सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1502, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1502

८६८ श्री योगवाशिष्ठ

ब्रह्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित होते हैं। इस कारण यह मृग विपश्चित् है, उसी निश्चय को धारण किये हुए है। यह और वह जो पहाड़ की कन्दरा में है दोनों तुल्य हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! वह विपश्चित् अब कहाँ है और उसका क्या आचार है? अब मैं जानता हूँ कि उसका कार्य हुआ है। अब चलकर मुझको दिखाओ और इसके दर्शन देकर अज्ञान पाश से मुक्त करो।

इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे अङ्ग! जब रामजी ने इस प्रकार कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ तुम्हारा न्हाना का स्थान है और तुम क्रीड़ा करते हो उस जगह वह मृग बँधा हुआ है। यह तुमको लिङ्गदेश के राजा ने दिया है और बहुत सुन्दर है, इस कारण तुमने उसे रक्खा है। उसको मँगाओ। तब रामजी ने अपने भृत्याओं मे, जो निकटवर्ती थे, कहा कि उस मृग को सभा में ले आओ। हे राजन्! जब इस प्रकार रामजी ने कहा, तब वे सभा में उस मृग को ले आये और जितने श्रोता सभा में बैठे थे वे बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुए। वह मृग बड़ी गर्दन से बड़ा सुन्दर और कमल दल से विशाल नेत्रवाला था। कभी वह घास खाने लगता, कभी सभा में खेलता और कभी ठहर जाता। तब रामजी ने कहा, हे भगवन्! आप इसको कृपा करके मनुष्य बना दीजिये और उपदेश करके जगाइये, जिससे हमारे साथ प्रश्न-उत्तर करे। अभी तो यह प्रश्न-उत्तर नहीं करता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार इसको उपदेश न लगेगा, क्योंकि जिसका कोई इष्ट होता है, उसी से उसको सिद्धि होती है। इससे मैं इसके इष्ट को ध्यान करके बुलाता हूँ—इससे इसका कार्य सिद्ध होगा। वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! इस प्रकार कहकर वशिष्ठजी ने कमण्डलु हाथ में लेकर तीन बार आचमन किया और पद्मासन बाँध, नेत्र मूँद, ध्यान में स्थित होकर अग्नि का आवाहन किया। हे अग्नि देव! यह तुम्हारा भक्त है, इसकी सहायता और इस पर दया करो। तुम सन्तों का दयालु स्वभाव है! जब वशिष्ठजी ने ऐसे कहा, तब सभा में बड़े तेजस्वी अग्नि की ज्वाला काष्ठ-अङ्गार से रहित प्रकट हुई और जलने लगी। जब ऐसे