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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1504, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1504

७०० ✵ योगवाशिष्ट ✵

हे राजन् ! जब इस प्रकार उसने कहा तब वशिष्ठजी ने उसके शिर पर हाथ रक्खा और कहा, हे राजन् ! तू उठ खड़ा हो। अब मैं तेरी अविद्या दूर करूँगा और तू अपने स्वरूप को प्राप्त होगा। तब राजा विपश्चित ने उठकर राजा दशरथ को प्रणाम किया और बोला, हे राजन् ! तुम्हारी जय हो। राजा दशरथ ने आसन से उठकर कहा, हे राजन् ! तुम बहुत दूर फिरते रहे हो, अब यहाँ मेरे पास बैठो। विश्वामित्र आदि जो ऋषि बैठे थे, उनको यथायोग्य प्रणाम करके राजा विपश्चित बैठ गया। राजा दशरथ ने विपश्चित को, जो बड़े प्रकाश को धारण किये था, भाम कहके बुलाया और कहा, हे भाम ! तुम संसारभ्रम के लिए चिरकाल फिरते रहे हो; थके होगे, अब विश्राम करो और जो-जो देश-काल-क्रिया की है और देखा है, सो कहो। यह आश्चर्य है कि अपने मन्दिर में सोये हो और निद्रादोष से गड्ढे में गिरते फिरे और देश-देशान्तर में भटकते फिरे। यही अविद्या है। हे भाम ! जैसे वन का विचरनेवाला हाथी जंजीर में बँधा हुआ दुःख पाता है वैसे ही तुम विपश्चित भी थे और अविद्या से जगत् के देखने के लिए भटकते रहे। हे राजन् ! जगत् कुछ वस्तु नहीं है, पर भासित होता है, यही माया है। जैसे भ्रम से आकाश में नाना प्रकार के रङ्ग दिखते हैं, वैसे ही अविद्या से ये जगत् भासित होने और सत्य प्रतीत होने हैं, पर सब आकाशरूप हैं और आकाश में स्थित हैं। उस आकाश में जो कुछ तुमने आत्मरूपी चिन्तामणि के चमत्कार में देखा है, वह कहो।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिद्दर्शनंनाम द्विशताधिकैकविंशतितमःसर्गः॥ २२१ ॥

दशरथजी बोले, हे भाम ! बड़ा आश्चर्य है कि तुम विपश्चित बुद्धिमान थे, और चेष्टा से तुमने अविपश्चित (मूर्ख) बुद्धि की है, जो अविद्या के देखने को समर्थ हुए थे। यह जगत्प्रतिभा तो मिथ्या है; असत्य के ग्रहण की इच्छा तुमने क्यों की ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! जब इस प्रकार राजा दशरथ ने कहा, तब प्रसंग पाकर