योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1505, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७०१
विश्वामित्र बोले. हे राजन्, दशरथ ! यह चेष्टा वही करता है, जिसको परम बोध नहीं होता, पर केवल मूर्ख और अज्ञानी भी नहीं होता, क्योंकि जिसको परमबोध और आत्मा का अनुभव होता है, वह जगत् को अविद्याकृत जानता है और उस अविद्याकृत जगत् का अन्त जानने को इतना यत्न नहीं करता, क्योंकि वह तो उसे असत्य जानता है। और जो देहाभिमानी मूर्ख अज्ञ है, वह भी यह यत्न नहीं करता, क्योंकि उसको देखने की सामर्थ्य भी नहीं होती। इससे मध्य भावी है। जो आत्मबोध से रहित है और जिसने आधिभौतिक शरीर का त्याग किया है, वही संसार देखने का यत्न करता है। जिनको उत्तम बोध नहीं हुआ, वे इस प्रकार बहुत भटकते फिरते हैं। हे राजन् ! इसी प्रकार वटधामा भी इसी ब्रह्माण्ड में फिरते हैं। मन्तर लाख वर्ष इनको इसी ब्रह्माण्ड में फिरते व्यतीत हुए हैं। उन्होंने भी यही निश्चय धारण किया है कि पृथ्वी कहाँ तक चली जाती है। इस निश्चय से वे निवृत्त नहीं होते और इसी ब्रह्माण्ड में घूमते हैं। उनको अपनी वासना के अनुसार विपरीत और ही और स्थान भासित होते हैं।
हे राजन् ! जैसे किसी बालक का रचा संकल्प का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह भूगोल ब्रह्मा के संकल्प से स्थित है। संकल्प से गेंद के समान आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इन पाँचों तत्त्वों का यह ब्रह्माण्ड रचा है। उसके चौफेर चींटियाँ फिरती हैं। जिस ओर से वे जाती हैं, वह ऊर्ध्व दिखता है सो ओर ही निश्चय होता है। वैसे ही इस संकल्प के रचे भूगोल के किसी कोण में वटधामा जीव हुआ है। हे राजन् ! उसके तीन पुत्र थे। उनके मन में यह संकल्प उदय हुआ कि हम जगत् का अन्त देखें। इसी संकल्प में फिरत-फिरते वे पृथ्वी नाँघते हैं। पृथ्वी और जल आता है। जल को नाँघते हैं। फिर आकाश आता है। फिर पृथ्वी, जल, वायु फिर उसी भूगोल के चौफेर फिरते हैं। जैसे आकाश में गेंद हो, वैसे ही यह पृथ्वी आकाश में है। इसका नीचे ऊपर कोई नहीं। चरण नीचे शिर ऊपर, इसी तरह वट-