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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1488, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1488

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६८३

की है और हमारी जय हुई है। अब चैत्य जो दृश्य है, उस दृश्य विभूति को देखो। समुद्र के पार द्वीप है, फिर उस समुद्र के पार और द्वीप है; फिर समुद्र है और फिर द्वीप है। इसी प्रकार सात द्वीप और सात समुद्र हैं, पर उनके आगे क्या है ? इस प्रकार सब दृश्य देखने की इच्छा करके उन्होंने अग्निदेवता का आवाहन किया। उनकी दृढ़भावना से अग्नि-देवता सम्मुख आकर स्थित हुए और बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुमको कामना हो, सो माँगो। राजा ने कहा, हे भगवन् ! ईश्वर की माया में पाञ्चभौतिक दृश्य में जो प्राणी हैं, उनको देखने की मेरी इच्छा है। उसे पूर्ण करो। हे देव ! हम इसी शरीर से दृश्य देखने जावें, और जब यह शरीर न चल सके, तब मन्त्रसत्ता में जावें। पर जहाँ मन्त्र की भी गति नहीं, वहाँ सिद्धि में जावें। और जहाँ सिद्धि की भी गति नहीं, वहाँ मन के वेग में जावें और मृतक भी न हों। यह वर हमको दो।

हे राम ! जब इस प्रकार राजा ने कहा, तब अग्नि ने कहा कि ऐसा ही होगा। यों कहकर अग्नि अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लय हो जाती है, वैसे ही अग्नि अन्तर्धान हो गये। जब राजा विपश्चित् वर पाकर चलने को उद्यत हुआ, तब जितने मन्त्री और मित्र थे, वे रोने लगे और बोले, हे राजन् ! तुमने यह क्या निश्चय किया है ? ईश्वर की माया का अन्त किसी ने नहीं पाया, इसमें तुम अपने स्थान को चलो। यह क्या तुमने निश्चय किया है। हे राम ! इस प्रकार मन्त्री कहते रहे, परन्तु राजा ने उनको आज्ञा देकर एक-एक दिशा के समुद्र में प्रवेश किया। यों चारों दिशाओं में चारों राजाओं ने गमन किया। तब जो बड़े-बड़े शक्तिशाली मन्त्री थे, वे साथ ही चले। तब राजा मन्त्रशक्ति से समुद्र को नाँघ गया। कहीं पृथ्वी पर चला और कहीं ऊँचे चला। इसी प्रकार और द्वीप में जो निकला। तब बड़ा समुद्र आया उसमें प्रवेश कर गया। उसमें बड़े तरंग उछलते थे और उसका सौ योजन विस्तार था। कभी नीचे और कभी ऊपर को जाते थे। हे राम ! ऐसे तरंग उछलते, मानो पर्वत उछ-लते हों। जब वे ऊपर को उछलते, तब स्वर्ग तक उछलने लगते, और

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