योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६८४ ❄ योगवाशिष्ठ ❄
जब नीचे जाते, तब पातालपर्यन्त चलते जान पड़ते । जैसे पानी में तृण फिरता है, वैसे ही राजा फिरे । इस प्रकार कष्ट से रहित राजा समुद्र और दिशा को नाँघ गया, परन्तु बीच में जो वृत्तान्त हुआ सो सुनो । क्षीरसमुद्र में एक मच्छ रहता था, जिसको सब देवता प्रणाम करते थे और जो विष्णु भगवान के मच्छ अवतार के परिवार में था । जब राजा ने क्षीरसमुद्र में प्रवेश किया, तब राजा को उसने मुख में डाल लिया । पर राजा मन्त्र के बल से उसके मुख से निकल गया । आगे फिर एक मच्छ मिला, उसने भी उसे मुख में डाल लिया । पर उसमें भी वह निकल गया ।
फिर आगे पिशाचों का देश था । वहाँ राजा को पिशाच ने काम में मोहित किया । फिर उसने दक्षप्रजापति की कुछ अवज्ञा की, जिससे उन्होंने शाप दिया और राजा वृक्ष हो गया । निदान कुछ काल वृक्ष रहकर फिर छूटा तो एक देश में मेंढक हुआ और सौ वर्ष तक खाई में पड़ा रहा । फिर उसमें छूटकर मनुष्य हुआ । तब किसी सिद्ध के शाप से शिला हो गया और सौ वर्ष तक शिला ही रहा । उसके उपरान्त अग्नि देवता ने शिला की योनि से छुड़ाया तो फिर मनुष्य हुआ । तब उस सिद्ध को आश्चर्य हुआ कि मेरे शाप को दूर करके यह मनुष्य क्योंकर हुआ—यह तो मुझसे भी बड़ा सिद्ध है । ऐसे जानकर उसने उसके साथ मैत्री की । इसी प्रकार दूसरे समुद्रों को भी वह नाँघता गया । क्षीरसमुद्र, खारी समुद्र और इक्षु रस के समुद्र को नाँघकर द्वीपों को नाँघता गया । फिर एक अप्सरा पर मोहित हुआ और बहुत काल में वहाँ से छूटा । फिर एक देश में पक्षी हुआ । बहुत काल तक पक्षी रहकर छूटा तो एक गोपी पिशाचिनी ने बैल बनाकर उसे रक्खा । तब दूसरे विपश्चित् ने बैल विपश्चित् को उपदेश करके जगाया । निदान हे राम ! चारों दिशाओं में चारों विपश्चित् घूमते फिरे । दक्षिण दिशा का राजा तो पिशाचिनी से मोहित हुआ, इससे उसने बहुत जन्म पाये, और पूर्व का राजा बहता हुआ मच्छ के मुख में चला गया । उसने निकाल दिया, इससे उसने वह अवस्था देखी । उत्तर दिशा का
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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जो राजा हुआ, उसने वही अवस्था देखी । पश्चिम दिशा का हेमचू पक्षी की पीठ पर पहुँचा । उसने उसे कुशद्वीप में डाल दिया, इससे उसने भी अनेक अवस्था पाई । हे राम ! एक-एक विपश्चित् ने भिन्न- भिन्न योनियों और अवस्थाओं का अनुभव किया ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि विपश्चित् एक ही था और उन चारों की संवित् भी एक ही थी, आकार भी एक ही था तो भिन्न- भिन्न रुचि कैसे हुई, जो एक पक्षी हुआ, दूसरा वृक्ष हुआ और वे वासना के अनुसार अनेक शरीर पाते फिरे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? उनकी संवित् एक ही थी, परन्तु भ्रम से भिन्नता हो जाती है । जैसे किसी पुरुष को स्वप्न होता है तो उसमें वह पशु-पक्षी हो जाता है और भिन्न-भिन्न रुचि भी हो जाती है, वैसे ही उनकी भी भिन्न-भिन्न रुचि हो गईं । जैसे देखो कि शरीर तो एक ही होता है, पर उसमें नेत्र, श्रवण, नासिका, जिह्वा और त्वचा की रुचि भिन्न-भिन्न होती है और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती हैं, सो एक ही शरीर में अनेकता भासित होती है, वैसे ही उनकी एक ही संवित् थी, परन्तु संकल्प भिन्न-भिन्न हो गया था, इससे मन के फुरने से एक देह में अनेक भासित हुई । जैसे एक ही योगेश्वर इच्छा करके और और शरीर धर लेता है और एक से अनेक हो जाता है । एक सहस्र- बाहु अर्जुन था । वह किमी भुजा से युद्ध करता था, किमी भुजा से दान करता था और किमी एक मे लेता-देता था । इमी प्रकार मब भुजाओं से चेष्टा करता था—वे भी भिन्न-भिन्न हुए ? एक ही शरीर में भिन्न-भिन्न चेष्टा होती है । जैसे विष्णु भगवान् कहीं दैत्यों के साथ युद्ध और कहीं कर्म करते हैं, कहीं लीला करते हैं और कहीं शयन करते हैं, सो संवित् तो एकही है, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न होती हैं, वैसे ही उनकी संवित् में अनेक रुचि हुई तो इसमें क्या आश्चर्य है ? हे राम ! इस प्रकार उन्होंने जन्म से जन्मान्तर को अविद्याकृत संसार में देखा ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे तो बोधवान् विपश्चित् थे और बोधवान् जन्म नहीं पाता, फिर उनका किस प्रकार जन्म हुआ ?
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❊ योगवाशिष्ठ ❊
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वे विपश्चित् बोधवान् न थे, परन्तु बोध के निकट धारणा अभ्यासवाले थे। जो वे ज्ञानवान् होते तो दृश्यभ्रम देखने की इच्छा क्यों करते ? इससे वे ज्ञानवान् न थे—धारणा के अभ्यासी थे, अतः समुद्र को नाँघ गये और मच्छ के उदर से बलपूर्वक निकल आये। वह प्रसिद्ध योगशक्ति है। ज्ञान का लक्षण स्वसंवेद्य है, परसंवेद्य नहीं। राजा विपश्चित् ज्ञानवान् न थे, इस कारण देश-देशान्तर में घूमते रहे और ज्ञान बिना अविद्याकृत संसार में जन्म-मरण में भटकते रहे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञानवान् योगीश्वरों को भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों कालों का ज्ञान कैसे होता है ? ज्ञानी योगी एक देश में स्थित हुआ सर्वत्र कर्मों को कैसे करता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानी की बात, यह मैंने तुमसे कही है। जितना जगत् है, सब चिदाकाशस्वरूप है। जिनको ऐसी सत्ता का ज्ञान हुआ है, वे महापुरुष हैं। जैसे स्वप्न में कोई पुरुष जागे तो स्वप्न की सब सृष्टि उसे अपना ही स्वरूप लगती है और उसमें वह नहीं बँधता। हे राम ! यह सब नानात्व भासता है, सो नाना नहीं और अनाना भी नहीं, केवल आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने आपमें स्थित है। ये तीनों काल भी ज्ञानवान् को ब्रह्मरूप हो जाते हैं, सब जगत् भी ब्रह्मरूप हो जाता है और उसका द्वैतभाव मिट जाता है। ऐसे ज्ञानवान् को ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे अमृत को जो पीता है, वही उसके स्वाद को जानता है, और कोई ज्ञान नहीं सकता। हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तो तुल्य दिखती है, परन्तु ज्ञानी का निश्चय कुछ और है और अज्ञानी का निश्चय और। जिसका हृदय शान्त हुआ है, वह ज्ञानवान् है और जिसका हृदय त्रिताप से जलता है, वह अज्ञानी है। वह बँधा हुआ है। ज्ञानवान् का शरीर चूर्ण हो अथवा उसे राज्य प्राप्त हो तो भी उसको रागद्वेष नहीं उपजता। वह सदा ज्यों का त्यों एकरस रहता है। वह जीवन्मुक्त है, परन्तु उसका यह लक्षण कोई नहीं जान सकता, वह
✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ६८७
आप ही जानता है। शरीर को दुःख और सुख भी प्राप्त होता है; वह मरता और रुदन भी करता है, हँसता, लेता और देता भी है और इस प्रकार की सब चेष्टा करता दिखता है, पर वह अपने निश्चय में न दुःखी होता है, न सुखी होता है, न देता है और न लेता है, सदा ज्यों का त्यों रहता है।
हे राम ! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दिखता है, परन्तु हृदय से उसका यही निश्चय होता है। वह अद्भुत पद में स्थित रहता है, कभी उससे नहीं गिरता। उसका परम उदितरूप होता है। वह राग सहित भी दिखता है। पर हृदय से राग किसी में नहीं करता। क्रोध करता भी दिखता है, पर उसको क्रोध कभी नहीं होता। जैसे आकाश शुभ पदार्थ को धारण करता है और धुएँ और बादल से ढका भी दिखता है, पर किसी का स्पर्श नहीं करता; वैसे ही ज्ञानवानों में सब क्रिया दिखती है, पर अपने निश्चय में उसे कोई स्पर्श नहीं करती। जैसे नट स्वाँग ले आता है और चेष्टा करता दीखता है, पर हृदय से अपने नटत्व भाव में उसे निश्चय होता है, वैसे ही ज्ञानवान् को भी सब क्रियाओं में अपने आत्मभाव का निश्चय होता है। जैसे जिसको स्वप्न आता है, वह यदि स्वप्न भी अपना पूर्वरूप स्मरण रखता है तो स्वप्न के पदार्थ में बर्तता है, तो भी स्वप्न के सुख में अपने को सुखी और दुख में दुखी नहीं मानता—सब सृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् को स्वरूप के निश्चय से सुख-दुःख का क्षोभ नहीं होता। जो ऐसे पुरुष हैं, उनको दुःख से कष्ट होता है ? जैसी उनकी इच्छा होती है, वैसे ही सिद्धि होकर भासती है। हे राम ! यह जितनी सृष्टि है, सब चित्सत्ता में है। योगीश्वर पुरुष उसी में स्थित होकर जहाँ पहुँचना चाहते हैं, वहाँ अन्तवाहक मे जा पहुँचते हैं। तीनों काल उनको विद्यमान होते हैं। साधन कुछ नहीं, परन्तु ज्ञानी अवश्य किसी काम के लिए यत्न नहीं करते—जैसा प्राप्त होता है, उसी में प्रसन्न रहते हैं। हे राम ! एक समय ब्रह्माजी ऊर्ध्वमुख से सामवेद का गायन करते थे। उन्होंने सदाशिव
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का मान न किया। तब सदाशिव ने अपने नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ शीश काट डाला। परन्तु ब्रह्माजी के मन में कुछ क्रोध न फुरा। उन्होंने विचारा कि मैं चिदाकाश हूँ, सो अब भी चिदाकाश हूँ, मेरा तो कुछ गया नहीं। सिर से मुझे क्या प्रयोजन है? न कुछ हानि है और न कुछ लाभ।
हे राम! इस प्रकार सब विश्व रचनेवाले ब्रह्माजी का सिर कटा। जो वे फिर सिर लगा लेते तो समर्थ थे, पर उनको सिर लगाने का कुछ प्रयोजन न था और न लगाने में कुछ हानि भी न थी। उनका भी निश्चय सदा आत्मपद में है, इस कारण उन्हें कुछ क्षोभ न हुआ। हे राम! काम के सदृश और कोई विकार नहीं है। जो सदाशिव पार्वती को वायं अङ्ग में धारण करते हैं, उन्होंने ही जिस कामदेव के पाँच बाण चलने से सब विश्व मोहित होता है, उसी काम को भस्म कर डाला। तो क्या स्त्री को वह छोड़ नहीं सकते थे? पर उनको राग-द्वेष कुछ नहीं है, इस कारण त्याग नहीं करते। त्यागने में उन्हें कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं होती और रखने में कुछ अनर्थ नहीं होता। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य होता है, उसको करते हैं, खेद नहीं मानते, इसी से वे जीवन्मुक्त हैं। विष्णुजी सदा विक्षेप में रहते हैं। आप भी कर्म करते हैं और लोगों से भी कराते हैं। शरीर धारण करते हैं और त्याग भी देते हैं। इत्यादि क्षोभ वह सहते हैं। वह इसे त्यागने को समर्थ भी हैं, परन्तु त्यागने में उनका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और करने में कुछ हानि नहीं होती। उनको लोग कई गुणों से युक्त सगुण जानते हैं, मुझको तो उनका शुद्ध चिदाकाशरूप भासित होता है। मूर्ख कहते हैं कि विष्णु श्यामसुन्दर हैं, परन्तु वे शुद्ध चिदाकाशरूप हैं और उनको सदा शुद्धस्वरूप में अहंप्रत्यय है।
आकाशमार्ग में जो सूर्य स्थित हैं, वे कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं। तो क्या उनमें स्थिर होने की सामर्थ्य नहीं है? है, परन्तु चलना और ठहरना, दोनों उनके लिए समान हैं। वह खेद से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य करते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। जीवन्मुक्त चन्द्रमा
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६८६
भी हैं, वह घटते-घटते सूक्ष्म होते दिखते हैं और कभी बढ़ते जाते हैं। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्ष उनमें होते हैं। वह केवल रात्रि को प्रकाश करते हैं। तो क्या वे अपनी क्रिया को त्याग नहीं सकते? त्याग सकते हैं; परन्तु क्षोभ से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य में विचरते हैं, इससे जीवन्मुक्त हैं। अग्नि सदा दौड़ता रहता है और यज्ञ और होम की आहुतियाँ भोजन करने को सब ओर जाता है। तो क्या उसको गृह में बैठने की सामर्थ्य नहीं है? अवश्य है, परन्तु जो कुछ अपना आचार है, उसको वह नहीं त्यागता, क्योंकि ठहरने में उसका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और चलने में कुछ हानि नहीं होती—दोनों में वह तुल्यरूप से जीवन्मुक्त है। हे राम! बृहस्पति और शुक्र को बड़ा क्षोभ रहता है। बृहस्पति देवताओं की जय के लिए यत्न करते हैं और शुक्र दैत्यों की जय के लिए यत्न करते रहते हैं। तो क्या इनको त्यागने की सामर्थ्य नहीं है? परन्तु दोनों इनको तुल्य हैं, इस कारण खेद से रहित होकर अपने कार्य में लगे रहते हैं, इससे जीवन्मुक्त पुरुष हैं। हे राम! राज्य में बड़े क्षोभ होते हैं, पर राजा जनक आनन्दसहित राज्य करते हैं और जीवन्मुक्त हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्तासुर, और मुर आदि दैत्य जीवन्मुक्त हुए हैं। वे समताभाव को लिये, खेद से रहित नाना प्रकार की चेष्टा करते और हृदय से शांत और जीवन्मुक्त रहे हैं। राजा नल, दिलीप और मान्धाता आदि ने भी समताभाव से राज्य किया है। वे भी जीवन्मुक्त हैं। ऐसे ही अनेक राजा हुए हैं। उनमें रागवान् भी देखे गये हैं, परन्तु हृदय में वे रागद्वेष से रहित शान्ति चित्त थे।
हे राम! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है, परन्तु भेद इतना ही है कि ज्ञानी का चित्त शान्त और अज्ञानी का चित्त क्षोभ में होता है। अज्ञानी इष्ट की प्राप्ति में हर्षवान् होता है और अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करता है, और ग्रहण-त्याग की इच्छा में जलता है, क्योंकि उसको संसार सत्य भासित होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसके भीतर न राग है, न द्वेष। स्वाभाविक शरीर की जो प्रारब्ध होती है, उसमें उसे कुछ भी अपना अभिमान नहीं होता। उसके निश्चय में
६६० योगवाशिष्ठ
सब आकाशरूप है। जगत् कुछ बना नहीं-भ्रममात्र है। जैसे आकाश में नीलिमा भ्रममात्र है, और दूर नहीं होती, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है, परन्तु है नहीं। जैसे आकाश में नाना प्रकार के तरुवर दिखें, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। जैसे काठ की पुतली काठरूप होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रमरूप है। जो कुछ भ्रम में भिन्न भासता है, वह सब भविष्यन्नगर में असत्य है और जो कुछ तुम्हें देख पड़ता है, वह कुछ नहीं, केवल मन कल्पना से रहित, शुद्ध-संविद्, जड़ता बिना, मुक्तस्वभाव, एक, अद्वैत आत्मसत्ता स्थित है। वह केवल आकाशरूप है। उसमें जगत् भी वही रूप है। वह पाषाण की शिला सदृश ठोस और मौन है। तुम भी उसी रूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनन्नाम द्विशताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ २१६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! उस राजा विपश्चित् ने फिर क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उनकी दशा हुई, सो सुनो। पश्चिम दिशा का विपश्चित् वन में विचरता फिरता था कि एक मत्त हाथी के आगे जा पड़ा और उसने उसे पहाड़ की कन्दरा में मार डाला। दूसरे विपश्चित् को राक्षस ले गया और बड़वाग्नि में डाल दिया। वहाँ अग्नि ने उसे भक्षण कर लिया। तीसरे विपश्चित् को एक विद्याधर स्वर्ग में ले गया। उसने वहाँ इन्द्र का मान न किया, इसलिए उसको इन्द्र ने शाप दिया और यह भस्म हो गया। इसी प्रकार चौथा भी मरा। उसके एक मच्छ ने आठ टुकड़े कर डाले। जैसे प्रलयकाल में लोक भस्म हो जाते हैं, वैसे ही चारों विपश्चित् मर गये। तब उनकी संविद् आकाशरूप हुई, परन्तु उनको जगत् देखने का संस्कार था, इससे उनकी आकाशरूप संवित् फिर जगी, उससे जाग्रत् भासित होने लगा। उसने पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, स्थावर, जङ्गमरूप जगत् को देखा और अन्तवाहक शरीर से वे चेष्टा करने लगे। उनमें से एक पश्चिम दिशा का विपश्चित् विष्णु भगवान् के स्थान में मरकर निर्वाण हो
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ६६१
गया इससे उसकी संवित् में सब अर्थ शून्य हो गये और वह वहाँ मुक्त हुआ। एक मच्छ के उदर में सहस्र वर्ष पर्यन्त रहा। फिर एक देश का राजा हुआ और वहाँ राज्य करने लगा। एक चन्द्रमा के निकट गया, वहाँ मरकर चन्द्रमा के लोक को पहुँचा। और एक बहता हुआ समुद्र के पार हुआ और आगे चौरासी हजार योजन पृथ्वी को नाँघता गया। इसी प्रकार चारों फिर जिये और समुद्र, वन और पर्वतों को नाँघते गये।
सबको आगे दशसहस्र योजन सुवर्ण की पृथ्वी मिली, जहाँ देवताओं के विचरने के स्थान हैं। उसको भी वे नाँघते गये। आगे लोकालोक पर्वत आया, जिसने सब पृथ्वी को घेर लिया है। जैसे वृक्षों से वन का आवरण होता है, वैसे ही उस पर्वत ने पचास कोटि योजन पृथ्वी का आवरण किया है। वह पचास हजार योजन ऊँचा है—वे उस लोकालोक पर्वत में पहुँचे, जहाँ तारों का नक्षत्रचक्र घूमता है। उसको भी वे नाँघ गये। उसमें आगे एक शून्य नक्षत्र था। वह महाशून्य था। वहाँ पृथ्वी, जल आदि कोई तत्त्व न था। एक शून्य आकाश है, जहाँ न कोई स्थावर पदार्थ है, न कोई जङ्गम पदार्थ है, न कोई उपजता है न कभी मिटता है। उसको भी उन्होंने देखा। इसी प्रकार सम्पूर्ण भूगोल उन्होंने देखा। राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूगोल क्या है? किसके आश्रय में है? उसके ऊपर क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे गेंद होता है, वैसे भूगोल है और वह संकल्प के आश्रय में है। उसके सब ओर आकाश है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र सहित यह चक्र फिरता है। हे राम ! यह कोई वस्तु बुद्धि से नहीं बनी, संकल्प से बनी है। जो वस्तु बुद्धि से बनी होती है, वह क्रम से स्थित होती है, पर यह तो विपर्यरूप से स्थित है। पृथ्वी के चहुँफेर दसगुना जल है। उसके बाद दसगुनी अग्नि है। उसके उपरान्त दसगुना वायु है और फिर ब्रह्माण्ड खप्पर है।
वह खप्पर एक नीचे और एक ऊपर को गया है उसके मध्य में जो पोल है, वह आकाश है, जो वज्रसार की नाईं है। इसका विस्तार
६६२ ❊ योगवासिष्ठ ❊
अनन्तकोटि योजन है। उस ब्रह्माण्ड का उसमें भूगोल है। उसके उत्तर में सुमेरु पर्वत, पश्चिम में लोकालोक पर्वत है, और ऊपर नक्षत्रचक्र घूमता है। जहाँ वह जाता है, वहाँ प्रकाश होता है, और जहाँ वह नहीं होता, वहाँ तमरूप भासित होता है सो सब संकल्प की रचना है। जैसे बालक संकल्प से पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही चैतन्यरूपी बालक ने यह संकल्परूपी भूगोल रचा है। हे राम! जैसे-जैसे उस समय उसमें निश्चय हुआ है वैसे ही वैसे वह स्थित हुआ है। जहाँ पृथ्वी रची है, वहीं वह स्थित है। जहाँ खात रचा है, वहाँ खात ही है। परन्तु जैसे स्वप्न में अविद्यमान प्रतिभा होती है वैसे ही भूगोल है। हे राम! जिनको ऐसा ज्ञान है कि सुमेरु में देवता और पूर्वाद दिशाओं में मनुष्य आदि जीव रहते हैं, वे पण्डित होने पर भी मूर्ख हैं; क्योंकि ये देवता आदि तो भ्रममात्र हैं, कुछ बने नहीं। जो मुझ सरीखे तत्त्ववेत्ता हैं, उनको ज्ञाननेत्र से आत्मसत्ता ज्यों की त्यों दिखती है, और जो अज्ञानी मन सहित षट् इन्द्रियों से देखते हैं, उनको जगत् दिखता है; ज्ञानवानों को परब्रह्म सूक्ष्म ज्यों का त्यों भासता है। वे जगत् को असत् जानते हैं। जैसे आकाश में अनहोती नीलमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में अनहोता जगत् दिखता है। जैसे नेत्र दोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासित होता है। सो वह केवल आभासमात्र है।
हे राम! जगत् उपजा भी दिखता है। और नष्ट होता भी दिखता है, परन्तु बना कुछ नहीं। जैसे संकल्प का रचा नगर अपने मन में भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मन में फुरता है। यह सम्पूर्ण भूगोल संकल्प में स्थित है। जैसे बालक संकल्प करके पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही भूगोल है। यह ब्रह्माण्ड सोकोटि योजन पर्यन्त विस्तृत है। उसका एक भाग नीचे गया है और एक ऊपर को। उसमें चैतन्य रूपी बालक ने यह भूगोल रचा है, सो संकल्प के आश्रय से खड़ा है। जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही भासता है। इस पृथ्वी के उत्तर में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम और लोकालोक पर्वत है और ऊपर तारों और
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६६३
नक्षत्रों का चक्र घूमता है। लोकालोक के जिस ओर वह आता है, उस ओर प्रकाश होता है। भूगोल ऐसे है, जैसे गेंद होता है। उसके एक ओर पाताल, एक ओर स्वर्ग है और एक ओर मध्यमण्डल है। आकाश सब ओर है। पातालवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं, आकाशवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं और मध्यवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं। इस प्रकार भूगोल है। उसके ऊपर महातमरूप एक शून्य खात है। वहाँ न पृथ्वी है, न कोई पहाड़ है, न स्थावर है, न जङ्गम है और न कुछ उपजा है। उसके ऊपर एक सुवर्ण की दीवार है, जिसका विस्तार दस सहस्र योजन है। उसके ऊपर दसगुना जल है। वह पृथ्वी को चहुँफेर से घेरे है। उससे परे दसगुना अग्नि है। फिर दसगुना वायु है। उसके आगे आकाश है। फिर ब्रह्माकाश महाकाश है, जिसमें अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। परन्तु ये तत्त्व जैसे तृण के आश्रय से कपूर ठहरता है, वैसे ही पृथ्वीभाग के आश्रय से ठहरे हैं। वास्तव में यह शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का चमत्कार है, जो आकाशवत् निर्मल है। उसमें कोई क्षोभ नहीं है। वह परमशान्त, अनन्त और सबका अपना रूप है।
हे राम ! अब फिर विपश्चित् का वृत्तान्त सुनो। जब वे लोकालोक पर्वत पर पहुँचे, तब एक शून्य खात (खाई) उनको देख पड़ा। वह पर्वत से उतरकर खात में जा पड़े। वह खात भी पर्वत के शिखर पर था। वहाँ शिखर की नाईं बड़े-बड़े पक्षी भी रहते थे, इस कारण उन पक्षियों ने चोंचों से इनके शरीर चूर्ण किये। तब उन्होंने अपने स्थूल शरीर को त्यागकर अपना सूक्ष्म अन्तवाहक शरीर जाना। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिभौतिकता कैसे होती है और अन्तवाहक क्या है ? फिर उन्होंने क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे कोई संकल्प में दूर से दूर चला जाय तो जिस शरीर से जाय वह अन्तवाहक है; और जो पाञ्चभौतिक शरीर प्रत्यक्ष दिखता है वह आधिभौतिक है। जब मार्ग में कहीं जाने को चित्त में संकल्प उठता है, तब स्थूल शरीर गये बिना नहीं पहुँच सकता और जब मार्ग में
६६४ ✤ योगवासिष्ठ ✤
चले तब पहुँचता है, वहाँ आधिभौतिक है और यह प्रमाद से होता है । जैसे रस्सी का भूलने से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से आधिभौतिक शरीर भासित होता है, और जैसे कोई मनोराज्य का पुर बनाकर उसमें आप भी एक शरीर बनकर चेष्टा करता फिरे तो उसे जब तक पूर्व का शरीर नहीं भूलता, तब तक वह संकल्प शरीर से चेष्टा करता है । वहाँ आन्तवाहक है । उस शरीर को संकल्पमात्र जानना 'विशेष बुद्धि' कहलाता है, आत्मबोध हुए बिना जो उस संकल्पशरीर में दृढ़ भावना होती है, तो उसका नाम आधिभौतिक होता है—वह घट-पट कहलाता है । इसमें जबतक शरीर का स्मरण है, तब तक आधिभौतिकता नहीं निवृत्त होती । और जब शरीर का विस्मरण होता है, तब आधिभौतिकता मिट जाती है । विपश्चित् आत्मबोध से रहित थे और जहाँ चाहते थे वहाँ चले जाते थे, पर स्वरूप से न कुछ आन्तवाहक है और न कुछ आधिभौतिक है । प्रमाद से ये सब आकार भासित होते हैं । वास्तव में सब चिदाकाशरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी, सब वही है, और उसी के प्रमाद से विपश्चित् अविद्याकृत जगत् को देखने चले थे । वह अविद्या भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं—ब्रह्म ही है, तब ब्रह्म का अन्त कहाँ आवे ? वहाँ से वे चले, परन्तु जानते थे कि हमारा आन्तवाहक शरीर है ।
निदान वे सब पृथ्वी को नाँघ गये । फिर जल को भी नाँघ गये । उनके बाद जो सूर्य सा दाहक अग्नि का आवरण प्रकाशमान है, उसको भी नाँघकर मेघ और वायु के आवरण को भी नाँघ गए । फिर आकाश को भी नाँघ गये । उनके बाद ब्रह्माकाश था, जहाँ उनको संकल्प के अनुसार फिर जगत् भासित होने लगा, पर उनको भी वे नाँघ गये । फिर आगे ब्रह्माकाश मिला, फिर उनको पञ्चभूत भासित हुए । उनके आवरण को भी वे नाँघ गये । फिर उस ब्रह्माण्डकपाट के बाद तत्त्वों को नाँघकर ब्रह्माकाश मिला । उसमें एक और पाञ्चभौतिक ब्रह्माण्ड था । उसको भी नाँघ गये, पर अन्त न पाया । स्वरूप के प्रमाद से दृश्य का अन्त जानने को वे भटकते फिरे, पर अविद्यारूप संसार का अन्त कैसे
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६६५
आवे ? यह जीव तब तक अन्त लेने को भटकता फिरता है, जब तक अविद्या नहीं नष्ट होती; जब अविद्या नष्ट होगी, तभी अविद्यारूप संसार का अन्त होगा । हे राम ! जगत् कुछ बना नहीं, वही ब्रह्माकाश ज्यों का त्यों स्थित है । उसका न जानना ही संसार है । जब तक उसका प्रमाद है, तब तक जगत् का अन्त न आवेगा । जब स्वरूप का ज्ञान होगा, तब अन्त आवेगा । सो वह जानना क्या है ? चित्त का निर्वाण करना ही जानना है । जब चित्त का निर्वाण होगा; तब जगत् का अन्त आवेगा । जब तक चित्त भटकता फिरता है, तब तक संसार का अन्त नहीं आता । इससे चित्त का नाम ही संसार है । जब चित्त आत्म-पद में स्थित होगा, तब जगत् का अन्त होगा । इस उपाय के बिना शान्ति नहीं प्राप्त होती ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिदुपाख्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकविंशतितमः सर्गः ॥ २२० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे जो दो विपश्चित् थे, उनकी क्या दशा हुई, यह भी कहो । वे तो दोनों एक ही थे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक का तो निर्वाण हुआ था, दूसरा ब्रह्माण्डों को नाँघता-नाँधता और एक ब्रह्माण्ड में गया । वहाँ उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ । उनकी संगति से उसको ज्ञान हुआ । ज्ञान को पाकर वह भी निर्वाण हो गया । बाकी एक अब तक दूर फिरता है और एक यहाँ पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर विचरणता है । हे राम ! यह जगत् आत्मा का आभास है । जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है और जब तक किरणें हैं, तब तक जलाभास निवृत्त नहीं होता, वैसे ही जबतक आत्म-सत्ता है, तब तक जगत् का चमत्कार निवृत्त नहीं होता और आत्मा के जानने से जगत्सत्ता नहीं रहती । जैसे किरणों के अदृश्य होने से जलाभास नहीं रहता और जो जल दिखता है तो भी किरणों ही की सत्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मा के जाने से आत्मा की सत्ता ही भासती है—भिन्न जगत् की सत्ता नहीं भासित होती । राम ने पूछा, हे भगवन् ! विपश्चित् एक ही था तो एक ही संवित् में भिन्न-भिन्न
६६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
वासना कैसे हुई ? एक मुक्त हो गया, एक मृग होकर फिरता रहा और एक आगे निर्वाण हो गया—वह भिन्नता कैसे हुई ? संवित् तो एक ही था, उसमें कम और अधिक फल कैसे प्राप्त हुए ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वासना देश, काल और पदार्थों से होती है । उसमें जिसकी दृढ़ भावना होती है, उसकी जय होती है । जैसे एक पुरुष ने मनोराज्य में अपनी चार मूर्तियाँ कल्पित कीं और उनमें भिन्न-भिन्न वासना स्थापित कीं, पर संवित् तो एक है, यदि पहले का शरीर भूलकर उनमें दृढ़ हो गये तो जैसी-जैसी भावना उनके शरीर में दृढ़ होती है, वही प्राप्त होती है, वैसे ही संवित् में नाना प्रकार की वासनाएँ फुरती हैं । जैसे एक ही संवित् स्वप्न में नाना प्रकार रचती है और वासना भिन्न-भिन्न होती है, वैसे ही आकाशरूप संवित् में भिन्न-भिन्न वासना होती है ।
हे राम ! उनकी संवित् एक थी, परन्तु देश, काल और क्रिया से वासना भिन्न-भिन्न हो गई और पूर्व की संवित् स्मृति भूल गई, उससे उन्होंने न्यून और अधिक फल पाये । उस संवित् का क्या रूप है ? हे राम ! देश से देशान्तर को जो संवेदन जाता है, उसके बीच जो संवित्-सत्ता है, वह ब्रह्मसत्ता है । जाग्रत् के आकार को छोड़ने और स्वप्न में आने के मध्य जो ब्रह्मसत्ता है, वह किञ्चनरूप जगत् होकर भासित होती है, परन्तु किञ्चन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं । वह एक है, न दो है, एक कहना भी नहीं होता तो दो कहाँ हो और जगत् कहाँ हो ? यही अविद्या है कि न होने पर भी भासती है । जैसी-जैसी वासना फुरती है, उसमें जो दृढ़ होती है, उसकी जय होती है । इस कारण एक विपश्चित जनार्दन (विष्णु) के स्थान में निर्वाण को प्राप्त हो गया और दूसरा दूर से दूर ब्रह्माण्ड को नाँघता गया । उस मन्तों का संग प्राप्त हुआ, जिससे ज्ञान उदय होकर वासना मिट गई और उसका अज्ञान नष्ट हो गया । जैसे सूर्य का उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही जब उसका अज्ञान नष्ट हो गया, तब वह उस पद को प्राप्त हुआ जिसके अज्ञान में जीव दूर से दूर भटकता है । तीसरा दूर से दूर भटकता फिरता है और चौथा पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर
८६८ श्री योगवाशिष्ठ
ब्रह्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित होते हैं। इस कारण यह मृग विपश्चित् है, उसी निश्चय को धारण किये हुए है। यह और वह जो पहाड़ की कन्दरा में है दोनों तुल्य हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! वह विपश्चित् अब कहाँ है और उसका क्या आचार है? अब मैं जानता हूँ कि उसका कार्य हुआ है। अब चलकर मुझको दिखाओ और इसके दर्शन देकर अज्ञान पाश से मुक्त करो।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे अङ्ग! जब रामजी ने इस प्रकार कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ तुम्हारा न्हाना का स्थान है और तुम क्रीड़ा करते हो उस जगह वह मृग बँधा हुआ है। यह तुमको लिङ्गदेश के राजा ने दिया है और बहुत सुन्दर है, इस कारण तुमने उसे रक्खा है। उसको मँगाओ। तब रामजी ने अपने भृत्याओं मे, जो निकटवर्ती थे, कहा कि उस मृग को सभा में ले आओ। हे राजन्! जब इस प्रकार रामजी ने कहा, तब वे सभा में उस मृग को ले आये और जितने श्रोता सभा में बैठे थे वे बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुए। वह मृग बड़ी गर्दन से बड़ा सुन्दर और कमल दल से विशाल नेत्रवाला था। कभी वह घास खाने लगता, कभी सभा में खेलता और कभी ठहर जाता। तब रामजी ने कहा, हे भगवन्! आप इसको कृपा करके मनुष्य बना दीजिये और उपदेश करके जगाइये, जिससे हमारे साथ प्रश्न-उत्तर करे। अभी तो यह प्रश्न-उत्तर नहीं करता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार इसको उपदेश न लगेगा, क्योंकि जिसका कोई इष्ट होता है, उसी से उसको सिद्धि होती है। इससे मैं इसके इष्ट को ध्यान करके बुलाता हूँ—इससे इसका कार्य सिद्ध होगा। वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! इस प्रकार कहकर वशिष्ठजी ने कमण्डलु हाथ में लेकर तीन बार आचमन किया और पद्मासन बाँध, नेत्र मूँद, ध्यान में स्थित होकर अग्नि का आवाहन किया। हे अग्नि देव! यह तुम्हारा भक्त है, इसकी सहायता और इस पर दया करो। तुम सन्तों का दयालु स्वभाव है! जब वशिष्ठजी ने ऐसे कहा, तब सभा में बड़े तेजस्वी अग्नि की ज्वाला काष्ठ-अङ्गार से रहित प्रकट हुई और जलने लगी। जब ऐसे
- निर्वाण प्रकरण * ६६६
अग्नि जागी, तब वह मृग उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके चित्त में बड़ी भक्ति उत्पन्न हुई ।
तब वशिष्ठजी ने नेत्र खोलकर अनुग्रह सहित मृग की ओर देखा । उससे उसके सम्पूर्ण पाप भस्म हो गये । वशिष्ठजी ने अग्नि से कहा, हे भगवन्, यह तुम्हारा भक्त है । अपना पहले की भक्ति स्मरण करके इस पर दया करो और इसके मृगशरीर को दूर करके इसको विपश्चित् शरीर दो, जिससे यह आधिव्याश्रम में मुक्त हो । हे राजन् ! इस प्रकार अग्नि से कहकर वशिष्ठजी राम से बोले, हे राम ! अब यह मृग अग्नि में प्रवेश करेगा, तब इसका मनुष्यशरीर हो जायगा । वशिष्ठजी ऐसे कहते ही थे कि वह मृग अग्नि को देखकर एक चरण पीछे को हटा और उछलकर अग्नि में प्रवेश कर गया । जैसे बाण निशाने में प्रवेश करते हैं, वैसे ही उसने प्रवेश किया । हे राजन् ! उस मृग को कुछ खेद न हुआ, बल्कि उसको अग्नि आनन्दरूप देख पड़ा । तब उसका मृगशरीर अन्तर्धान हो गया । वह महाप्रकाशरूप मनुष्यशरीर धारण किये अग्नि से निकला । जैसे कपड़े के ओढ़े से स्वाँगिया स्वाँग धरकर निकल आता है, वैसे ही वह निकल आया । वह अति सुन्दर वस्त्र पहने हुए, शीश पर मुकुट, कण्ठ में रुद्राक्ष की माला और यज्ञोपवीत धारण किये था । अग्नि सा वह तेजस्वी था । सभा में जो लोग बैठे थे, उनसे भी अधिक उसका तेज था—मानो अग्नि को भी लज्जित कर रहा हो । जैसे सूर्य के उदय होने पर चन्द्रमा का प्रकाश फीका हो जाता है, वैसे ही वह सबसे अधिक प्रकाश मान हो गया । फिर जैसे समुद्र से तरङ्ग निकलकर लीन हो जाता है, वैसे ही वह अग्नि अन्तर्धान हो गये । यह देखकर राम को आश्चर्य हुआ और सब सभा विस्मय को प्राप्त हुई ।
तब बड़े प्रकाश से युक्त विपश्चित् निकलकर ध्यान में लग गया । विपश्चित् से लेकर इस शरीर तक अपने सब शरीर स्मरण करके नेत्र खोल वशिष्ठजी के निकट आ साष्टाङ्ग प्रणाम कर बोला, हे ब्राह्मण ! ज्ञान के सूर्य और प्राण के दाता ! तुमको मेरा नमस्कार है ।
७०० ✵ योगवाशिष्ट ✵
हे राजन् ! जब इस प्रकार उसने कहा तब वशिष्ठजी ने उसके शिर पर हाथ रक्खा और कहा, हे राजन् ! तू उठ खड़ा हो। अब मैं तेरी अविद्या दूर करूँगा और तू अपने स्वरूप को प्राप्त होगा। तब राजा विपश्चित ने उठकर राजा दशरथ को प्रणाम किया और बोला, हे राजन् ! तुम्हारी जय हो। राजा दशरथ ने आसन से उठकर कहा, हे राजन् ! तुम बहुत दूर फिरते रहे हो, अब यहाँ मेरे पास बैठो। विश्वामित्र आदि जो ऋषि बैठे थे, उनको यथायोग्य प्रणाम करके राजा विपश्चित बैठ गया। राजा दशरथ ने विपश्चित को, जो बड़े प्रकाश को धारण किये था, भाम कहके बुलाया और कहा, हे भाम ! तुम संसारभ्रम के लिए चिरकाल फिरते रहे हो; थके होगे, अब विश्राम करो और जो-जो देश-काल-क्रिया की है और देखा है, सो कहो। यह आश्चर्य है कि अपने मन्दिर में सोये हो और निद्रादोष से गड्ढे में गिरते फिरे और देश-देशान्तर में भटकते फिरे। यही अविद्या है। हे भाम ! जैसे वन का विचरनेवाला हाथी जंजीर में बँधा हुआ दुःख पाता है वैसे ही तुम विपश्चित भी थे और अविद्या से जगत् के देखने के लिए भटकते रहे। हे राजन् ! जगत् कुछ वस्तु नहीं है, पर भासित होता है, यही माया है। जैसे भ्रम से आकाश में नाना प्रकार के रङ्ग दिखते हैं, वैसे ही अविद्या से ये जगत् भासित होने और सत्य प्रतीत होने हैं, पर सब आकाशरूप हैं और आकाश में स्थित हैं। उस आकाश में जो कुछ तुमने आत्मरूपी चिन्तामणि के चमत्कार में देखा है, वह कहो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिद्दर्शनंनाम द्विशताधिकैकविंशतितमःसर्गः॥ २२१ ॥
दशरथजी बोले, हे भाम ! बड़ा आश्चर्य है कि तुम विपश्चित बुद्धिमान थे, और चेष्टा से तुमने अविपश्चित (मूर्ख) बुद्धि की है, जो अविद्या के देखने को समर्थ हुए थे। यह जगत्प्रतिभा तो मिथ्या है; असत्य के ग्रहण की इच्छा तुमने क्यों की ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! जब इस प्रकार राजा दशरथ ने कहा, तब प्रसंग पाकर
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७०१
विश्वामित्र बोले. हे राजन्, दशरथ ! यह चेष्टा वही करता है, जिसको परम बोध नहीं होता, पर केवल मूर्ख और अज्ञानी भी नहीं होता, क्योंकि जिसको परमबोध और आत्मा का अनुभव होता है, वह जगत् को अविद्याकृत जानता है और उस अविद्याकृत जगत् का अन्त जानने को इतना यत्न नहीं करता, क्योंकि वह तो उसे असत्य जानता है। और जो देहाभिमानी मूर्ख अज्ञ है, वह भी यह यत्न नहीं करता, क्योंकि उसको देखने की सामर्थ्य भी नहीं होती। इससे मध्य भावी है। जो आत्मबोध से रहित है और जिसने आधिभौतिक शरीर का त्याग किया है, वही संसार देखने का यत्न करता है। जिनको उत्तम बोध नहीं हुआ, वे इस प्रकार बहुत भटकते फिरते हैं। हे राजन् ! इसी प्रकार वटधामा भी इसी ब्रह्माण्ड में फिरते हैं। मन्तर लाख वर्ष इनको इसी ब्रह्माण्ड में फिरते व्यतीत हुए हैं। उन्होंने भी यही निश्चय धारण किया है कि पृथ्वी कहाँ तक चली जाती है। इस निश्चय से वे निवृत्त नहीं होते और इसी ब्रह्माण्ड में घूमते हैं। उनको अपनी वासना के अनुसार विपरीत और ही और स्थान भासित होते हैं।
हे राजन् ! जैसे किसी बालक का रचा संकल्प का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह भूगोल ब्रह्मा के संकल्प से स्थित है। संकल्प से गेंद के समान आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इन पाँचों तत्त्वों का यह ब्रह्माण्ड रचा है। उसके चौफेर चींटियाँ फिरती हैं। जिस ओर से वे जाती हैं, वह ऊर्ध्व दिखता है सो ओर ही निश्चय होता है। वैसे ही इस संकल्प के रचे भूगोल के किसी कोण में वटधामा जीव हुआ है। हे राजन् ! उसके तीन पुत्र थे। उनके मन में यह संकल्प उदय हुआ कि हम जगत् का अन्त देखें। इसी संकल्प में फिरत-फिरते वे पृथ्वी नाँघते हैं। पृथ्वी और जल आता है। जल को नाँघते हैं। फिर आकाश आता है। फिर पृथ्वी, जल, वायु फिर उसी भूगोल के चौफेर फिरते हैं। जैसे आकाश में गेंद हो, वैसे ही यह पृथ्वी आकाश में है। इसका नीचे ऊपर कोई नहीं। चरण नीचे शिर ऊपर, इसी तरह वट-
७०२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
धाना जीव उर्मी के चौफेर घूमते रहे, परन्तु अपने निश्चय में और का और जानते रहे। जब तक स्वरूप का प्रमाद है, तब तक जगत् का अभाव नहीं होता और जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब जगत् ब्रह्मरूप हो जाता है। जगत् कुछ बना नहीं, फुरने में भासित होता है। जैसे स्वप्न में अज्ञान में अनन्त जगत् दीखते हैं। यह फुरना परब्रह्म में हुआ है, जो फुरने में है, वह भी परब्रह्म है। कुछ बना नहीं—आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे पत्थर की शिला ठोस होती है, वैसे ही आत्मतत्त्व चैतन्यघन है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। सब कल्पना परब्रह्मरूप है और ब्रह्म ही कल्पनारूप है। इस जड़ और चैतन्य में कुछ भेद नहीं। हे राजन् ! जिसको जगत् कहते हो, वह ब्रह्मसत्ता ही है। न कुछ उत्पन्न हुआ है और न प्रलय होता है-सब ब्रह्म ही है। जैसे पहाड़ में पत्थर के सिवा कुछ नहीं होता, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मसत्ता के सिवा कुछ नहीं। जैसे पाषाण की पुतली पाषाणरूप ही है, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मरूप ही है। एक सूक्ष्म अनुभवअणु में अनेक अणु होते हैं, जैसे एक पहाड़ में अनेक शिलाएँ होती हैं। हे राजन् ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् ब्रह्मरूप भासित होता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार भासित होता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं है, परन्तु जब तक संकल्प है, तब तक जगत् फुरता है। जैसे रत्नों की चमक होती है, वैसे ही जगत् आत्मा का चमत्कार है। चैतन्य आत्मा के आश्रय में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, अतः सब सृष्टि आत्मरूप है। आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं। जो जाग्रत् पुरुष ज्ञानवान् हैं, उनको ब्रह्मरूप ही दिखता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार का जगत् दिखता है।
हे राजन् ! कुछ लोग इसे शून्य कहते हैं कि अर्थात् यह शून्य ही है, और कुछ नहीं। कुछ इसको जगत् कहते हैं और कुछ ब्रह्म कहते हैं। जिस किसी को निश्चय होता है, उनको वैसा रूप दिखता है। आत्मरूपी चिन्तामणि है, जैसा-जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा-वैसा ही भासित होता है। सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। जैसा-जैसा उसमें
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७०३
निश्चय होता है, वैसा ही वैसा होकर भासित होता है । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य—त्रिपुटी जो दिखती है, वह भी ब्रह्म होकर भासित होती है, द्वितीय कुछ वस्तु नहीं और जो कुछ दिखता है, वही अज्ञान है । हे राजन् ! जब तक वासना नष्ट नहीं होती, तब तक दुःख भी नहीं मिटते, और जब वासना मिट जाती है, तब सब जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही भासित हो और रागद्वेष किसी में न रहता । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है, जब पूर्व का स्वरूप स्मरण होता है तो सब रूप आप ही हो जाता है और रागद्वेष मिट जाता है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप भासित होता है और विकार से रहित होता है । पूर्व, अपूर्व और अपर को विचारना कि यह शुभ है और यह अशुभ है और अशुभ का त्याग करना, यह गौण विचार है । जब-तक पूर्वापर विचार मन में रहता है, तब तक जीव जगत् में भटकता है और बँधा रहता है, क्योंकि शुभ-अशुभ दोनों जगत् में हैं । जब इनका विस्मरण हो जाय और सम्पूर्ण जगत् को भ्रममात्र जानकर आत्मपद में सावधान हो, तब जीव मुक्त होता है । इस जीव के बन्धन का कारण अपनी वासना ही है । जब तक जगत् में वासना होती है तब तक राग-द्वेष उपजता है और जीव उससे बँधा रहता है । जिनको जगत् के सुख-दुःख में रागद्वेष की भावना नहीं उपजती, और वासना भी नष्ट हो जाती है, उनको यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही दिखता है और जगत् में दुःखदायक कुछ नहीं रहता । उनको सब ब्रह्म ही दिखता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वटधानोपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२२ ॥
दशरथजी ने विपश्चित् से पूछा, हे भास ! तुम चिरकाल पर्यन्त जगत् में फिरते रहे हो । जिस प्रकार तुमने चेष्टा की है और जो देश, काल, पदार्थ देखे हैं, सो सब कहो । भास बोले, हे राजन् ! मैं जगत् को देखता फिरा हूँ और फिरता-फिरता थक गया हूँ, परन्तु देखने की इच्छा होने के कारण मुझको दुःख नहीं हुआ । जो कुछ मैंने चेष्टा की है और जो देखा है, वह कहता हूँ । हे राजन् ! मैंने बहुत जन्म पाये हैं,
७०४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
और बहुत बार मृतक हुआ हूँ। बहुत बार शाप पाया है, ऊँच-नीच जन्म लिये हैं और मर-मर गया हूँ। बहुत ब्रह्माण्ड देखे हैं। परन्तु ये सब अग्नि-देवता के वर से देखे हैं। एक बार मैं वृक्ष हुआ और सहस्र वर्ष पर्यन्त फूल, फल, टाम से युक्त रहा। जब कोई काटता, तब मैं दुःखी होता और मेरे हृदय में पीड़ा होती। फिर वह शरीर छूटा तो मैं सुमेरु पर्वत पर सुवर्ण का कमल हुआ और वहाँ का जल पिया। फिर एक देश में पक्षी हुआ। सौ वर्ष पक्षी रहकर फिर सियाल हुआ। मुझे हाथी ने चूर्ण किया, उससे मृतक होकर फिर सुमेरु पर्वत पर सुन्दर मृग हुआ। देवता और विद्याधर मेरे साथ प्रीति करने लगे। कुछ काल में मरकर फिर देवताओं के वन में मातंग हुआ। वहाँ देवियाँ और विद्याधरियाँ मुझको स्पर्श करतीं और सुगन्ध लेती थीं। तब मैं देवताओं की स्त्री हुआ, फिर सिद्ध हुआ और मेरा वचन सत्य होने लगा। फिर मैंने और शरीर धरा और एक ब्रह्माण्ड नाँघ गया। इसी प्रकार कई ब्रह्माण्ड में नाँघ गया। तब एक ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्य देखा, सो सुनो। वहाँ मैंने एक स्त्री देखी, जिसके शरीर में कई ब्रह्माण्ड थे। इससे मुझे आश्चर्य हुआ। फिर देश काल-क्रिया से पूर्ण कई त्रिलोकी देखीं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही मुझको उसमें जगत् दिखे। तब मैंने उससे कहा, हे देवि ! तुम कौन हो और यह तुम्हारे शरीर में क्या है? देवी बोली, हे साधो ! मैं शुद्ध चितशक्ति हूँ और ये सब मेरे अङ्ग मेरे में स्थित हैं। मेरी क्या बात पूछनी है—यह सब जगत् जो तू देखता है चिद्रूप है। चैतन्य से भिन्न और कुछ नहीं। सबमें ब्रह्माण्ड (त्रिलोकी) स्थित है, सो अपना रूप ही है। जो अपने स्वभाव में स्थित हैं, उनको अपने ही में ये दिखते हैं और जो स्वरूप में स्थित नहीं हैं, उनको जगत् बाहर और अपने से भिन्न भासित होते हैं।
हे राजन् ! यह जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि और गन्धर्व नगर दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे जल में तरङ्ग दिखता है, सो जलरूप है—तरङ्ग कुछ भिन्न वस्तु नहीं होते, वैसे ही सब जगत् चिद्रूप में भासित होता है, सो चैतन्य से भिन्न