योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६८६
भी हैं, वह घटते-घटते सूक्ष्म होते दिखते हैं और कभी बढ़ते जाते हैं। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्ष उनमें होते हैं। वह केवल रात्रि को प्रकाश करते हैं। तो क्या वे अपनी क्रिया को त्याग नहीं सकते? त्याग सकते हैं; परन्तु क्षोभ से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य में विचरते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। अग्नि सदा दौड़ता रहता है और यज्ञ और होम की आहुतियाँ भोजन करने को सब ओर जाता है। तो क्या उसको गृह में बैठने की सामर्थ्य नहीं है? अवश्य है, परन्तु जो कुछ अपना आचार है, उसको वह नहीं त्यागता, क्योंकि ठहरने में उसका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और चलने में कुछ हानि नहीं होती—दोनों में वह तुल्यरूप से जीवन्मुक्त है। हे राम! बृहस्पति और शुक्र को बड़ा क्षोभ रहता है। बृहस्पति देवताओं की जय के लिए यत्न करते हैं और शुक्र दैत्यों की जय के लिए यत्न करते रहते हैं। तो क्या इनको त्यागने की सामर्थ्य नहीं है? परन्तु दोनों इनको तुल्य हैं, इस कारण खेद से रहित होकर अपने कार्य में लगे रहते हैं, इससे जीवन्मुक्त पुरुष हैं। हे राम! राज्य में बड़े क्षोभ होते हैं, पर राजा जनक आनन्दसहित राज्य करते हैं और जीवन्मुक्त हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्तासुर, और मुर आदि दैत्य जीवन्मुक्त हुए हैं। वे समताभाव को लिये, खेद से रहित नाना प्रकार की चेष्टा करते और हृदय से शांत और जीवन्मुक्त रहे हैं। राजा नल, दिलीप और मान्धाता आदि ने भी समताभाव से राज्य किया है। वे भी जीवन्मुक्त हैं। ऐसे ही अनेक राजा हुए हैं। उनमें रागवान् भी देखे गये हैं, परन्तु हृदय में वे रागद्वेष से रहित शान्ति चित्त थे।
हे राम! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है, परन्तु भेद इतना ही है कि ज्ञानी का चित्त शान्त और अज्ञानी का चित्त क्षोभ में होता है। अज्ञानी इष्ट की प्राप्ति में हर्षवान् होता है और अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करता है, और ग्रहण-त्याग की इच्छा में जलता है, क्योंकि उसको संसार सत्य भासित होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसके भीतर न राग है, न द्वेष। स्वाभाविक शरीर की जो प्रारब्ध होती है, उसमें उसे कुछ भी अपना अभिमान नहीं होता। उसके निश्चय में