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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1487, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1487

६८२ * योगवाशिष्ठ *

की तृष्णा उत्पन्न होती है। तब ज्ञानी उसको वर्जन करते हैं कि रे जिज्ञासु ! तू मूर्ख अज्ञानियों में मत बैठ। अपना कुल जो सन्त जन हैं, उनमें बैठ। जैसे कोयल के बच्चे को कौए सुख देनेवाले नहीं होते, वैसे ही मूर्ख तुझको सुख देनेवाले नहीं होंगे। मन्त्री फिर कहने लगा—

अरे चील ! तू क्यों हंस की बराबरी करती है ? तू भी बहुत ऊँचे उड़ती है; परन्तु तुझमें हंस का कोई गुण नहीं है। जब तू मांस को पृथ्वी पर देखती है, तब वहाँ गिर पड़ती है, पर हंस नहीं गिरते। वैसे ही जो मूर्ख हैं, वे सन्तों की तरह ऊँचे कर्म भी करते हैं, परन्तु विषयों को देखकर गिरते हैं; पर संत नहीं गिरते। तो मूर्ख सन्तों की बराबरी कैसे करें ? फिर मन्त्री ने कहा, हे बगले ! तू हंस की बराबरी क्या करता है ? अपने पाखण्ड को छिपाकर तू अपने को हंस की नाईं उज्ज्वल दिखाता है, पर जब मछली निकलती है, तब तू खा लेता है। यही तुझ में अवगुण है। हंस मानसरोवर के मोती चुगनेवाले हैं, और तू गढ़े में से तृष्णा करके मछली खानेवाला है। तू क्यों अपने को हंस मानता है ? वैसे ही अज्ञानी जीव विषयों की तृष्णा करते हैं और ज्ञानवान् विवेक से तृप्त हैं। उनकी बराबरी अज्ञानी क्यों करते हैं ?

हे राजन् ! जो हंस हैं, वे सदा अपनी महिमा में रहते हैं और अपना जो मोती का आहार है, उसको करते हैं; दूसरे किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करते। जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर शोभा पाते हैं—चन्द्रमा बिना शोभा नहीं पाते, वैसे ही बुद्धि भी तब शोभा पाती है, जब ज्ञान का उदय होता है—आत्मज्ञान के बिना बुद्धि शोभा नहीं पाती। बड़े-बड़े सुगन्धवाले वृक्षों का माहात्म्य भौंरे ही जानते हैं, और जीव नहीं जानते। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! समुद्र के किनारे पर राजा विपश्चित् से मन्त्रियों ने ऐसे कहकर फिर कहा, हे राजन् ! अब पृथ्वीनगर के मण्डलेश्वर स्थापित करो। हे राम ! जब मन्त्री ने ऐसे कहा, तब सब दिशाओं के मण्डलेश्वर स्थापित किये गये। तब चारों राजा, जो अपनी-अपनी दिशा के समुद्र पर बैठे थे, उन्होंने अपने-अपने मन्त्री से कहा, हे साधु ! अब हमने समुद्रपर्यन्त दिग्विजय