योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1485, कुल 1734 में से
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सबका अधिष्ठान है, सबको धारण कर रहा है और सदा निःसंग है ऐसे चिदाकाश को नमस्कार है । हे राजन् ! यह आश्चर्य है कि वह सदा एकरस है, पर उसमें नाना तरङ्ग भासित होते हैं—यही माया है । हे राजन् ! एक विद्याधरी और विद्याधर थे । उनके मन्दिर में एक ऋषि आ पहुँचा, पर उस विद्याधर ने उनका आदर-सत्कार नहीं किया । इससे ऋषीश्वर ने शाप दिया कि तू बारह वर्ष तक वृक्ष होगा । निदान वह विद्याधर वृक्ष हो गया । पर अब हम आये हैं, हमारे देखते ही वह शाप से मुक्त हो वृक्षभाव को त्यागकर फिर विद्याधर हुआ है । यह ईश्वर की माया है कि कभी कुछ हो जाता है, और कभी कुछ हो जाता है । हे मेघ ! तू धन्य है ! तेरी चेष्टा भी सुन्दर है । तीर्थों में सदा तेरी स्थिति है । तू सबमे ऊँचे बिराजता है और सब आकार तेरा भला दिखता है, परन्तु एक तुझमें नीचता है कि ओले की वर्षा करता है जिसमे खेती नष्ट हो जाती और फिर नहीं उगती । वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा देखने पर की सुन्दर है और हृदय मूर्ख है, उनकी संगति बुरी है । ज्ञानवान् की चेष्टा देखने में भला नहीं, तो भी उसकी संगति कल्याण करती है । हे राजन् ! सबमे नीच कुत्ता है; क्योंकि जो कोई उसके निकट आता है, उसे काट लेता है । वह घर-घर में भटकता फिरता और मलिन स्थानों में जाता है । वैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषों की निन्दा करता है, पर मन में तृष्णा रखता है । और विषयरूपी मलिन स्थानों में गिरता है । वह मूर्ख मनुष्य मानों कुत्ता है, बल्कि कुत्ते से भी नीच है । ब्रह्मा ने सम्पूर्ण जगत् रचा है, परन्तु उसमें कुत्ता सबसे नीच है । पर कुत्ता क्या समझता है, सो सुनो ।
एक पुरुष ने कुत्ते से प्रश्न किया कि हे कुत्ते ! तुझसे कोई नीच है, या नहीं ? तब कुत्ते ने कहा कि मुझसे भी नीच मूर्ख मनुष्य है, उससे में श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि प्रथम तो में स्पृश्य हूँ, दूसरे जिसका भोजन खाता हूँ, उसकी रक्षा करता हूँ और उसके द्वारे बैठा रहता हूँ ; पर मूर्ख से ये तीनों कार्य नहीं होते । इससे में उससे श्रेष्ठ हूँ । मूर्ख को देहाभिमान है, इससे वह कुत्ते से भी नीच है । हे राजन् ! परम