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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1489, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1489

६८४ ❄ योगवाशिष्ठ ❄

जब नीचे जाते, तब पातालपर्यन्त चलते जान पड़ते । जैसे पानी में तृण फिरता है, वैसे ही राजा फिरे । इस प्रकार कष्ट से रहित राजा समुद्र और दिशा को नाँघ गया, परन्तु बीच में जो वृत्तान्त हुआ सो सुनो । क्षीरसमुद्र में एक मच्छ रहता था, जिसको सब देवता प्रणाम करते थे और जो विष्णु भगवान के मच्छ अवतार के परिवार में था । जब राजा ने क्षीरसमुद्र में प्रवेश किया, तब राजा को उसने मुख में डाल लिया । पर राजा मन्त्र के बल से उसके मुख से निकल गया । आगे फिर एक मच्छ मिला, उसने भी उसे मुख में डाल लिया । पर उसमें भी वह निकल गया ।

फिर आगे पिशाचों का देश था । वहाँ राजा को पिशाच ने काम में मोहित किया । फिर उसने दक्षप्रजापति की कुछ अवज्ञा की, जिससे उन्होंने शाप दिया और राजा वृक्ष हो गया । निदान कुछ काल वृक्ष रहकर फिर छूटा तो एक देश में मेंढक हुआ और सौ वर्ष तक खाई में पड़ा रहा । फिर उसमें छूटकर मनुष्य हुआ । तब किसी सिद्ध के शाप से शिला हो गया और सौ वर्ष तक शिला ही रहा । उसके उपरान्त अग्नि देवता ने शिला की योनि से छुड़ाया तो फिर मनुष्य हुआ । तब उस सिद्ध को आश्चर्य हुआ कि मेरे शाप को दूर करके यह मनुष्य क्योंकर हुआ—यह तो मुझसे भी बड़ा सिद्ध है । ऐसे जानकर उसने उसके साथ मैत्री की । इसी प्रकार दूसरे समुद्रों को भी वह नाँघता गया । क्षीरसमुद्र, खारी समुद्र और इक्षु रस के समुद्र को नाँघकर द्वीपों को नाँघता गया । फिर एक अप्सरा पर मोहित हुआ और बहुत काल में वहाँ से छूटा । फिर एक देश में पक्षी हुआ । बहुत काल तक पक्षी रहकर छूटा तो एक गोपी पिशाचिनी ने बैल बनाकर उसे रक्खा । तब दूसरे विपश्चित् ने बैल विपश्चित् को उपदेश करके जगाया । निदान हे राम ! चारों दिशाओं में चारों विपश्चित् घूमते फिरे । दक्षिण दिशा का राजा तो पिशाचिनी से मोहित हुआ, इससे उसने बहुत जन्म पाये, और पूर्व का राजा बहता हुआ मच्छ के मुख में चला गया । उसने निकाल दिया, इससे उसने वह अवस्था देखी । उत्तर दिशा का