योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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का मान न किया। तब सदाशिव ने अपने नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ शीश काट डाला। परन्तु ब्रह्माजी के मन में कुछ क्रोध न फुरा। उन्होंने विचारा कि मैं चिदाकाश हूँ, सो अब भी चिदाकाश हूँ, मेरा तो कुछ गया नहीं। सिर से मुझे क्या प्रयोजन है? न कुछ हानि है और न कुछ लाभ।
हे राम! इस प्रकार सब विश्व रचनेवाले ब्रह्माजी का सिर कटा। जो वे फिर सिर लगा लेते तो समर्थ थे, पर उनको सिर लगाने का कुछ प्रयोजन न था और न लगाने में कुछ हानि भी न थी। उनका भी निश्चय सदा आत्मपद में है, इस कारण उन्हें कुछ क्षोभ न हुआ। हे राम! काम के सदृश और कोई विकार नहीं है। जो सदाशिव पार्वती को वायं अङ्ग में धारण करते हैं, उन्होंने ही जिस कामदेव के पाँच बाण चलने से सब विश्व मोहित होता है, उसी काम को भस्म कर डाला। तो क्या स्त्री को वह छोड़ नहीं सकते थे? पर उनको राग-द्वेष कुछ नहीं है, इस कारण त्याग नहीं करते। त्यागने में उन्हें कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं होती और रखने में कुछ अनर्थ नहीं होता। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य होता है, उसको करते हैं, खेद नहीं मानते, इसी से वे जीवन्मुक्त हैं। विष्णुजी सदा विक्षेप में रहते हैं। आप भी कर्म करते हैं और लोगों से भी कराते हैं। शरीर धारण करते हैं और त्याग भी देते हैं। इत्यादि क्षोभ वह सहते हैं। वह इसे त्यागने को समर्थ भी हैं, परन्तु त्यागने में उनका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और करने में कुछ हानि नहीं होती। उनको लोग कई गुणों से युक्त सगुण जानते हैं, मुझको तो उनका शुद्ध चिदाकाशरूप भासित होता है। मूर्ख कहते हैं कि विष्णु श्यामसुन्दर हैं, परन्तु वे शुद्ध चिदाकाशरूप हैं और उनको सदा शुद्धस्वरूप में अहंप्रत्यय है।
आकाशमार्ग में जो सूर्य स्थित हैं, वे कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं। तो क्या उनमें स्थिर होने की सामर्थ्य नहीं है? है, परन्तु चलना और ठहरना, दोनों उनके लिए समान हैं। वह खेद से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य करते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। जीवन्मुक्त चन्द्रमा