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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1486, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1486
  • निर्वाण प्रकरण * ६८१

अनर्थ का कारण देहाभिमान है। देहाभिमान से जीव परम आपदा को प्राप्त होता है। वह मूर्ख नहीं, मानो कौआ है, जो सबसे ऊँची टहनी पर बैठकर काँ-काँ करता है। हे राजन् ! कमल की खान तालाब के निकट एक कौआ जा निकला तो क्या देखा कि भौंरे बैठे कमल की सुगन्ध लेते हैं। उनको देखकर वह हँसने लगा और काँ-काँ शब्द करने लगा। तब उसको देख भौंरे हँसे कि यह कमल की सुगन्ध क्या जाने। वैसे ही जिज्ञासु भौंरे के समान हैं, जो परमार्थरूपी सुगन्ध लेते हैं। जो अज्ञानीरूपी कौए हैं, वे परमार्थरूपी सुगन्ध को नहीं जानते। इस कारण मूर्ख को देखकर जिज्ञासु हँसते हैं, जो आत्मरूपी सुगन्ध को नहीं जानता। अरे कौए ! तू क्यों हंस की बराबरी करता है ? हंस तो मोती चुगनेवाले हैं और तू नीच स्थानों में रहनेवाला है। मन्त्री ने कहा, हे कोयल ! तुम कमल को देखकर क्या प्रसन्न होती हो ? प्रसन्न तो तब हो, जब वसन्तऋतु हो; पर यह तो वर्षाकाल है—ये फूल ओलों से नष्ट हो जावेंगे।

हे राजन् ! कोयलरूपी जो जिज्ञासु हैं, उनको यह उपदेश है। हे जिज्ञासु ! जो सुन्दर पदार्थ तुमको दिखते हैं, उनको देखकर तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? प्रसन्न तो तब हो, जो ये सत्य हों, पर ये तो मिथ्या हैं और अविद्या के रचे हैं। तुम क्यों प्रसन्न होते हो ? अपनी बिरादरी में जाकर बैठो और अज्ञानी का संग छोड़ दो। जैसे कौआ हंसों में जा बैठता तो भी उसका चित्त गन्दगी खाने में लगा होता है और हंस के आहार मोतियों की ओर देखता भी नहीं, वैसे ही अज्ञानी जीव कभी सन्तों की संगति में जा बैठता है, तो भी उसका चित्त विषयों की ओर ही घूमता रहता है, स्थिर नहीं होता। जैसे कोयल का बच्चा कौए को माता-पिता जानकर उनमें जा बैठता है, तब उनकी संगति से वह भी गन्दगी खानेवाला हो जाता है। इससे कोयल उसको वर्जन करती है कि अरे बेटा ! तू कौए की संगति में मत बैठ, अपने कुल में बैठ; क्योंकि तेरा भी नीच आहार हो जायगा। वैसे ही जिज्ञासु जो अज्ञानी का संग करता है, तो उसके अनुसार उसको भी विषयों

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