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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1482, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1482

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६७७

तब वर्षा होने लगी और उससे जो तेज उनकी सेना को जला रहा था, वह शान्त हो गया । उसके बाद उसने शिव का अस्त्र चलाया । उसमें से प्रथम शस्त्रां की नदी चली, फिर त्रिशूलों की नदी चली, फिर चक्रों की नदी चली, फिर वज्र की नदी चली, बरछी की नदी चली, बिजली की नदी चली और अग्नि इत्यादिक की नदियाँ चलीं । दूसरे शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा हुई । जब इस प्रकार नदियाँ बह चलीं, तब जो कुछ सेना सम्मुख आती थी, वह मृतक हो गई । जैसे कमलिनी काटी जाती है, वैसे ही शूरवीर काटे गये । कोई पहाड़ों की कन्दराओं में गिरे और वहाँ से उड़कर समुद्र में जा पड़े और कोई सुमेरु की कन्द-राओं में जाकर छिपे और समुद्र में जाकर डूबे—जैसे अज्ञानी विषयों में डूबते हैं इस प्रकार दोनों ओर से सेना शून्य हुई और चारों दिशाओं की सेना नष्ट हो गई । नीच से नीच देशों के और पहाड़ की कन्दराओं के रहनेवाले सब बहते जाते थे ।

हे राम ! कई शस्त्रों से और कई आँधी से उड़े, वे सब क्षेत्रों में जा पड़े । कई वन में और कई नीचे देशों में गिरे । जो पुण्यवान् थे, वे उत्तम क्षेत्र में जा पड़े और मृतक होकर स्वर्ग को गये, और पापी नीच देशों में जा पड़े, उसमे दुर्गति को प्राप्त हुए । कई पिशाच हुए, कितनों को विद्याधरियाँ ले गईं और कई ऋषीश्वरों के स्थानों में जा पड़े । उनकी उन्होंने रक्षा की । इसी प्रकार कितने बाणों से छेदे हुए नष्ट हुए और कई रुधिर की नदियों में बहते समुद्र की ओर चले गये । हे राम ! जब सब सेना नष्ट हो गई, तब आकाश शुद्ध हुआ । जैसे ज्ञानी का मन निर्मल होता है, वैसे ही आकाश अधिक क्षोभ से रहित हुआ । जब सब सेना समाप्त हो गई, तब चारों राजा आगे चले । हे राम ! निदान चारों विपश्चित् चारों दिशाओं के समुद्रों तक जा पहुँचे । तब उन्होंने क्या देखा कि बड़े गहरे समुद्र हैं । कहीं रत्न, कहीं हीरा, मोती इत्यादि चमकते हैं । बड़े गहरे समुद्र में बड़े मच्छ और तरङ्ग उछलते हैं । रेती में नाना प्रकार के लौंग, इलायची, चन्दन इत्यादि के वृक्ष समुद्र तट पर जाकर देखे ।

इति नि० विपश्चित्समुद्रप्रासिनांम द्विशताधिकाष्टादशसर्गः ॥ २१ ॥