योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1484, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६७६
ऋषि, मुनि आदि को देखो । और देखो कि सबको आकाश स्थान दे रहा है, पर महापुरुष की नाईं आप सदा असंग रहता है । वह शुभ अशुभ दोनों के लिए समान है । स्वर्गादिक शुभस्थान हैं और चाण्डाल, पापी आदि के निवासस्थान नरक अपवित्र हैं, परन्तु आकाश दोनों के लिए समान है—असंग होने के कारण निर्विकार है । जैसे ज्ञानी का मन सब स्थानों से निर्लेप होता है, वैसे ही आकाश सब पदार्थों से असंग, न्यारा है और महात्मा पुरुष की नाईं सर्वव्यापी है । हे आकाश ! तू प्रकाशरूप है, तुझमें अन्धकार दिखता है—यह आश्चर्य है । हे आकाश ! तू सबका आधार है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूर्ख हैं । दिन को तुझमें श्वेतता भासित होती है, रात्रि को अन्धकार भासित होता है और संध्याकाल में तुझमें लाली चमकती है; पर तू तीनों से न्यारा है । ये तीनों राजसी, तामसी और सात्त्विकी गुण हैं; पर तू इनके होते भी असंग है । हे आकाश ! तू निर्मल है और तम तुझमें दिखता है, परन्तु तू सदा ज्यों का त्यों है । यह अनित्यरूप है । चन्द्रमा तुझमें शीतलता करता है, सूर्य दाहक होते हैं । तीर्थ आदिक पवित्र स्थान हैं और पापमय अपवित्र स्थान हैं; परन्तु तू सबमें एक समान ज्यों का त्यों रहता है । वृक्षों को बढ़ने और ऊँचे होने की सत्ता तू ही देता है । अपनी महिमा को तू आप ही जाने । और कोई तेरी महिमा जान नहीं सकता । तू निष्किञ्चन अद्वैत है; सबको धारण कर रहा है । सबका प्रयोजन तुझसे ही सिद्ध होता है । जल नीचे को जाता है, पर तू सबसे ऊँचा और व्यापक विभु है । अनेक पदार्थ तुझमें उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, पर तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जैसे अग्नि से चिनगारी उपजती और अग्नि ही में लीन हो जाती है, वैसे ही तुझमें अनन्त जगत् उपजते और लीन होते हैं और तू सदा ज्यों का त्यों रहता है । जो तुझको शून्य कहते हैं, वे मूढ़ हैं ।
हे राजन् ! ऐसा आकाश कौन है, यह भी सुनो । ऐसा आकाश आत्मा है, जो चैतन्य आकाश है, और जिसमें अनन्त जगत् उत्पन्न और लीन हो जाते हैं । उसको जो शून्य कहते हैं, वे महामूर्ख हैं जो