे दसगुना अग्नि है। फिर दसगुना वायु है। उसके आगे आकाश है। फिर ब्रह्माकाश महाकाश है, जिसमें अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। परन्तु ये तत्त्व जैसे तृण के आश्रय से कपूर ठहरता है, वैसे ही पृथ्वीभाग के आश्रय से ठहरे हैं। वास्तव में यह शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का चमत्कार है, जो आकाशवत् निर्मल है। उसमें कोई क्षोभ नहीं है। वह परमशान्त, अनन्त और सबका अपना रूप है।

हे राम ! अब फिर विपश्चित् का वृत्तान्त सुनो। जब वे लोकालोक पर्वत पर पहुँचे, तब एक शून्य खात (खाई) उनको देख पड़ा। वह पर्वत से उतरकर खात में जा पड़े। वह खात भी पर्वत के शिखर पर था। वहाँ शिखर की नाईं बड़े-बड़े पक्षी भी रहते थे, इस कारण उन पक्षियों ने चोंचों से इनके शरीर चूर्ण किये। तब उन्होंने अपने स्थूल शरीर को त्यागकर अपना सूक्ष्म अन्तवाहक शरीर जाना। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिभौतिकता कैसे होती है और अन्तवाहक क्या है ? फिर उन्होंने क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे कोई संकल्प में दूर से दूर चला जाय तो जिस शरीर से जाय वह अन्तवाहक है; और जो पाञ्चभौतिक शरीर प्रत्यक्ष दिखता है वह आधिभौतिक है। जब मार्ग में कहीं जाने को चित्त में संकल्प उठता है, तब स्थूल शरीर गये बिना नहीं पहुँच सकता और जब मार्ग में

६६४ ✤ योगवासिष्ठ ✤

चले तब पहुँचता है, वहाँ आधिभौतिक है और यह प्रमाद से होता है । जैसे रस्सी का भूलने से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से आधिभौतिक शरीर भासित होता है, और जैसे कोई मनोराज्य का पुर बनाकर उसमें आप भी एक शरीर बनकर चेष्टा करता फिरे तो उसे जब तक पूर्व का शरीर नहीं भूलता, तब तक वह संकल्प शरीर से चेष्टा करता है । वहाँ आन्तवाहक है । उस शरीर को संकल्पमात्र जानना 'विशेष बुद्धि' कहलाता है, आत्मबोध हुए बिना जो उस संकल्पशरीर में दृढ़ भावना होती है, तो उसका नाम आधिभौतिक होता है—वह घट-पट कहलाता है । इसमें जबतक शरीर का स्मरण है, तब तक आधिभौतिकता नहीं निवृत्त होती । और जब शरीर का विस्मरण होता है, तब आधिभौतिकता मिट जाती है । विपश्चित् आत्मबोध से रहित थे और जहाँ चाहते थे वहाँ चले जाते थे, पर स्वरूप से न कुछ आन्तवाहक है और न कुछ आधिभौतिक है । प्रमाद से ये सब आकार भासित होते हैं । वास्तव में सब चिदाकाशरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी, सब वही है, और उसी के प्रमाद से विपश्चित् अविद्याकृत जगत् को देखने चले थे । वह अविद्या भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं—ब्रह्म ही है, तब ब्रह्म का अन्त कहाँ आवे ? वहाँ से वे चले, परन्तु जानते थे कि हमारा आन्तवाहक शरीर है ।

निदान वे सब पृथ्वी को नाँघ गये । फिर जल को भी नाँघ गये । उनके बाद जो सूर्य सा दाहक अग्नि का आवरण प्रकाशमान है, उसको भी नाँघकर मेघ और वायु के आवरण को भी नाँघ गए । फिर आकाश को भी नाँघ गये । उनके बाद ब्रह्माकाश था, जहाँ उनको संकल्प के अनुसार फिर जगत् भासित होने लगा, पर उनको भी वे नाँघ गये । फिर आगे ब्रह्माकाश मिला, फिर उनको पञ्चभूत भासित हुए । उनके आवरण को भी वे नाँघ गये । फिर उस ब्रह्माण्डकपाट के बाद तत्त्वों को नाँघकर ब्रह्माकाश मिला । उसमें एक और पाञ्चभौतिक ब्रह्माण्ड था । उसको भी नाँघ गये, पर अन्त न पाया । स्वरूप के प्रमाद से दृश्य का अन्त जानने को वे भटकते फिरे, पर अविद्यारूप संसार का अन्त कैसे

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६६५

आवे ? यह जीव तब तक अन्त लेने को भटकता फिरता है, जब तक अविद्या नहीं नष्ट होती; जब अविद्या नष्ट होगी, तभी अविद्यारूप संसार का अन्त होगा । हे राम ! जगत् कुछ बना नहीं, वही ब्रह्माकाश ज्यों का त्यों स्थित है । उसका न जानना ही संसार है । जब तक उसका प्रमाद है, तब तक जगत् का अन्त न आवेगा । जब स्वरूप का ज्ञान होगा, तब अन्त आवेगा । सो वह जानना क्या है ? चित्त का निर्वाण करना ही जानना है । जब चित्त का निर्वाण होगा; तब जगत् का अन्त आवेगा । जब तक चित्त भटकता फिरता है, तब तक संसार का अन्त नहीं आता । इससे चित्त का नाम ही संसार है । जब चित्त आत्म-पद में स्थित होगा, तब जगत् का अन्त होगा । इस उपाय के बिना शान्ति नहीं प्राप्त होती ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिदुपाख्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकविंशतितमः सर्गः ॥ २२० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे जो दो विपश्चित् थे, उनकी क्या दशा हुई, यह भी कहो । वे तो दोनों एक ही थे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक का तो निर्वाण हुआ था, दूसरा ब्रह्माण्डों को नाँघता-नाँधता और एक ब्रह्माण्ड में गया । वहाँ उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ । उनकी संगति से उसको ज्ञान हुआ । ज्ञान को पाकर वह भी निर्वाण हो गया । बाकी एक अब तक दूर फिरता है और एक यहाँ पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर विचरणता है । हे राम ! यह जगत् आत्मा का आभास है । जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है और जब तक किरणें हैं, तब तक जलाभास निवृत्त नहीं होता, वैसे ही जबतक आत्म-सत्ता है, तब तक जगत् का चमत्कार निवृत्त नहीं होता और आत्मा के जानने से जगत्सत्ता नहीं रहती । जैसे किरणों के अदृश्य होने से जलाभास नहीं रहता और जो जल दिखता है तो भी किरणों ही की सत्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मा के जाने से आत्मा की सत्ता ही भासती है—भिन्न जगत् की सत्ता नहीं भासित होती । राम ने पूछा, हे भगवन् ! विपश्चित् एक ही था तो एक ही संवित् में भिन्न-भिन्न