योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1492, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ६८७
आप ही जानता है। शरीर को दुःख और सुख भी प्राप्त होता है; वह मरता और रुदन भी करता है, हँसता, लेता और देता भी है और इस प्रकार की सब चेष्टा करता दिखता है, पर वह अपने निश्चय में न दुःखी होता है, न सुखी होता है, न देता है और न लेता है, सदा ज्यों का त्यों रहता है।
हे राम ! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दिखता है, परन्तु हृदय से उसका यही निश्चय होता है। वह अद्भुत पद में स्थित रहता है, कभी उससे नहीं गिरता। उसका परम उदितरूप होता है। वह राग सहित भी दिखता है। पर हृदय से राग किसी में नहीं करता। क्रोध करता भी दिखता है, पर उसको क्रोध कभी नहीं होता। जैसे आकाश शुभ पदार्थ को धारण करता है और धुएँ और बादल से ढका भी दिखता है, पर किसी का स्पर्श नहीं करता; वैसे ही ज्ञानवानों में सब क्रिया दिखती है, पर अपने निश्चय में उसे कोई स्पर्श नहीं करती। जैसे नट स्वाँग ले आता है और चेष्टा करता दीखता है, पर हृदय से अपने नटत्व भाव में उसे निश्चय होता है, वैसे ही ज्ञानवान् को भी सब क्रियाओं में अपने आत्मभाव का निश्चय होता है। जैसे जिसको स्वप्न आता है, वह यदि स्वप्न भी अपना पूर्वरूप स्मरण रखता है तो स्वप्न के पदार्थ में बर्तता है, तो भी स्वप्न के सुख में अपने को सुखी और दुख में दुखी नहीं मानता—सब सृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् को स्वरूप के निश्चय से सुख-दुःख का क्षोभ नहीं होता। जो ऐसे पुरुष हैं, उनको दुःख से कष्ट होता है ? जैसी उनकी इच्छा होती है, वैसे ही सिद्धि होकर भासती है। हे राम ! यह जितनी सृष्टि है, सब चित्सत्ता में है। योगीश्वर पुरुष उसी में स्थित होकर जहाँ पहुँचना चाहते हैं, वहाँ अन्तवाहक मे जा पहुँचते हैं। तीनों काल उनको विद्यमान होते हैं। साधन कुछ नहीं, परन्तु ज्ञानी अवश्य किसी काम के लिए यत्न नहीं करते—जैसा प्राप्त होता है, उसी में प्रसन्न रहते हैं। हे राम ! एक समय ब्रह्माजी ऊर्ध्वमुख से सामवेद का गायन करते थे। उन्होंने सदाशिव