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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1503, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1503
  • निर्वाण प्रकरण * ६६६

अग्नि जागी, तब वह मृग उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके चित्त में बड़ी भक्ति उत्पन्न हुई ।

तब वशिष्ठजी ने नेत्र खोलकर अनुग्रह सहित मृग की ओर देखा । उससे उसके सम्पूर्ण पाप भस्म हो गये । वशिष्ठजी ने अग्नि से कहा, हे भगवन्, यह तुम्हारा भक्त है । अपना पहले की भक्ति स्मरण करके इस पर दया करो और इसके मृगशरीर को दूर करके इसको विपश्चित् शरीर दो, जिससे यह आधिव्याश्रम में मुक्त हो । हे राजन् ! इस प्रकार अग्नि से कहकर वशिष्ठजी राम से बोले, हे राम ! अब यह मृग अग्नि में प्रवेश करेगा, तब इसका मनुष्यशरीर हो जायगा । वशिष्ठजी ऐसे कहते ही थे कि वह मृग अग्नि को देखकर एक चरण पीछे को हटा और उछलकर अग्नि में प्रवेश कर गया । जैसे बाण निशाने में प्रवेश करते हैं, वैसे ही उसने प्रवेश किया । हे राजन् ! उस मृग को कुछ खेद न हुआ, बल्कि उसको अग्नि आनन्दरूप देख पड़ा । तब उसका मृगशरीर अन्तर्धान हो गया । वह महाप्रकाशरूप मनुष्यशरीर धारण किये अग्नि से निकला । जैसे कपड़े के ओढ़े से स्वाँगिया स्वाँग धरकर निकल आता है, वैसे ही वह निकल आया । वह अति सुन्दर वस्त्र पहने हुए, शीश पर मुकुट, कण्ठ में रुद्राक्ष की माला और यज्ञोपवीत धारण किये था । अग्नि सा वह तेजस्वी था । सभा में जो लोग बैठे थे, उनसे भी अधिक उसका तेज था—मानो अग्नि को भी लज्जित कर रहा हो । जैसे सूर्य के उदय होने पर चन्द्रमा का प्रकाश फीका हो जाता है, वैसे ही वह सबसे अधिक प्रकाश मान हो गया । फिर जैसे समुद्र से तरङ्ग निकलकर लीन हो जाता है, वैसे ही वह अग्नि अन्तर्धान हो गये । यह देखकर राम को आश्चर्य हुआ और सब सभा विस्मय को प्राप्त हुई ।

तब बड़े प्रकाश से युक्त विपश्चित् निकलकर ध्यान में लग गया । विपश्चित् से लेकर इस शरीर तक अपने सब शरीर स्मरण करके नेत्र खोल वशिष्ठजी के निकट आ साष्टाङ्ग प्रणाम कर बोला, हे ब्राह्मण ! ज्ञान के सूर्य और प्राण के दाता ! तुमको मेरा नमस्कार है ।