योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वासना कैसे हुई ? एक मुक्त हो गया, एक मृग होकर फिरता रहा और एक आगे निर्वाण हो गया—वह भिन्नता कैसे हुई ? संवित् तो एक ही था, उसमें कम और अधिक फल कैसे प्राप्त हुए ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वासना देश, काल और पदार्थों से होती है । उसमें जिसकी दृढ़ भावना होती है, उसकी जय होती है । जैसे एक पुरुष ने मनोराज्य में अपनी चार मूर्तियाँ कल्पित कीं और उनमें भिन्न-भिन्न वासना स्थापित कीं, पर संवित् तो एक है, यदि पहले का शरीर भूलकर उनमें दृढ़ हो गये तो जैसी-जैसी भावना उनके शरीर में दृढ़ होती है, वही प्राप्त होती है, वैसे ही संवित् में नाना प्रकार की वासनाएँ फुरती हैं । जैसे एक ही संवित् स्वप्न में नाना प्रकार रचती है और वासना भिन्न-भिन्न होती है, वैसे ही आकाशरूप संवित् में भिन्न-भिन्न वासना होती है ।
हे राम ! उनकी संवित् एक थी, परन्तु देश, काल और क्रिया से वासना भिन्न-भिन्न हो गई और पूर्व की संवित् स्मृति भूल गई, उससे उन्होंने न्यून और अधिक फल पाये । उस संवित् का क्या रूप है ? हे राम ! देश से देशान्तर को जो संवेदन जाता है, उसके बीच जो संवित्-सत्ता है, वह ब्रह्मसत्ता है । जाग्रत् के आकार को छोड़ने और स्वप्न में आने के मध्य जो ब्रह्मसत्ता है, वह किञ्चनरूप जगत् होकर भासित होती है, परन्तु किञ्चन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं । वह एक है, न दो है, एक कहना भी नहीं होता तो दो कहाँ हो और जगत् कहाँ हो ? यही अविद्या है कि न होने पर भी भासती है । जैसी-जैसी वासना फुरती है, उसमें जो दृढ़ होती है, उसकी जय होती है । इस कारण एक विपश्चित जनार्दन (विष्णु) के स्थान में निर्वाण को प्राप्त हो गया और दूसरा दूर से दूर ब्रह्माण्ड को नाँघता गया । उस मन्तों का संग प्राप्त हुआ, जिससे ज्ञान उदय होकर वासना मिट गई और उसका अज्ञान नष्ट हो गया । जैसे सूर्य का उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही जब उसका अज्ञान नष्ट हो गया, तब वह उस पद को प्राप्त हुआ जिसके अज्ञान में जीव दूर से दूर भटकता है । तीसरा दूर से दूर भटकता फिरता है और चौथा पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर